विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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के लिए उस पर चढ गया। वहाँ उसने पेड की शाखा पर लटकते
हुए नीचा शिर किए हुए काष्ठ की कील मे ऊँचे पाँव रहे हुए
पुरुष को देखा। वह जिह्वा फैलाकर पानी मे रहे हुए जलचर
जीवो को भक्षण कर रहा था, यह उन सभी ने देखा। गूद्रक ने
उससे पूछा—तुम कौन हो ? इस प्रकार क्यो लटक रहे हो ? उसने
कहा—मैं मायामुर का छोटा भाई हूँ। मेरा वडा भाई कामोन्मादी
है, उसने रावण की भाँति सीता जैसी सातवाहन की महिषी को
रमण करने की इच्छा मे हरण कर लिया है। वह पतिव्रता है,
उसे विल्कुल नही चाहती। मैने भाई से कहा—आपको परदारा
का अपहरण करना योग्य नही है क्योकि अपने विक्रम से सारे
ससार को आक्रान्त करने वाला रावण भी परस्त्रीरमण की
इच्छा से कुलक्षय को प्राप्त हुआ था। मेरे इस प्रकार कहने पर
मायामुर क्रुद्ध हो गया और मुझे इस वट की शाखा मे टगाकर
इस प्रकार विडम्बित किया है। मैं जिह्वा फैला कर समुद्र मे चलने
वाले जलचरादि का भक्षण कर जीवन धारण कर रहा हूँ। यह
सुन कर शूद्रक ने कहा—मैं भी उन्ही राजा सातवाहन का गूद्रक
नामक सेवक हू। और उसी देवी की शोध के लिए आया हू। उस
असुर ने कहा—यदि ऐसा है तो मुझे छुडाओ। जिससे मैं तुम्हारे
साथ चल कर उस देवी को दिखाऊँ। मायामुर ने अपने स्थान के
चारो ओर लाक्षा का दुर्ग बना रखा है वह निरन्तर प्रज्वलित
रहता है अत उसे उल्लघन कर अन्दर जाकर उसे मार कर देवी
को लौटाना है।
यह सुनकर शूद्रक ने उसके काष्ठ-बन्धन काट डाले और
उसके पीछे-पीछे देवताओ से घिरे हुए प्रस्थान कर दुर्गोल्लघन
पूर्वक उस स्थान मे जा पहुँचा। मायामुर देवगणो को देख कर
अपनी सेना को साथ लेकर उनसे युद्ध करने लगा। सेना के मर
जाने से वह स्वयं मैदान मे उतर पडा, गूद्रक ने क्रमश उस
प्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहननृप-चरित्र १४३
तलवार के द्वारा मायासुर को मार डाला । और उस घटावलवी
विमान मे देवी को चढा कर सब देवगण शीघ्र ही प्रतिष्ठानपुर की
ओर प्रस्थान कर गए ।
इधर दग दिन की अवधि पूर्ण होते जानकर राजा विचारने
लगा—न तो मेरी महादेवी आई और न गूद्रक वीर और न वे दोनो
कुत्ते ही वापस लौटे । यह सब विनागलीला मुझ कुबुद्धि ने ही
करवायी । इस प्रकार चिन्ता करते हुए सपरिवार प्राणत्याग की
इच्छा से नगर के वाहर उसने चन्दनादिकाष्ठ से चिता तैयार कर-
वायी । ज्योही वह परिजनसमूह को चिता मे डालने लगा त्योही
देवगणो मे से एक वधाई देने वाला वहाँ आ पहुचा और विनय-
पूर्वक राजा से निवेदन किया—देव ! महादेवी के आगमन से
भाग्यशाली हैं ! देव की इस कर्णमनोहर वात को सुन आनद कद
कलित चित्त से राजा ने ज्यो ही ऊँचा देखा—आकाग मे देव-
समूह और गूद्रक दिखलाई पडे । गूद्रक और महादेवी विमान से
उतर कर राजा के चरणो मे गिर पडे । गातवाहन राजा ने
आनन्दसहित गूद्रक का अभिनन्दन करते हुए उसे अर्द्ध राज्य
दिया । राजा, महादेवी के साथ गूद्रक का चारु चरित सुनता
हुआ उत्सवपूर्वक नगर मे प्रविष्ट हो राज्य-लक्ष्मी भोगने लगा ।
इस प्रकार हाल राजा के भाँति-भाँति के अवदान हैं, कितनो
का वर्णन किया जा सकता है ? इसी ने गोदावरी नदी के किनारे
महालक्ष्मी को स्थापित किया और प्रासाद मे उन उन स्थानो मे
अन्यान्य देवता भी यथायोग्य स्थापित किये । इस प्रकार राजा
चिरकाल तक विगाल राज्य का उपभोग करता रहा ।
नगर की वणिक-वीथी मे कोई काष्ठभारवाहक प्रतिदिन
अच्छी लकडियाँ लाकर बेचा करता था । किसी दिन वह भार
बेचने नही आया । वणिक ने उसकी वहिन से पूछा-आज तुम्हारा
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भाई गली मे क्यो नही आया ? उसने कहा--श्रेष्ठिवर ! मेरा भाई
देवताओ मे रहता है। वणिक ने कहा—यह कैसे ? वह बोली—
ककण बँधने से लेकर विवाह-प्रकरण तक चार दिन मनुष्य अपने
आपको देवताओ के बीच वसता हुआ मानता है, वैसे वैसे उत्सव
देखने के कुतुहल से वैसा अनुभव करता है। यह वात राजा तक
पहुँची, राजा ने विचार किया—अहो ! क्या मै देवताओ मे नही
रहता ? मैं भी चार दिनो के अनवरत विवाहोत्सवमय देवस्वरूप
रहूगा । यह सोचकर चार वर्णो मे जिन-जिन कन्याओ को युवती
या रूपवती देखता सुनता, उन्ही को उत्सवपूर्वक विवाह लाता
था।
इस प्रकार बहुत सा समय बीत जाने पर लोगो ने विचार
किया—क्या भविष्य मे सभी वर्ण वाले लोग नि सन्तान ही रहेगे ?
