विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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पाटलिपुत्रनगर-कल्प १५७
पर श्री सुस्थिताचार्य के दो क्षुल्लक शिष्यो ने आँखो मे अदृश्या-
ञ्जन लगा कर चन्द्रगुप्त राजा के साथ कितने ही दिनो तक
भोजन किया। उसके बाद गुरु के प्रत्युपलभादि से विष्णुगुप्त की
भाँति उनका निर्वाह किया।
वहाँ श्री वज्रस्वामी ने नगर के नर-नारियो के सक्षोभ से
रक्षणार्थ पहिले दिन साधारण रूप बनाया। दूसरे दिन देगना-
रस-मुग्ध लोगो से—अहो भगवन् का रूप गुणानुरूप नही है—ऐसा
सुनकर उन अनेक लब्धि-सम्पन्न आचार्यमहाराज ने अपना सहज
अद्वितीय रूप बनाकर स्वर्णमय सहस्र दल पर बैठकर देगना दी
जिससे राजा आदि जनता को प्रमुदित किया।
उसो नगर मे सप्रभावातिशय वाली मातृदेवता थी, जिसके
प्रभाव से उस नगर को दूसरो के लिए हठ करके भी लेना अगक्य
था। चाणक्य के वचन से उसे उखाड देने पर फिर जनता ने
मातृमण्डल मे चन्द्रगुप्त और पर्वतक को पकड लिया।
इस प्रकार अनेक संविधान निधान उस नगर मे अठारह
विद्या, स्मृति-पुराण, भरत वात्स्यायन और चाणक्य रूप त्रिरत्न
मन्त्र, यंत्र-तंत्र विद्या मे, रसवाद, धातु-निधिवाद, अञ्जन-गुटिका,
पाद प्रलेप, रत्नपरीक्षा, वास्तुविद्या, पुरुप-स्त्री, गज, अश्व,
वृषभादि लक्षण, इन्द्रजालादि ग्रन्थो मे, काव्यो मे निपुणता
वाले और सुबह उठते ही नाम कीर्त्तन करने योग्य पुरुप रहते थे।
आर्यरक्षित भी इसी स्थान पर चौदह विद्याओ का अध्ययन
कर के दशपुर आये।
यहाँ ऐसे धनाढ्य निवास करते थे कि जो हजार योजन
जाने मे जितने हाथी के पद-चिह्न हो उन्हे प्रत्येक को हजार
सोर्नयो से परिपूर्ण कर सकते थे। और तिलो के आढक (माप)
बोने पर उगने से जितने तिल फले उतनी हजार स्वर्ण-मुद्राएँ घर