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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 442 में से

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पृष्ठ 264

वस्तुपाल-तेजपालमन्त्रि-कल्प १८१
लाख आबू पर लूणगवसही मे खर्च किये। नौ सौ चौरासी पौषध-
गालाएँ वनवाई। पाँच सौ दाँत के सिंहासन, पाँच सौ जादर के
समवशरण, सात सौ सतरह ब्रह्मगाला, सात सौ दानगालाएँ,
तपस्वी-कापालिक मठो मे सर्वत्र भोजन-दान किया। तीन हजार
दो माहेश्वरायतन, तेरह सौ चार शिखरवद्ध जिनालय, तेईस सौ
जिनालयो का उद्धार, अठारह करोड़ स्वर्ण के व्यय से तीन स्थानो
मे सरस्वती-भण्डार भरवाये। पाँच सौ ब्राह्मण प्रतिदिन वेद-पाठ
करते थे। वर्ष मे तीन वार सघ पूजा, पन्द्रह सौ श्रमण घर मे
नित्य वहोरते थे। एक हजार से अधिक तटिक-कार्पटिक प्रतिदिन
भोजन करते थे। सघपति वन कर तेरह तीर्थयात्राएँ की। प्रथम
यात्रा मे चार हजार पाँच सौ गाडे—सेज वाले (शय्यापालक),
सात सौ सुखासन, अठारह सौ वाहिनी, उन्नीस सौ श्रीकरी,
इक्कीस सौ श्वेताम्वरो व ग्यारह सौ दिगम्वरो के, साढे चार सौ
जैन गायक, तेतीस सौ वन्दीजन, चौरासी तालाव बँधाये। चार
सौ चौसठ वावडी (वापी) तीस-वत्तीस पाषाणमय दुर्ग, चौवीस
दन्तमय जैन रथ, दो हजार शाक (सागवान काष्ठ) घटित (रथ
वनवाये)। वस्तुपाल मत्री के ‘सरस्वती कण्ठाभरण’ आदि चौवीस
विरुद थे। उसने चौसठ मस्जिदे करवाई। दक्षिण मे श्रीपर्वत
तक, पश्चिम मे प्रभास तक, उत्तर मे केदार तक और पूर्व मे
वाराणसी तक उनके कीर्त्तिकलाप व्यास है। सब मिला कर तीन
सौ करोड़ चौदह लाख अठारह हजार आठ सौ मे तीन लौष्टिक
कम द्रव्य हुआ। त्रेसठ वार सग्राम मे उसने जय-पत्र प्राप्त किया।
इस प्रकार अठारह वर्ष उनका व्यापार-कार्यकाल चला।
इस प्रकार अनेक पुण्यकृत्य करते हुए कितने ही काल पर
राजा वीरधवल काल प्राप्त हुआ। तब उसके पट्ट पर उसके पुत्र
वीसलदेव को मन्त्रिश्रेष्ठो ने राज्याभिषिक्त किया। वह समर्थ होता

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