सब कन्याओ के साथ तो राजा ही विवाह कर लेता है। स्त्री के
विना सन्तान कहाँ से होगी ? इस प्रकार लोगो के दुखी होने पर
‘विवाह वाटिका' नामक गाँव मे रहने वाले एक ब्राह्मण ने पीठजा
देवी का आराधना करके निवेदन किया-- भगवती ! हमारे सतानो
का विवाह कैसे होगा ? देवी ने कहा—ब्राह्मण ! मैं तुम्हारे घर मे
कन्या के रूप मे अवतार लूगी। जब मेरे लिए राजा प्रार्थना करे
तो मुझे राजा को दे देना, शेष मैं सब संभाल लूंगी ! वैसा ही
हुआ । राजा ने उसे रूपवती सुनकर विप्र से याचना की। वह भी
बोला—मैंने कन्या दी, किन्तु महाराज वही पधार कर मेरी कन्या
के साथ विवाह करे ! राजा ने स्वीकार कर लिया। ज्योतिषी के
दिए हुए लग्न मे राजा विवाह करने के लिए चला और उस गाँव
श्वसुर के घर पहुँचा। देशाचार के कारण वर और वधू के बीच
मे पडदा डाल दिया गया। अजलि मे खील (लाजा, जँवार की
फूली) भर कर ज्यो ही दोनो पडदा हटा कर एक दूसरे के
प्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहननृप-चरित्र १४५
गिर पर लाजा विखेरने लगे। फिर हथलेवा होने वाला ही था,
राजा ने उसकी ओर देखा त्यो ही वह भयङ्कर रूप वाली राक्षसी
सी दिखाई पडी। और वह लाजा (जंवार 'की फूली) खीले भी
कठोर पाषाण के कंकड के समान शिर मे लगने लगी। राजा ने
भी—यह क्या आफत है—विचार करते हुए वहाँ से पलायन कर
दिया। वह भी पीछे लगी हुई पत्थर के टुकडे बरसाती हुई चलने
लगी। राजा वहाँ से दौडता हुआ अपनी जन्म-भूमि नाग-ह्रद मे
प्रविष्ट हुआ और वही पर मर गया। आज भो वह पीठजा देवी
प्रतोली के वाहर अपने मन्दिर मे स्थित है।
शूद्रक भी क्रमग कालिका देवो द्वारा अजारूप वन कर वापी
मे प्रविष्ट हो करुण गब्द से ठगा गया। वह उसे निकालने के
लिए वापो मे गया और द्वार पर उस तलवार के तिरछी गिर
जाने से छिन्नाङ्ग होकर पञ्चत्व प्राप्त हो गया, क्योकि महालक्ष्मी
ने वर देते समय “इसी तलवार से तुम्हारा अन्त होगा” कह
दिया था।
राजा सातवाहन के स्थान पर गक्तिकुमार का राज्याभिषेक
हुआ, तव-से लेकर आज तक कोई राजा प्रतिष्ठान—वीर क्षेत्र मे
प्रवेग नही करता।
यहाँ जो कुछ असंभव बातें हैं वे अन्य दर्शन मे कही गई है।
इस प्रकार की असंगत बातें जो हेतु से सिद्ध नही होती, उन्हे जैन
नही मानते।
यह प्रतिष्ठान-कल्प और प्रसगवश संक्षिप्त सातवाहन-चरित्र
श्रीजिनप्रभसूरि ने वनाया। इसकी ग्रन्थ सख्या १६६ और ९
अक्षर ऊपर है।
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३५. चम्पापुरी-कल्प
दुर्नीति को भग करने वाले अंग देग जनपद के भूषणरुप
प्रधान तीर्थ चम्पापुरी का कल्प कहता हूँ । यहाँ त्रिभुवन-पूज्य
बारहवे तीर्थङ्कर श्री वासुपूज्य जिनेश्वर के गर्भावतरण-च्यवन,
जन्म, प्रव्रज्या, केवलज्ञान और निर्वाण रुप पाँच कल्याणक
हुए हैं ।
यही श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र के पुत्र मघव राजा की पुत्री लक्ष्मी
की कुक्षी से आठ पुत्रो के ऊपर रोहिणी नामक पुत्री उत्पन्न हुई ।
उसने स्वयवर मे अशोक राजा के कण्ठ मे वरमाला डाली और
उसके साथ विवाह कर पट्टरानी हुई । क्रमशः उसके आठ पुत्र और
चार पुत्रियाँ हुई । एक दिन श्री वासुपूज्य स्वामी के शिष्य रूप्य-
कुम्भ-स्वर्णकुम्भ के मुख से सुखी होने के हेतु भूतपूर्व जन्म मे किये
हुए रोहिणी तप को सुन कर उद्यापन विधि से आराधना कर
सपरिवार मुक्ति प्रप्त हुई ।
यहाँ भूमण्डल के इन्द्र सहश करकण्डू राजा ने पहिले काद-
म्बरी अटवी मे कलिगिरि की उपत्यका मे रहे हुए कुण्ड नामक
सरोवर मे श्री पार्श्वनाथ भगवान को छद्मस्थावस्था मे विचरते
हुए हस्ति-व्यन्तरानुभाव से कलिकुण्ड तीर्थ रूप से प्रतिष्ठापित
किया था ।
फिर यहाँ सुभद्रा महासती ने तीन विकट पाषाणमय प्रतो-
लियो के वन्द कपाट-सम्पुटो को अपने शील माहात्म्य द्वारा कच्चे
सूत-तन्तु-वेष्टित चलनी से कुएँ का जल निकाल कर उससे
सिंचित कर उद्घाटित किये थे । चारो मे से एक प्रतोली—"मेरे
