विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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'चेल्लण' नाम से इसे कहते हैं। बड़े भारी माहात्म्य वाले श्री
चेल्लण पार्श्वनाथ के समक्ष उन महर्षियों ने सुवर्ण मुकुट मन्त्रा-
म्नाय भव्यों के लिए आद्यन्त व प्रकाशित की। और वह सिंह-
गुफा पल्ली कालान्तर में ढिपुरी नाम से प्रसिद्ध नगरी हुई। आज
भी वे भगवान् महावीर और वे चेल्लण पार्श्वनाथ उसी नगरी में
यात्रोत्सवादि से आराधन किये जाते हैं।
एक बार वकचूल खात डाल कर चोरी करने के लिए उज्जैन
मे किसी सेठ के घर गया। कोलाहल सुन कर वहाँ से लौट आया
और देवदत्ता नामक प्रधान गणिका के घर में प्रविष्ट हुआ।
उसने उसे कोढ़ी के साथ सोये हुए देखा। वहाँ से निकल कर नगर
सेठ के घर गया। वहाँ एक विंशोपक हिसाब मे कम हो रहा था
जिसके लिए सेठ ने अपने पुत्र को दुर्वाक्यों से फटकार कर घर से
निकाल दिया। यह देखते हुए रात बीत गई। फिर—राजकुल में
जाऊँगा—यह सोचते हुए सूर्योदय होने से पल्लीपति वकचूल ने
नगर से निकल कर गोह लेकर वृक्ष के नीचे दिन बिताया। रात्रि
मे फिर राजकीय भण्डार के बाहर से गोह के पूँछ द्वारा चढ़ कर
अन्दर प्रविष्ट हो गया। उसे राजा की रूठी हुई पटरानी ने देख
कर पूछा—तुम कौन हो ? उसने कहा—मै चोर हूँ। रानी ने
कहा—डरो मत, मेरे साथ सङ्गम करो। चोर ने कहा—तुम कौन
हो ? उसने कहा—मैं पटरानी हूँ। चोर ने कहा—तब तो तुम
मेरी माँ होती हो। कहते हुए जाने का निश्चय किया तो रानी ने
नखो से अंग विदीर्ण कर पहरेदारो को पुकार के बुलाया। उन्होने
पकड़ लिया। रानी को मनाने के लिए आये हुए राजा ने यह
दृश्य स्वयं देख लिया था। अत उसने अपने पुरुषो को कहा—
इसे ज्यादा कष्ट मत दो। उन्होने उसे रखा। प्रातःकाल राजा के
पूछने पर उसने कहा—देव ! मै चोरी करने के लिए प्रविष्ट हुआ,
पीछे आपके भण्डार मे देवी ने मुझे देख लिया। इसके आगे कुछ