विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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कौभीषण गोत्र के उमास्वाति वाचक, —जो पाँच सौ संस्कृत
प्रकरणो की रचना से प्रसिद्ध हैं—ने यही तत्त्वार्थाधिगम की सभाष्य
रचना की । विद्वानो के परितोष के लिए वहाँ चौरासी वादशालाएँ
बनी हुई थी ।
वहाँ ऊँची तरंगो से गगनाङ्गणोत्सगित महानदी गंगा प्रवां-
हित है । उसके उत्तर दिशा मे निकट ही विपुल बालुका स्थल है
जहाँ पर चढकर कल्की और प्रातिपदाचार्य प्रमुख संघ का मलिल
प्लवन से निस्तरण हुआ ।
वही कल्की राजा व उसके वंशज धर्मदत्त, जितशत्रु, मेघ-
घोषादि होगे । वही नद राजा के ९९ द्रव्य कोटि, पाँच स्तूप
अन्तर्निहित विद्यमान हैं । जिन्हे लक्षणावती का सुलतान धन प्राप्त
करने की इच्छा से उन-उन उपक्रमो को कर लडकर नष्ट हो गया
ऐसा जाना गया है ।
यही श्री भद्रबाहु, महागिरि, सुहस्ति, वज्रस्वामी आदि युग-
प्रधान विचरे और प्रातिपदाचार्यादि विचरेगे ।
यही महाधनिक धन सेठ की पुत्री रुक्मिणी श्री वज्रस्वामी
को वरण करना चाहती थी जिसे निर्लोभ-चूडामणि उन आचार्य
भगवान ने प्रतिबोध दे प्रव्रजित किया ।
यही महर्षि सुदर्शन सेठ की अभया रानी ने व्यन्तरी होकर
उपसर्ग किये, पर वे अक्षुब्ध रहे ।
यही स्थूलिभद्र महामुनि ने षड्रसयुक्त आहार करते हुए
कोशा की चित्रशाला मे मदन का मद-मर्दन कर वर्षा काल
चातुर्मास किया । सिंहगुफावासी मुनि भी उनकी स्पर्द्धा से वही
आया और कोशा ने उससे लायी गई रत्नकम्बल को नाले मे
फेक कर प्रतिबोध दे पुन उसे चारित्र लक्ष्मी अङ्गीकार कराई ।
वही बारहवर्षी दुष्काल पडने पर गच्छ को देशान्तर भेजने