जैसी अन्य सच्चरित्रा सती हो, उसके उघाडने के लिए वन्द ही
चम्पापुरी-कल्प १४७
छोड देती हूँ"—कह कर राजा आदि लोगो के समक्ष बन्द ही
रहने दी। उस दिन से ले कर चिरकाल पर्यन्त जनता ने उसे
वैसो ही बन्द देखी। क्रमश विक्रम संवत् १३६० मे लक्षणावती
के सुलतान समसदीन ने शकरपुर दुर्ग के उपयोगी पाषाण लेने के
लिए उस प्रतोली को गिरा कर कपाट जोडी को भी ले लिया।
यहाँ के दधिवाहन राजा अपनी रानी पद्मावती के साथ उसका
दोहद पूर्ण करने के लिए हाथी पर आरूढ हो कर अरण्य-विहार
करने गये। हाथी के न रुकने पर अरण्य मे राजा वृक्ष की शाखा
पकड कर उतर गया। हाथी आगे चला गया और राजा अपने
नगर मे आ गया। देवी पद्मावती असमर्थता से उतर न सकी
और उस पर चढी हुई अरण्य मे गई। हथिनी से उतर कर क्रमश
अरण्य मे ही पुत्र-प्रसव किया, वह करकण्डु नामक राजा हुआ।
कलिंग मे पिता के साथ युद्ध करते माता पद्मावती आर्या ने उसे
प्रतिषेध किया। क्रमशः महावृषभ की यौवन, वार्धक्य अवस्था
को देख कर बोधि पा कर करकण्डु प्रत्येकबुद्ध हो कर सिद्धिगति
प्राप्त हुए।
यही दधिवाहन राजा की पुत्री चन्दनबाला ने जन्म लिया,
जिसने भगवान महावीर स्वामी को कौशाम्बी मे सूप के कोने मे
रहे हुए उडद के वाकुले दे कर पाँच दिन कम छ मासोपवास का
पारणा द्रव्य क्षेत्र कालभाव अभिग्रह पूर्ण होने पर कराया।
यहाँ एवं पृष्ठचम्पा मे प्रभु महावीर ने तीन वर्षाकाल विताए,
समवशरण हुए।
इसी के पास श्री श्रेणिक राजा के पुत्र अशोकचन्द्र अपर नाम
कूणिक महाराजा ने पितृशोकवश राजगृह को त्याग कर चम्पक
के चारु पुष्पोसे सुन्दर नवीन राजधानी चम्पा बसाई।
दानवीरो मे दृष्टान्तभूत, पाण्डुकुलमण्डन राजा श्री कर्ण का
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राज्य भी यही था। आज भी शृंगार-चतुरिका आदि उनके
अवदात स्थान इस नगरी मे हैं।
यहाँ सम्यग्दृष्टि सुदर्शन सेठ को दधिवाहन राजा की रानी
अभया ने संभोगार्थ उपसर्ग किये। राजा के वचनो से मारने के
लिए ले जाने पर अपने निर्दोष शील-सम्पत्ति के प्रभाव से आकृष्ट
शासनदेवता के सानिध्य से शूली का स्वर्णमय सिंहासन हो
गया। और तीक्ष्ण तलवार भी सुगन्धित पुष्पमाला हो कर मन
को आनन्ददायी बन गई।
भगवान महावीर का अग्रश्रावक कामदेव भी यही हुआ जो
अठारह करोड स्वर्ण एव दश हजार गायो वाले छह गोकुलो का
स्वामी था। भद्रा का वह पति था। पौषधशाला मे मिथ्यादृष्टि
देव द्वारा पिशाच, हाथी, साँप आदि का रूप करके उपसर्ग करने
पर भी अक्षुब्ध रहा। समवशरण मे भगवान ने स्वय इनकी
प्रशसा की।
यही विचरते हुए चौदह पूर्वधर श्री शय्यंभवसूरि ने राजगृह
से आये हुए अपने मनक नामक पुत्र को दीक्षित करके श्रुतोपयोग
से उसकी छ मास आयु अवशिष्ट ज्ञात कर उसके अध्ययनार्थ
पूर्वो से दशवैकालिक सूत्र की रचना की। उनमे आत्म-प्रवाद से
छज्जीवणिया, कर्म-प्रवाद पूर्व से पिण्डैषणा, सत्य-प्रवाद पूर्व से
वाक्यशुद्धि एव अवशिष्ट अध्ययन प्रत्याख्यान पूर्व की तीसरी
वस्तु से लिए।
यहाँ के निवासी कुमारनन्दी स्वर्णकार ने अपने विभव वैभव
के मद से अभिभूत हो तीव्र ज्वाला मे प्रविष्ट हो पचशैलाधिपत्य
प्राप्त किया। पूर्व भव के मित्र से बोध पा कर गोशीर्षचन्दन-
मय जीवित स्वामी की अलकारविभूषित देवाधिदेव श्री महावीर
स्वामी की प्रतिमा निर्मित की।
चम्पापुरी-कल्प १४९
यहाँ के पूर्ण भद्र चैत्य मे श्री वीर प्रभु ने कहा—जो अष्टापद
पर आरोहण करता है वह उसी भव मे मोक्षगामी है।
यहाँ श्री वीर प्रभु का उपासक पालित नामक वणिक हुआ।
उसके समुद्र यात्रा मे जन्मा हुआ समुद्रपाल नामक पुत्र था जिसने
किसी अपराधी को मारने के लिए ले जाते देख कर प्रतिबोधित
मोक्ष प्राप्त किया।
यहाँ के सुनन्द श्रावक ने साधुओ के मल-दुर्गन्ध की निन्दा
की और मर कर कौशाम्बी मे श्रेष्ठि पुत्र हुआ, व्रत ग्रहण किया।
दुर्गन्ध उदीरण होने पर कायोत्सर्ग ध्यान द्वारा देवता को आकृष्ट
कर अपने अग को सुगन्वित कराया।
