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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 275, कुल 442 में से

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पृष्ठ 275

१९० विविध तीर्थ-कल्प
लौटते हुए जिनदास श्रावक ने उन देवियो को उसी प्रकार
रोते देखकर कहा—अब क्यो रोती हो ? उसने मास ग्रहण नही
किया है । देवियो ने कहा—वह तो अधिक धर्माराधन करके
अच्युत-कल्प मे चला गया, हमारा पति नही बना ।
इस प्रकार जैन धर्म के प्रभाव को बहुत काल तक विचारता,
मनन करता हुआ जिनदास श्रावक अपने घर लौटा ।
इस प्रकार इस तीर्थ के निर्माता वंकचूल भी जगत को आनंद
देने वाले हुए । ढिंपुरीतीर्थरत्न का यह कल्प जैसा सुना, उसकी
किंचित् रूप से श्री जिनप्रभसूरि ने रचना की ।
यह चेल्लण पार्श्वनाथ का कल्प समाप्त हुआ । इसकी ग्रन्थ-
संख्या ११६ अक्षर २६ ऊपर हैं ।
◼
४४. ढिंपुरीस्तव
विविध उत्तुंग पर्वतों के बीच शुभ्र छाया सुशोभित श्री महावीर
प्रभु, पार्श्वनाथ, मुनि सुव्रत और आदिनाथ की प्रतिमाओ से युक्त,
नियमधारण करने वाले श्री वंकचूल की विश्वविश्रुत पल्ली
ढिंपुरी चिरकाल तक अद्भुत लक्ष्मी को करे ।
यहाँ हस्तिदेव नदी के तट पर स्थित मनोहर गगनचुम्बी
शिखर वाले चैत्यों को देखकर यात्री-गण अपने नेत्रो को शीतलता
देते हैं ।
यहाँ मूलनायक चरम जिनेश्वर महावीर स्वामी की लेप्यमय