विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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आघात करने के उद्दे श्य से पीछे हटा और खड्ग के खटके से जग
कर बहिन ने "वङ्कचूल जीते रहो" गव्द कहे। उसने लज्जित
होकर पूछा- यह ऐसा क्यो ? बहिन ने नट का सारा वृत्तान्त
बतलाया।
कालक्रम से वङ्कचूल के राज्य-शासन करते उस पल्ली मे
उन्ही आचार्य महाराज के धर्मऋषि धर्मदत्त नाम के दो मुनि
वर्षावास रहे। उनमे से एक के तीन मासक्षमण और दूसरे के
चार मासक्षमण तप था। वङ्कचूल आचार्य महाराज के उपदेश के
के शुभ फल अनुभव कर चुका था, अतः उसने—कृपा कर कुछ
उपदेश दीजिये—कहा। उन्होने क्लेश का नाश करनेवाला चैत्य
निर्माण कराने का उपदेश दिया। वङ्कचूल ने 'शराविका' पर्वत
समीपवर्ती उसी पल्ली मे चर्मणवती नदी के तट पर ऊँचे शिखर
वाला सुन्दर जिनालय बनवाया। उसमे श्री महावीर स्वामी की
प्रतिमा स्थापित की। वह तीर्थ के रूप मे प्रसिद्ध हो गया, चारो
दिशाओ से सघ आने लगे।
कालान्तर मे कोई व्यापारी अपनी पत्नी के साथ सर्वऋद्धि
सहित वहाँ की यात्रा के लिए चला। क्रमशः रन्ति नदी पर
आया। नौका मे बैठे हुए दम्पति ने चैत्य का शिखर देखा और
सोने के कटोरे मे कुकुम, चन्दन, कर्पूर आदि डालकर शीघ्रता से
जल मे प्रक्षेप करते हुए व्यापारी की पत्नी के हाथ से प्रमादवश
छूट कर नदी तल मे जा डूबा। वणिक ने कहा—यह करोडो के
मूल्य वाला रत्नजटित कटोरा राजा द्वारा ग्रहणक मे दिया हुआ
था, अब राजा से कैसे छुटकारा होगा ? उसने दीर्घ विचार करके
यह बात वङ्कचूल से कही ताकि यह राजकीय वस्तु मिल जाय
ऐसा प्रयत्न करे। वङ्कचूल ने उसकी खोज के लिए धीवर को
आदेश दिया, वह नदी मे प्रविष्ट होकर तल तक गया। उसने