यहाँ कौणिकार्य शिष्य अगर्षि रुद्रक ने अभ्याख्यान सविधान
के और सुजात प्रियगु आदि कई सविधानो को बनाया।
इत्यादि नाना प्रकार के संविधानक रत्न प्रकटित नाना वृत्त-
निधान-घटनाओ वाली यह नगरी है। इस नगरी की प्राकार-
भित्ति को प्रिय सखी की भाँति प्रतिक्षण सर्वाङ्ग आलिङ्गन करती
पवित्र घन रसपूरितान्तर वाली उत्तम नदी है।
उत्तमोत्तम नर-नारी रूपी मुक्तामणि को प्रसव करने मे शुक्ति
के सदृश यह नगरी विविध अद्भुत वस्तु शालिनी मालिनी
जयवन्त है।
भगवान् वासुपूज्य स्वामी की जन्मभूमि को विद्वान लोग
उनकी भक्तिपुरस्सर स्तवना करते हैं। श्री जिनप्रभ सूरि ने चम्पा
नगरी का यह कल्प कहा।
श्री चम्पापुरी का कल्प समाप्त हुआ। इसकी ग्रन्थ-श्लोक
सख्या ४७ है।
३६. पाटलिपुत्रनगर-कल्प
श्री नेमिनाथ भगवान को नमस्कार करके अनेक पुरुष-रत्नो
के जन्म से पवित्रित पाटलिपुत्र नामक नगर का कल्प प्रस्तुत
करता हूँ ।
पूर्वकाल मे महाराजा श्रेणिक का निधन होने पर उसके पुत्र
कूणिक ने पितृगोक से चम्पापुरी नई वसाई । उसकी मृत्यु के
पश्चात् उसका पुत्र उदयि चम्पा की राजगद्दी पर बैठा । वह भी
अपने पिता के क्रीडास्थान-राजसभा-शयनागार-भोजनालय आदि
स्थानो को देखकर अत्यन्त गोकाकुल हो जाता था । तब अमात्य
लोगो की अनुमति से नया नगर बसाने के लिए नैमित्तिक लोगो
को स्थान-गवेषणार्थ आदेश दिया । वे सर्वत्र उन स्थानो को देखते
हुए गगा-तट पर गये । वहाँ पाडल कुसुम वाले पाटलि वृक्ष को
देखकर उसकी गोभा से चमत्कृत हुए । उसकी गाखा पर बैठे हुए
चाषपक्षी के मुँह मे कीटकादि जन्तु स्वयमेव आकर गिरते देखकर
सोचा—अहो ! इस चाप पक्षी के मुँह मे स्वयं कीडे आकर गिर
रहे हैं तो इस स्थान पर नगर बसाने से राजा को स्वयं लक्ष्मी
प्राप्त होगी । उन्होने राजा से विज्ञप्ति की । वह भी अत्यन्त प्रसन्न
हुआ । वहाँ एक वृद्ध नैमित्तिक ने कहा—देव ! यह पाडल वृक्ष
साधारण नही है । पूर्वकाल मे ज्ञानियो ने कहा है कि—
“महामुनि की खोपडी मे उत्पन्न यह पवित्र पाटल वृक्ष है,
विगेश इसका मूल जीव एकावतारी है ।”
राजा ने कहा—वे महामुनि कौन ? नैमित्तिक ने कहा—देव !
सुनिये । उत्तर मथुरा मे रहने वाला देवदत्त नामक वणिक पुत्र
एक वार पर्यटन करने के लिए दक्षिण मथुरा गया । वहाँ जयसिंह
पाटलिपुत्रनगर-कल्प १५१
नामक वणिक पुत्र के साथ उसकी मित्रता हो गई। वह एक वार
उसके घर भोजन करने गया तो थाल मे भोजन परोस कर पखा
झलकर हवा करती हुई उसकी अन्निका नामक बहिन के सौन्दर्य
को देखकर उसमे अनुरक्त हो गया और दूसरे दिन चरो को भेज-
कर जयसिंह से अन्निका की याचना की। उसने कहा—मैं अपनी
बहिन को उसे दूँगा जो मेरे घर से दूर न हो और जब तक उसके
सन्तान जन्मे में उन्हे प्रतिदिन देख सकूँ। इस लिए तब तक यदि
वह मेरे घर रहे तो मै उसे अपनी वहिन दूँगा। देवदत्त के स्वीकार
करने पर शुभ मुहूर्त्त मे उनका विवाह कर दिया।
देवदत्त उसके साथ भोग भोगते हुए वहाँ रहने लगा। एक
दिन उसके पास अपने माता-पिता का पत्र आया, जिसे पढकर
उसके नेत्रो मे अश्रु-वर्षा होने लगी। कारण पूछने पर भी न बोला
तो अन्निका ने स्वयं पत्र लेकर पढा। उसमे माता पिता ने लिखा
था—बेटा ! हम दोनो वृद्ध हो गए, मृत्यु निकट है, यदि हमे जीते
देखना चाहते हो तो शीघ्र आ जाना। उसने पति को आश्वासन
देकर अपने भाई को हठ छोडने की प्रार्थना की। और पति के
साथ उत्तर मथुरा को जाते उस सगर्भा ने पुत्र जन्म दिया। देवदत्त
के “इसका नामकरण पिताजी करेंगे” ऐसा कहने पर परिजन
लोग उस बालक को 'अन्निका पुत्र' नाम से पुकारने लगे। क्रमश·
देवदत्त अपने घर पहुँचा। माता पिता को नमस्कार कर उसने
उन्हे पुत्र को अर्पण किया। उसका नाम सधीरण रखा तो भी
अन्निकापुत्र नाम ही प्रसिद्ध हुआ।
अन्निकापुत्र ने बडे होकर तरुणावस्था मे भोगो को तृणवत्
छोडकर जयसिंहाचार्य के पास दीक्षा ग्रहण कर ली और गीतार्थ
होकर आचार्य पद प्राप्त किया।
एक वार वृद्धावस्था मे विचरते हुए अन्निकापुत्राचार्य पुष्प-
