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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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१५८ विविध तीर्थ-कल्प
मे थी। दूसरे धनाढ्य ऐसे थे जिन के घर एक दिन के उत्पन्न
गाय के मक्खन से मेघ वृष्टि प्रवहित पहाडो नदी के जल पूर को
बाँध सकते थे।
एक दिन मे जन्मे हुए नव किशोरो के स्कन्ध केशो द्वारा
पाटलिपुत्र नगर को चारो ओर से वींटा जा सकता था।
किसी की हवेली मे दो प्रकार के शालि रत्न भरे रहते थे जो
एक शालि वीज को वोने पर भिन्न-भिन्न शालिवीज उत्पन्न होते
थे। दूसरा गर्दभिका नामक शालि-धान्य था जो वार-वार काटने
पर पुन पुन उगता था।
गौड देश के भूषण पाटलिपुत्र-कल्प की रचना आगम मे श्री
जिनप्रभ सूरि ने की।
इसकी ग्रन्थ-संख्या १२५ और १९ अक्षर ऊपर है।
३७. श्रावस्तीनगरी-कल्प
श्री सम्भवनाथ जिनेश्वर को नमस्कार कर के दु खरूपी
सरिता को तरने मे नौका के सदृश सकल सुखो को उत्पन्न करने
वाली श्रावस्ती नगरी का संक्षिप्त कल्प कीर्त्तन करता हूँ।
अगण्य गुणगण वाले इसी दक्षिणार्द्ध भारतवर्ष मे कुणाला
(जनपद) मे श्रावस्ती नामक नगरी वर्त्तमान काल मे 'महेठ' नाम
से प्रसिद्ध-रूढ है। वहाँ आज भी गहन घन वन के मध्य स्थित श्री