विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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हुआ क्रमश घमण्डी हो गया । उसने दूसरा सचिव वनाकर मन्त्री
तेजपाल को हटा दिया । यह देखकर राजपुरोहित सोमेश्वर
महाकवि ने राजा को उद्देश्य करके व्यङ्गात्मक नव्य काव्य पढा—
हे चञ्चल समीर ! महीने भर सुन्दर पाटल पुष्पो के परिमल
को वहन करती अपनी महान् शक्ति का तूने क्या प्रयोग किया हैं ?
देख तो सही—अन्धकार को दूर हटाने वाले सूर्य और चन्द्रमा
का दूर से ही तिरस्कार करके पादस्पर्श सहन करने वाली धूलि
को उनके स्थान पर स्थापित कर दिया । इत्यादि ।
उन पुरुष-रत्नो का शेष वृत्तान्त और आदि से उत्पत्ति का
स्वरूप तो लोक-प्रसिद्धि से ही जान लेना चाहिए ।
गायकवर्य सूढा के द्वारा जान करके दोनो मन्त्रिमुख्यो के
कीर्त्ति-कलापो की यह सख्या बतलायी है ।
जहाँ अर्हन्त भगवान विराजमान हो, वह तीर्थ कहलाता है
और उन दोनो मन्त्रियो के चित्त मे अर्हन्त अहर्निश बसते थे ।
इसलिए उन तीर्थरूप पुरुषश्रेष्ठो के कीर्त्तन से भी क्या कल्पकृति
व्याप्त नही है ? अर्थात् है । ऐसा विचार कर उन दोनो मन्त्री-
नायको का यह सक्षिप्त कल्प श्री जिनप्रभसूरि ने हृदय से
वनाया है ।
महामात्य श्री वस्तुपाल तेजपाल के कीर्त्तन-सख्या का यह
कल्प ग्रन्थाग्र० ५३ और अक्षर ६ अधिक है ।