भद्रपुर पहुंचे। वहाँ पुष्पकेतु राजा और पुष्पवती रानी के पुष्प-
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चूल, पुष्पचूला नामक पुत्र-पुत्री युगल थे । वे दोनो साथ-साथ
वढते-खेलते परस्पर अत्यन्त प्रीति वाले हो गए । राजा ने देखा
इन दोनो का वियोग कराने से निश्चय ही ये जीवित नही रहेगे ।
और मै भी इनका विरह नही सहूँगा, अत इनका परस्पर विवाह
कर दूँ तो अच्छा हो, यह विचार कर मन्त्री-मित्र और नागरिको
से उसने छलपूर्वक पूछा—यदि अन्त पुरमे रत्न उत्पन्न हो तो
उसका स्वामी कौन ? उन लोगो ने कहा—
देव ! अन्त पुर का तो कहना ही -या ? जिस देश मे रत्न
उत्पन्न हो उसे राजा स्वेच्छानुसार विनियुक्त करे, इसमे किसी को
क्या आपत्ति है।
यह सुनकर राजा ने अपना अभिप्राय कहा । महागनी के मना
करने पर भी राजा ने उनका सबध घटित कर दिया । दोनो पति-
पत्नी सासारिक भोग करने लगे । रानी ने पति के अपमान से
विरक्त होकर व्रत ग्रहण किया और स्वर्ग मे देव हो गई ।
राजा पुष्पकेतु का जीवन अध्याय शेष होने पर पुष्पचूल राजा
हुआ । देव ने अवधिज्ञान प्रयोग से उसका अकृत्य जान कर पुष्प-
चूला को स्वप्न मे नरक और वहां के दुख दिखलाये । उससे
प्रबुद्ध होकर भय से पति को सारा निवेदन किया, उसने शांति के
उपाय किये । वह देव प्रति रात्रि मे उसे नरक दिखाता था ।
राजा ने समस्त तीर्थिक लोगो को बुलाकर पूछा—नरक कैसे होते
हैं ? किसी ने गर्भावास को, किसी ने कारावास को, किसी ने
दारिद्रय को और किसी ने परतन्त्रता को नरक बतलाया । रानी
उनके विसवादी वचनो को सुनकर मुख मोडकर बैठ गई ।
राजा ने अग्निकापुत्र आचार्य को बुलाकर उन्हे पूछा ।
उन्होने जैसा रानी ने देखा था, वैसा ही नरक स्वरूप बतलाया ।
रानी ने कहा—भगवन् ! आपने भी क्या स्वप्न देखा है, अन्यथा
यह कैसे जानते हैं ? सूरि महाराज ने कहा—भद्रे ! जिनागमो से
सब कुछ मालूम होता है । पुष्पचूला ने कहा—भगवन् ! किस कर्म
से नरक प्राप्त होते हैं ? गुरु महाराज ने कहा—भद्रे ! महा
आरंभ-परिग्रह और गुरुविरोधी होकर पञ्चेन्द्रियवध—मासाहार
से प्राणियोका नरक पतन होता है ।
क्रमश देव ने उसे स्वप्न मे स्वर्ग दिखाये । राजा ने उसी
प्रकार पाखण्डियो से पूछा और उनके परस्पर-विरोधी विरोधी
वचन पाकर उन्हे विसर्जित कर आचार्य महाराज से स्वर्ग का
स्वरूप पूछा । उन्होने यथातथ्य कहा और रानी के पूछने पर
स्वर्ग-प्राप्ति का कारण सम्यक्त्व मूल गृहस्थ और यति धर्म
बतलाया । लघुकर्मा रानी प्रतिबोध पाई । उसने राजा से दीक्षा
के लिए अनुज्ञा माँगी । उसने कहा—मेरे घर से ही भिक्षा ग्रहण
करो तो दीक्षा लो । उसने राजा के वचनो को स्वीकार कर
आचार्य महाराज के पास उत्सवपूर्वक शिष्यत्व स्वीकार किया
और गीतार्थ बनी ।
एक वार आचार्य महाराज ने श्रुतोपयोग से भावी दुर्भिक्ष
ज्ञात कर गच्छवासी साधुओ को, देशान्तर भेज दिया और स्वय
जघा वल क्षीण होने से वही रहे । पुष्पचूला साध्वी अन्त पुर से
आहार-पानी लाकर गुरु महाराज को देती थी ।
गुरु-शुश्रूषा भाव प्रकर्ष से क्रमश उसने क्षपकश्रेणि आरोहण
कर केवलज्ञान उत्पन्न किया, तो भी वह गुरु महाराज के वैयावृत्य
से निवृत्त नही हुई । गुरु महाराज ने भी जहाँ तक उसका केवली
होना नही जाना, वहाँ तक उसका पूर्व प्रयुक्त विनय चलता ही
रहा । गुरु महाराज की जव जैसी रुचि होती, वह उसी प्रकार का
अन्नादि लाकर देती थी । एक वार वर्षा के समय भी वह आहार
ले आई । गुरु महाराज ने कहा—वत्से ! तुम श्रुतज्ञा होकर वर्षा
मे कैसे आहार लाई ? उसने कहा—भगवन् ! जहाँ अचित्त अप्काय
था वही से लाई हूँ, अत. प्रायश्चित्त का कोई प्रश्न नही। गुरु
महाराज ने कहा—छद्मस्थ होकर कैसे जाना ? उसने कहा—मुझे
कैवल्य है । तब मैने केवली की आगातना की, मेरा दुष्कृत्य
मिथ्या हो । ऐसा कहते हुए गच्छाधिप ने पूछा कि—मैं सिद्ध हूँगा
कि नही ? केवली ने कहा—अधृति न करे, आपको गगा पार
