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सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 276

ढिंपुरीस्तव १९१
विगाल प्रतिमा है। दाहिनी ओर चेल्लण पार्श्वनाथ जयवन्त है
जिनके रूपर सर्पफण अलकृत हैं।
एक ओर आदिनाथ जिनेश्वर और दूसरे ओर श्री मुनि सुव्रत
भगवान् हैं। इस प्रकार अनेक जिनेश्वर मूर्त्तियो वाला मन्दिर
चमकीले वादलो के सहश है। द्वार के समीपवर्त्तिनी अविका देवी
और छ० भुजाओ वाला क्षेत्रपाल हैं। सर्वज्ञ भगवान के चरण
कमलो मे वे दोनो सेवा करते हुए भ्रमर के समान सघ के विघ्न-
समूह क्षण मात्र मे नष्ट करते हैं।
यहाँ पौष दशमी को लोक समूह द्वारा किये जाने वाले उत्सव
को देखकर भव्यजन कलिकाल के घर निश्चय ही कृतयुग को
पाहुने के रुप मे आने की संभावना करते हैं।
देवताओ द्वारा पूजित इस तीर्थ की भक्ति से आराधना करके
समस्त मनोवाञ्छित प्राप्त होते हैं और सर्व प्रकार के भयो को
जीत लेते हैं। अत्यन्त सुगन्धित चन्दन को पा कर ताप से व्याप्त
आलिङ्गित अग को कौन सहन कर सकता है ?
पापो को दूर करने मे दृढ वद्यजन ढिंपुरी तीर्थ रत्न की
वन्दना करते हैं। जिसमे कल्प वृक्ष के सहश प्रार्थित अर्थ को देने
वाले पद्मावती और धरणेन्द्र द्वार चरण गृहीत भगवान चेल्लण
पार्श्वनाथ की यह कायोत्सर्ग स्थित देह है।
शक सवत् १२५१ दीपावली के दिन सघसहित इस नगरी मे
आकर प्रभावमहोदधि इस तीर्थ का मुदित मन वाले श्री जिनप्रभ-
सूरि ने यह स्तोत्र बनाया है।