विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवाराणसीनगरी-कल्प १६१
यही अजितसेनाचार्य का शिष्य क्षुल्लककुमार जननी-
महत्तरा, आचार्य और उपाध्याय के कथन से बारह-बारह वर्ष
द्रव्य श्रमणत्व मे रहा । नाटक देखते हुए “सुट्ठु गाइय सुट्ठु
वाइय” इत्यादि गीतिका सुन कर युवराज, सार्थवाह पत्नी और
मंत्री के साथ प्रतिबोधप्राप्त हुआ ।
इस प्रकार अनेक सविधानक रत्नो की उत्पत्तिरूप यह भूमि
रोहणाचल जैसी है । जिनप्रवचन की भक्ति से जिनप्रभसूरि जी
ऐसा कहते है कि श्रावस्ती महातीर्थ का यह कल्प विद्वान लोग
पढे ।
श्रावस्ती नगरी का कल्प समाप्त हुआ । इसकी ग्रथ-सख्या
४२ है ।
३८. वाराणसीनगरी-कल्प
तत्त्व बतलाने वाले और सम्पूर्ण विघ्नो को दूर करने वाले
श्री सुपार्श्व और श्री पार्श्वनाथ भगवान को नमस्कार करके उत्तम
कल्पनाओ से भरा हुआ वाराणसी तीर्थ-रत्न का कल्प कहता हू ।
इसी दक्षिणार्द्ध भरत के मध्य खण्ड मे काशी जनपद के
अलङ्कारस्वरूप उत्तरवाहिनी त्रिदशवाहिनी—गगा से अलंकृत
धन-कनक-रत्नो से समृद्ध वाराणसी नामक नगरी अद्भुत गौरव
की निधान है । वरुणा और असि नाम की दोनो ही नदियाँ यहाँ
गगा मे आकर मिलने से वाराणसी नाम निरुक्ति से प्रसिद्ध है ।
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