होते समय केवलज्ञान होगा । तब गगा पार होने के लिए सूरिजी
नौका मे बैठे। वे जिधर-जिधर बैठते उधर ही नौका डूबने
लगती, फिर बीच में बैठने से सारी नौका डूबने लगी। लोगो ने
सूरिजी को नदी में फेंक दिया। दुहागिन बना देने से वैर से पूर्व
भव की पत्नी जो व्यन्तरी हुई थी—ने जल मे शूली पर रख
लिया । शूली पर भी उन्होने “मेरे से अप्काय जीवो की विराधना
हो रही है”—इस आत्म-पोडा से क्षपक श्रेणी आरोहण कर अन्त -
कृत केवली होकर सिद्धि प्राप्त की। निकटवर्त्ती देवो ने उनकी
निर्वाण महिमा की । अतः वह तीर्थ “प्रयाग” नाम से जगत्प्रसिद्ध
हुआ। जहाँ प्रकृष्ट याग-पूजा हो वह प्रयाग, यह अन्वयार्थ है।
शूली पिरोने की गतानुगतिकता से पर दर्शनी लोग आज भी
अपने अंग पर करौत दिलाते हैं। वहाँ के वट वृक्ष को तुर्को द्वारा
काट डालने पर भी बार-बार उग जाता है।
सूरिजी की खोपडी के दो टुकडे होने पर भी जल की लहरें
उन्हे किनारे ले गई । सीप की भाँति इधर-उधर तैरते नदी तट
के किसी गुप्त विषम प्रदेश मे अटक कर रह गई। उस खोपडी
मे कभी पाटल वृक्ष का वीज गिर कर ऊगा । और उसे भेद कर
गर्दन के दक्षिण ओर यह विशाल पाटल वृक्ष हो गया । इस
पाटल वृक्ष का प्रभाव चाष पक्षी पर भी है, अतः यहाँ नगर
वसाइये । शिवा के गव्द पर्यन्त सूत्र दीजिये ! राजा के आदेश से
नैमित्तिको ने पाटल वृक्ष के पूर्व से पश्चिम को, फिर उत्तर को
पाटलिपुत्रनगर-कल्प १५५
फिर पुन पूर्व को और फिर दक्षिण को शिवा शब्दावधि जाने पर
सूत्र डाल दिया ।
इस प्रकार चौकोर नगर का सन्निवेश हो गया । उस अकन
किये हुए प्रदेश मे राजा ने नगर बसाया । वही पाटल वृक्ष के
नाम से पाटलीपुत्र नगर और विविध कुसुम वाहुल्य से कुसुमपुर
नाम भी रूढ हुआ । उसमे राजा ने नेमिनाथ भगवान का चैत्य
बनवाया । गजशाला, अश्वशाला, रथशाला, प्रासाद, सौध,
प्राकार, गोपुर, पण्यशाला, सत्रागार, पौषधगाला से रम्य उस
नगर मे उदयि राजा ने चिरकाल तक जैनधर्म पालन करते हुए
राज्य किया ।
हत्यारे (छद्मवेशी साधु) ने पौषध मे रहे हुए राजा उदयि
को स्वर्ग का अतिथि बना दिया, तब वहाँ नापित-गणिका का
पुत्र नन्द, भगवान महावीर के निर्वाण के साठ वर्ष बीतने पर
राजा हुआ । उसके वंग मे सात नन्द राजा हुए फिर नौवे नन्द-
राज के परमार्हत् कल्पक का वशज शकडाल मन्त्री हुआ । उसके
दो पुत्र स्थूलभद्र और श्रीयक थे एव यक्षा, यक्षदत्ता, भूता,
भूतदत्ता, एणा, रेणा, वेणा नामक सात पुत्रियाँ थी जो क्रमशः
एक से सात बार श्रुतपाठिनी स्मृति वाली हुई ।
उसी नगर मे कोशा वेश्या और उसकी बहिन उपकोशा
भी हुई ।
वही चाणक्य मन्त्री ने नन्द को मूल से उखाड कर मौर्यवंशी
चन्द्रगुप्त को स्थापित किया । उसी के वश मे विन्दुसार अशोकश्री,
कुणाल और उसका पुत्र त्रिखण्ड भरताधिप परमाहित, अनार्य
देशो मे भो श्रमण विहार प्रवर्त्तन करने वाला महाराजा संप्रति
हुआ ।
समस्त कला-कलापज्ञ मूलदेव, महा धनिक सार्थवाह अचल,
गणिकारत्न देवदत्ता भी आगे वही हुए ।
१५६ विविध तीर्थ-कल्प
कौभीषण गोत्र के उमास्वाति वाचक, —जो पाँच सौ संस्कृत
प्रकरणो की रचना से प्रसिद्ध हैं—ने यही तत्त्वार्थाधिगम की सभाष्य
रचना की । विद्वानो के परितोष के लिए वहाँ चौरासी वादशालाएँ
बनी हुई थी ।
वहाँ ऊँची तरंगो से गगनाङ्गणोत्सगित महानदी गंगा प्रवां-
हित है । उसके उत्तर दिशा मे निकट ही विपुल बालुका स्थल है
जहाँ पर चढकर कल्की और प्रातिपदाचार्य प्रमुख संघ का मलिल
प्लवन से निस्तरण हुआ ।
वही कल्की राजा व उसके वंशज धर्मदत्त, जितशत्रु, मेघ-
घोषादि होगे । वही नद राजा के ९९ द्रव्य कोटि, पाँच स्तूप
अन्तर्निहित विद्यमान हैं । जिन्हे लक्षणावती का सुलतान धन प्राप्त
करने की इच्छा से उन-उन उपक्रमो को कर लडकर नष्ट हो गया
ऐसा जाना गया है ।
यही श्री भद्रबाहु, महागिरि, सुहस्ति, वज्रस्वामी आदि युग-
प्रधान विचरे और प्रातिपदाचार्यादि विचरेगे ।
यही महाधनिक धन सेठ की पुत्री रुक्मिणी श्री वज्रस्वामी
