विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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न कहने पर जानकार राजा ने प्रसन्न होकर उसे पुत्र रूप में
स्वीकार कर लिया और सामन्त पद पर आरूढ किया । वकचूल
ने राजा के द्वारा विडम्बना की जाती हुई रानी की रक्षा की ।
अब वकचूल सोचने लगा—अहो ! नियम धारण करने का भी
कैसा शुभ फल है !
एक बार राजा ने उसे कामरूप के राजा को जीतने के लिए
भेजा । वह युद्ध मे गया और उसे जीत कर घावो से जर्जरित
होकर स्वदेश लौटा ! राजा ने वैद्यो को नियुक्त कर इलाज कराया
पर घाव बढते ही गए । उन्होंने कहा—देव ! कौए के मास से यह
अच्छा होगा ।
जिनदास श्रावक के साथ वकचूल की मित्रता थी अत राजा
ने उसे बुलाने के लिए पुरुषो को भेजा ताकि मित्र के समझाने से
ये काक-मास भक्षण कर ले । राजा द्वारा बुलाए हुए जिनदास ने
अवन्ती आते हुए किन्ही दो देवियो को रोते हुए देखा । उसने
पूछा—क्यो रोती हो ! देवियो ने कहा—हमारा पति सौधर्म देव-
लोक से च्युत हो गया अत हम राजकुमार वकचूल की प्रार्थना
करती हैं, पर तुम्हारे जाने पर वह काक-मास भक्षण कर दुर्गति-
भाजन हो जायगा, इसलिए रोती है । सेठ ने कहा—मै ऐसा ही
करूँगा कि यह उसे भक्षण न करे । सेठ उज्जैन गया, राजा के
अनुरोध से उसने वकचूल से कहा—काक-मास ग्रहण करो । अच्छे
होकर प्रायश्चित कर लेना । वकचूल ने कहा—तुम जानते हो,
जिस कार्य को करके फिर प्रायश्चित लेना पडे, इससे तो उसका
आचरण पहले से ही न करना श्रेयस्कर है । कीचड को प्रक्षालन
करने से तो अच्छा है कि उसका स्पर्श न कर दूर ही रहा जाय ।
इस प्रकार राजा को निषेधकर अपने नियमपालन मे दृढ रह कर
वह मर कर अच्युत कल्प मे उत्पन्न हुआ ।