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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 442 में से

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पृष्ठ 267

१८४ विविध तीर्थ-कल्प

उसका कथन स्वीकार कर उपाश्रय मे ठहर गए। उसने सभी
प्रधान पुरुषो को बुलाकर कहा—मैं राजपुत्र हूँ, मेरे पास
ब्राह्मणादि आवेगे अत आप लोग पल्ली मे जीव-वध एव मास-
मदिरा का प्रसग उपस्थित न करें जिससे साधुओ को भी आहार-
पानी कल्प्य हो जायगा। उन्होने चार महीने ऐसा ही किया।
विहार का समय आया। सूरिजी ने वङ्कचूल को—"श्रमणो
और पक्षियो का वास अनियत होता है" वाक्यो द्वारा सूचित
किया। वह गुरु महाराज के साथ चला। अपनी सीमा पर पहुचा
कर विनति की—हम परायी सीमा मे प्रवेश नही करते ! सूरिजी
ने कहा—हम सीमान्तर मे आ गए, अब कुछ उपदेश देंगे।
वङ्कचूल ने कहा—मेरे से निर्वाह हो सके, ऐसा उपदेश दीजिए।
सूरिजी ने उसे चार नियम दिलाए—१ अज्ञात फल न खाना,
२ सात-आठ पाँव पीछे हट कर आघात करना, ३ पट्टरानी से
गमन नही करना, ४ कौए का मास भक्षण न करना। वह नियम
स्वीकार कर गुरु महाराज को नमस्कार कर अपने घर आ गया।
एक बार वह सार्थ पर डाका डालने के लिए गया। शकुन
न होने के कारण सार्थ नही आया, वङ्कचूल का पाथेय समाप्त
हो गया। ठाकुर लोग क्षुधा-पीडित हुए। उन्होने फला हुआ
किम्पाक वृक्ष देखा, उसके फल ग्रहण किए। वङ्कचूल ने उस फल
का नाम न जानने से उन्हे नही खाया, दूसरे सब लोगो ने खाया।
वे लोग किम्पाक फल से मर गए। वङ्कचूल ने सोचा—अहो !
नियम पालन का यह फल है। उसके बाद वह पल्ली मे अकेला
आया। रात्रि मे अपने घर मे प्रविष्ट होकर दीपक के प्रकाश मे
पुष्पचूला को पुरुष वेश मे अपनी पत्नी के साथ सोये हुए देखा।
उन पर क्रुद्ध होकर कहा—दोनो को खड्ग से मारूँगा। ऐसा
सोचकर नियम याद आ जाने से सात-आठ पाँव पीछे हट कर