को वरण करना चाहती थी जिसे निर्लोभ-चूडामणि उन आचार्य
भगवान ने प्रतिबोध दे प्रव्रजित किया ।
यही महर्षि सुदर्शन सेठ की अभया रानी ने व्यन्तरी होकर
उपसर्ग किये, पर वे अक्षुब्ध रहे ।
यही स्थूलिभद्र महामुनि ने षड्रसयुक्त आहार करते हुए
कोशा की चित्रशाला मे मदन का मद-मर्दन कर वर्षा काल
चातुर्मास किया । सिंहगुफावासी मुनि भी उनकी स्पर्द्धा से वही
आया और कोशा ने उससे लायी गई रत्नकम्बल को नाले मे
फेक कर प्रतिबोध दे पुन उसे चारित्र लक्ष्मी अङ्गीकार कराई ।
वही बारहवर्षी दुष्काल पडने पर गच्छ को देशान्तर भेजने
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पाटलिपुत्रनगर-कल्प १५७
पर श्री सुस्थिताचार्य के दो क्षुल्लक शिष्यो ने आँखो मे अदृश्या-
ञ्जन लगा कर चन्द्रगुप्त राजा के साथ कितने ही दिनो तक
भोजन किया। उसके बाद गुरु के प्रत्युपलभादि से विष्णुगुप्त की
भाँति उनका निर्वाह किया।
वहाँ श्री वज्रस्वामी ने नगर के नर-नारियो के सक्षोभ से
रक्षणार्थ पहिले दिन साधारण रूप बनाया। दूसरे दिन देगना-
रस-मुग्ध लोगो से—अहो भगवन् का रूप गुणानुरूप नही है—ऐसा
सुनकर उन अनेक लब्धि-सम्पन्न आचार्यमहाराज ने अपना सहज
अद्वितीय रूप बनाकर स्वर्णमय सहस्र दल पर बैठकर देगना दी
जिससे राजा आदि जनता को प्रमुदित किया।
उसो नगर मे सप्रभावातिशय वाली मातृदेवता थी, जिसके
प्रभाव से उस नगर को दूसरो के लिए हठ करके भी लेना अगक्य
था। चाणक्य के वचन से उसे उखाड देने पर फिर जनता ने
मातृमण्डल मे चन्द्रगुप्त और पर्वतक को पकड लिया।
इस प्रकार अनेक संविधान निधान उस नगर मे अठारह
विद्या, स्मृति-पुराण, भरत वात्स्यायन और चाणक्य रूप त्रिरत्न
मन्त्र, यंत्र-तंत्र विद्या मे, रसवाद, धातु-निधिवाद, अञ्जन-गुटिका,
पाद प्रलेप, रत्नपरीक्षा, वास्तुविद्या, पुरुप-स्त्री, गज, अश्व,
वृषभादि लक्षण, इन्द्रजालादि ग्रन्थो मे, काव्यो मे निपुणता
वाले और सुबह उठते ही नाम कीर्त्तन करने योग्य पुरुप रहते थे।
आर्यरक्षित भी इसी स्थान पर चौदह विद्याओ का अध्ययन
कर के दशपुर आये।
यहाँ ऐसे धनाढ्य निवास करते थे कि जो हजार योजन
जाने मे जितने हाथी के पद-चिह्न हो उन्हे प्रत्येक को हजार
सोर्नयो से परिपूर्ण कर सकते थे। और तिलो के आढक (माप)
बोने पर उगने से जितने तिल फले उतनी हजार स्वर्ण-मुद्राएँ घर
१५८ विविध तीर्थ-कल्प
मे थी। दूसरे धनाढ्य ऐसे थे जिन के घर एक दिन के उत्पन्न
गाय के मक्खन से मेघ वृष्टि प्रवहित पहाडो नदी के जल पूर को
बाँध सकते थे।
एक दिन मे जन्मे हुए नव किशोरो के स्कन्ध केशो द्वारा
पाटलिपुत्र नगर को चारो ओर से वींटा जा सकता था।
किसी की हवेली मे दो प्रकार के शालि रत्न भरे रहते थे जो
एक शालि वीज को वोने पर भिन्न-भिन्न शालिवीज उत्पन्न होते
थे। दूसरा गर्दभिका नामक शालि-धान्य था जो वार-वार काटने
पर पुन पुन उगता था।
गौड देश के भूषण पाटलिपुत्र-कल्प की रचना आगम मे श्री
जिनप्रभ सूरि ने की।
इसकी ग्रन्थ-संख्या १२५ और १९ अक्षर ऊपर है।
३७. श्रावस्तीनगरी-कल्प
श्री सम्भवनाथ जिनेश्वर को नमस्कार कर के दु खरूपी
सरिता को तरने मे नौका के सदृश सकल सुखो को उत्पन्न करने
वाली श्रावस्ती नगरी का संक्षिप्त कल्प कीर्त्तन करता हूँ।
अगण्य गुणगण वाले इसी दक्षिणार्द्ध भारतवर्ष मे कुणाला
(जनपद) मे श्रावस्ती नामक नगरी वर्त्तमान काल मे 'महेठ' नाम
से प्रसिद्ध-रूढ है। वहाँ आज भी गहन घन वन के मध्य स्थित श्री
श्रावस्तीनगरी-कल्प १५९
सम्भवनाथ प्रतिमा विभूषित गगनचुम्बी शिखर और पार्श्व स्थित
जिनबिम्बमण्डित देवकुलिका से अलंकृत, प्राकारपरिवृत जिनालय
विद्यमान है। उस चैत्य के द्वार के अनतिदूर वल्लि उल्लसित
अतुल्य पल्लवो की स्निग्ध छाया वाले बडी-बडी शाखाओ से
अभिराम रक्त अशोक के वृक्ष दिखाई देते हैं। उस जिनालय की
प्रतोली के कपाट संपुट मणिभद्र यक्ष के प्रभाव से सूर्यास्त होते
ही स्वयमेव बन्द हो जाते थे और सूर्योदय होते ही अपने आप
खुल जाते थे।
