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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 280, कुल 442 में से

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पृष्ठ 280

समवशरण रचना-कल्प १९७
चौडा मणिपीठ है और जिनेश्वरो की धनुष-ऊंचाई के समान ही
उसके चार द्वार हैं।
उस चार मणि-रत्न जटित सिंहासन हैं, जिन पर तीन छत्रो
से भूषित भगवान पूर्वाभिमुख विराजमान होते है।
समधिक योजन विस्तार वाला दो सौ सोलह धनुष ऊँचा
अशोक वृक्ष है। व्यन्तरदेव भगवान के तीन प्रतिबिम्ब शेष तीन
सिंहासनो पर विराजमान करते हैं।
परिषद के आगे प्रारम्भ मे मुनिराज, वैमानिक देवियाँ और
साध्वियाँ रहती हैं। भुवनपति व्यन्तर ज्योतिषी देव-देवी, वैमानिक
देव और पुरुष-स्त्री बैठते है।
कुडहिकेतु सकीर्ण एक हजार योजन ऊँचे दण्ड वाला धर्मध्वज
होता है, दो यक्ष चामरधारी होते हैं और जिनेश्वर के आगे धर्म-
चक्र होता है।
ऊँची ध्वजाएँ मणितोरण अष्ट मङ्गल, पूर्णकलश, मालाओ,
पचालिकाओ और छत्रादि से प्रत्येक द्वार सुशोभित होते हैं, धूप-
घटिकाएँ होती हैं।
क्रमश. हेम-श्वेत-रक्त और श्यामल वर्ण वाले वैमानिक,
व्यन्तर, ज्योतिषी और भुवनपति प्रतिद्वार पर रत्न के वप्र वाले
पूर्वादि वप्रो पर प्रतिहार होते हैं।
जय, विजय, जयन्त और अपराजित क्रमश गौर, रक्त,
कनक व नील आभा वाली देवियाँ पूर्व क्रम से कनकमय स्थापित
करती है।
प्रत्येक बाह्य वप्र के द्वार पर दोनो ओर जटित मुकुटो से
मण्डित तुम्बुरु, पट्‌वाङ्ग पुरुष श्रीमालाओ से युक्त स्थापित
करते हैं।
वाह्यवप्र मे यानादि रहते हैं, दूसरे वप्र मे तिर्यंच परस्पर