विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३. ढिंपुरीतीर्थ-कल्प
श्री चेल्लण पार्श्वनाथ और श्री वीर प्रभु का ध्यान करके
श्री ढिंपुरी तीर्थ का कल्प यथाश्रुत कहता हूँ। पारेत जनपद मे
महानदी चर्मण्वती के तट पर नाना प्रकार के गहरे जंगलो मे
गहन ढिंपुरी नगरी है।
इसी भारतवर्ष मे विमलयशा नामक राजा हुआ। उसके रानी
सुमंगला देवी के साथ विषय-सुख अनुभव करते क्रमश सन्तान-
युगल जन्मे। उनमे पुत्र का नाम पुष्पचूल और पुत्री पुष्पचूला
थी। उद्दण्ड, अनर्थकारी होने से लोगो ने पुष्पचूल का नाम वङ्कचूल
कर दिया। महाजनो के उपालम्भ से रुष्ट होकर राजा ने वङ्कचूल
को नगर से निकाल दिया। अपने परिजन और स्नेह वश बहिन
के साथ जाते हुए वह भीषण अटवी के मार्ग मे पड गया। वहाँ
भूख प्यास से व्याकुल अवस्था मे उसे भीलो ने देखा और अपनी
पल्ली मे ले गए। उन्होने उसे अपने पूर्ण पल्लीपति के पद पर
स्थापित कर दिया। वह ग्राम, नगर और पथिको के सार्थ को लूट
खसोट कर राज्य-पालन करने लगा।
एक वार सुस्थिताचार्य आबूसे अष्टापद यात्रा के हेतु जाते हुए
अपने शिष्यादि परिवार के साथ सिंहगुफा नामक इसी पल्ली मे
पहुचे। वर्षाकाल आया, भूमि जीवाकुल हो गई। सूरिजी ने साधुओ
के साथ आलोचना करके वकचूल से वसति माँग कर वही रह
गए। उसने पहले से ही व्यवस्था कर ली कि हमारी सीमा मे
धर्म-कथा न कहे क्योकि आपकी कथाओ मे अहिंसादि धर्म है
और उससे हम लोगो का निर्वाह नही होता। गुरु महाराज