एक बार दुर्ललित काल के प्रभाव से अलाउद्दीन सुलतान के
हव्वस नामक मल्लिक ने वहराइच नगर से आ कर प्राकार-
दीवालें, कपाट और कतिपय प्रतिमाओ को भी भग्न कर डाला।
दूषम काल मे अधिष्ठायक देव भी मन्द प्रभाव वाले हो जाते हैं।
तथा यात्री-संघ के आने पर न्हवण-महोत्सव के समय उसी चैत्य
के शिखर पर एक चित्रक—चीता आ कर बैठ जाता है जो किसी
को भी भय नही करता। मंगल प्रदीप होने पर स्वस्थान चला
जाता है।
इस नगरी मे बौद्धायतन है जहाँ समुद्रवंशीय करावल्ल
नरेन्द्र के कुलोत्पन्न राजा लोग बौद्ध भक्त हैं। वे आज भी अपने
देव के समक्ष अलंकृत और विभूषित पलाण किया हुआ महातुरग
चढाते हैं। स्वसम्पदा से भगवान बुद्ध ने यही महाप्रभावी जागुली
विद्या प्रकाशित की थी।
यहाँ नाना प्रकार के चावल उत्पन्न होते है। उन सब चावलों
की जाति के एक-एक कण यदि एक बडे कटोरे मे डाले जाँय तो
वह शिखा पर्यन्त भर जाता है।
यहाँ भगवान सम्भवनाथ स्वामी के च्यवन-जन्म-दीक्षा और
केवलज्ञान कल्याणक हुए, जिन्हे सुरासुर नर भुवन मन रंजन
करने वाले मनाये गये।
कौशाम्बीपुरी मे उत्पन्न जितशत्रु नृपसचिव काश्यप पुत्र
यक्षा कुक्षी सम्भूत कपिल महर्षि हुए । पिता के वियोग होने पर
इसी नगरी मे पिता के मित्र इन्द्रदत्त उपाध्याय के पास विद्या-
ध्ययनार्थ आये और गालिभद्र सेट की दासी के वचनो से दो मासा
सोने के लिए याचना करते क्रमशः स्वयं बुद्ध हुए । एव पाच सौ
चोरो को प्रतिबोध दे कर सिद्ध हुए ।
यही पाँच सौ श्रमण और एक हजार आर्याओ से परिवृत
प्रथम निह्नव जमालि तिन्दुक उद्यान मे रहे। कुम्भकार ढँक ने
पहले अपनी शालामे स्थित भगवान की पुत्री प्रियदर्शना साध्वी को
साडी के एक प्रदेश मे अगार छुआ कर भगवान महावीर के वाक्य
“कयमाणे कडे” को मान्य कराया । उसी ने सब साधु-साध्वियो को
प्रतिबोध दे कर स्वामी के पास भेजा, एक जमालि ही विप्रतिपन्न
रहा ।
यही तिन्दुक उद्यान मे केशीकुमार श्रमण के पास गणधर
भगवान गौतम स्वामी ने कोष्टक उद्यान से आ कर परस्पर
सवाद किया और पचयाम धर्म स्वीकार कराया ।
भगवान महावीर यही एक वर्षाकाल विविध खण्ड-प्रतिमा
धारण कर रहे । शक्रेन्द्र ने पूजा की, विचित्र प्रकार के तप किये ।
यहाँ जितशत्रु-धारिणी के पुत्र स्कन्दकाचार्य उत्पन्न हुए जिन्हे
कुम्भकारकड नगर मे पालक ने पाँच सौ शिष्यो सहित घाणी मे
पिला दिया था ।
यही जितशत्रु राजा का पुत्र भद्र प्रव्रजित हो कर प्रतिमा
धारण कर विचरते हुए शत्रु-राज्य मे गया और उसे चोर समझ
कर राज-पुरुषो ने पकड कर उसके अग-छेदन कर क्षार देने के
लिए कठोर दर्भ से वीट दिया । वे मुक्त और सिद्ध हुए ।
राजगृहादि की भाँति इस नगरी मे भी ब्रह्मदत्त का परिभ्रमण
हुआ था ।
वाराणसीनगरी-कल्प १६१
यही अजितसेनाचार्य का शिष्य क्षुल्लककुमार जननी-
महत्तरा, आचार्य और उपाध्याय के कथन से बारह-बारह वर्ष
द्रव्य श्रमणत्व मे रहा । नाटक देखते हुए “सुट्ठु गाइय सुट्ठु
वाइय” इत्यादि गीतिका सुन कर युवराज, सार्थवाह पत्नी और
मंत्री के साथ प्रतिबोधप्राप्त हुआ ।
इस प्रकार अनेक सविधानक रत्नो की उत्पत्तिरूप यह भूमि
रोहणाचल जैसी है । जिनप्रवचन की भक्ति से जिनप्रभसूरि जी
ऐसा कहते है कि श्रावस्ती महातीर्थ का यह कल्प विद्वान लोग
पढे ।
श्रावस्ती नगरी का कल्प समाप्त हुआ । इसकी ग्रथ-सख्या
४२ है ।
३८. वाराणसीनगरी-कल्प
तत्त्व बतलाने वाले और सम्पूर्ण विघ्नो को दूर करने वाले
श्री सुपार्श्व और श्री पार्श्वनाथ भगवान को नमस्कार करके उत्तम
कल्पनाओ से भरा हुआ वाराणसी तीर्थ-रत्न का कल्प कहता हू ।
इसी दक्षिणार्द्ध भरत के मध्य खण्ड मे काशी जनपद के
अलङ्कारस्वरूप उत्तरवाहिनी त्रिदशवाहिनी—गगा से अलंकृत
धन-कनक-रत्नो से समृद्ध वाराणसी नामक नगरी अद्भुत गौरव
की निधान है । वरुणा और असि नाम की दोनो ही नदियाँ यहाँ
गगा मे आकर मिलने से वाराणसी नाम निरुक्ति से प्रसिद्ध है ।
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