विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६. समवशरण रचना-कल्प
श्री महावीर जिनेश्वर को नमस्कार करके पूर्वाचार्य कृत
समवशरण-रचना का गाथाओ से कल्प कहता हूँ।
वायुकुमार और मेघकुमार क्रमश एक योजन भूमि शुद्ध कर
सुगन्धित जल की वर्षा करते हैं। वाणमंतर मणिरत्नमय भूमि
गत करते हैं और कुसुमवृष्टि करते हैं।
श्रेष्ठ रजत कनक और रत्न के तीन प्राकार क्रमश भुवनपति,
ज्योतिष और वाणमंतर देव बनाते हैं। प्राकारो पर कचन, रत्न
और मणियो के कपिशीर्षक होते हैं।
उन प्राकारो का एक-एक गाऊ और छः सौ धनुष का अन्तर
होता है। तेतीस धनुष एक हाथ और आठ अगुल का विस्तार
होता हैं।
उन वप्रो के पाँच सौ धनुष ऊँचे द्वार होते हैं। ये सर्व माप
जिनेश्वरो के स्वहस्त प्रमाण से जानना चाहिए।
भूमि से दश हजार सोपान चढ़ने पर प्रथम प्राकार आता है।
वहाँ से पचास धनुष जाने पर पाँच हजार सोपान चढकर दूसरा
वप्र आता है।
उसका अन्तर भी पूर्वोक्त विधि से जान लेना चाहिए। तद-
नन्तर पूरे बीस हजार सोपान चढ़ने पर तीसरा कोट है।
वे सब क्रमश दश, पाँच और पाँच हजार सोपान एक हाथ
ऊँचे व एक हाथ विस्तीर्ण है। बाह्य, मध्य और अभ्यन्तर वप्रो के
ये सोपान समझना चाहिए।
उनके बीच मे भूमि से ढाई कोश ऊँचा, दो सौ धनुष लम्बा-