विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरानी ने यह सुन कर उस कोर्टिवक को जल के तल मे रख दिया
और स्वय मरण स्वीकार कर लिया। वह राजा जब शत्रु को
हरा कर अपने नगर मे आया और रानी के वृत्तान्त को सुन
कर ससार से विरक्त होकर भागवती दीक्षा स्वीकार कर ली।
उसमे से एक विम्व को देव वाहर लाये, वह तो पूज्यमान है,
दूसरा भी निकाला जाय ऐसा उपक्रम करना चाहिए। यह सुन
कर परमर्हन्त चूडामणि बकचूल ने उसी धीवर को विम्व निकलने
के लिए नदी मे प्रवेश कराया। उसने उस प्रतिमा को कटि प्रदेश
पर्यन्त जल-तल मे और अवशिष्ट वाह्य रहे हुए देख कर उसे
वाहर निकालने के अनेक उपाय किये पर बाहर न निकलने से
दैवी प्रभाव ज्ञात कर उसने अपने स्वामी को उसका स्वरूप निवे-
दन किया। आज भी वह वैसा ही है। सुना जाता है कि आज
भी किसी वृद्ध धीवर ने नौका स्तम्भित होने पर उसका कारण
खोजते उस स्वर्णमय रथ की एक कीलिका प्राप्त की। उसे
स्वर्णमय देख कर लोभवश सोचा—मैं इस सारे रथ को क्रमश
ग्रहण कर के धनवान हो जाऊँगा ! इससे उसे रातभर नीद नही
आई। किसी अदृश्य पुरुष ने कहा—यदि इसे वही रखोगे तो सुखी
रहोगे, अन्यथा मैं तुम्हे शीघ्र ही मार दूगा , उसने भय के मारे
उस युग-कीलिकादि को वही छोड दिया। देवाधिष्ठित पदार्थों के
प्रति कौन-सी वात सम्भव नही होती ?
सुना जाता है कि वर्त्तमान काल मे कोई म्लेच्छ हाथ में
पत्थर ले कर श्री पार्श्वनाथ प्रतिमा को तोडने के लिए उपस्थित
हुआ। उसकी भुजाएँ स्तम्भित हो गई। बहुत कुछ पूजा-विधि
करने से वह ठीक हुआ। श्री वीरप्रभु की प्रतिमा वडी है और श्री
पार्श्वनाथ प्रतिमा उसकी अपेक्षा छोटी है अतः श्री महावीर
प्रतिमा के सामने यह वालरूप देव है। इस प्रकार 'मेद' लोग