विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंथा वही से लाई हूँ, अत. प्रायश्चित्त का कोई प्रश्न नही। गुरु
महाराज ने कहा—छद्मस्थ होकर कैसे जाना ? उसने कहा—मुझे
कैवल्य है । तब मैने केवली की आगातना की, मेरा दुष्कृत्य
मिथ्या हो । ऐसा कहते हुए गच्छाधिप ने पूछा कि—मैं सिद्ध हूँगा
कि नही ? केवली ने कहा—अधृति न करे, आपको गगा पार
होते समय केवलज्ञान होगा । तब गगा पार होने के लिए सूरिजी
नौका मे बैठे। वे जिधर-जिधर बैठते उधर ही नौका डूबने
लगती, फिर बीच में बैठने से सारी नौका डूबने लगी। लोगो ने
सूरिजी को नदी में फेंक दिया। दुहागिन बना देने से वैर से पूर्व
भव की पत्नी जो व्यन्तरी हुई थी—ने जल मे शूली पर रख
लिया । शूली पर भी उन्होने “मेरे से अप्काय जीवो की विराधना
हो रही है”—इस आत्म-पोडा से क्षपक श्रेणी आरोहण कर अन्त -
कृत केवली होकर सिद्धि प्राप्त की। निकटवर्त्ती देवो ने उनकी
निर्वाण महिमा की । अतः वह तीर्थ “प्रयाग” नाम से जगत्प्रसिद्ध
हुआ। जहाँ प्रकृष्ट याग-पूजा हो वह प्रयाग, यह अन्वयार्थ है।
शूली पिरोने की गतानुगतिकता से पर दर्शनी लोग आज भी
अपने अंग पर करौत दिलाते हैं। वहाँ के वट वृक्ष को तुर्को द्वारा
काट डालने पर भी बार-बार उग जाता है।
सूरिजी की खोपडी के दो टुकडे होने पर भी जल की लहरें
उन्हे किनारे ले गई । सीप की भाँति इधर-उधर तैरते नदी तट
के किसी गुप्त विषम प्रदेश मे अटक कर रह गई। उस खोपडी
मे कभी पाटल वृक्ष का वीज गिर कर ऊगा । और उसे भेद कर
गर्दन के दक्षिण ओर यह विशाल पाटल वृक्ष हो गया । इस
पाटल वृक्ष का प्रभाव चाष पक्षी पर भी है, अतः यहाँ नगर
वसाइये । शिवा के गव्द पर्यन्त सूत्र दीजिये ! राजा के आदेश से
नैमित्तिको ने पाटल वृक्ष के पूर्व से पश्चिम को, फिर उत्तर को