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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 238, कुल 442 में से

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पृष्ठ 238

पाटलिपुत्रनगर-कल्प १५५

फिर पुन पूर्व को और फिर दक्षिण को शिवा शब्दावधि जाने पर
सूत्र डाल दिया ।
इस प्रकार चौकोर नगर का सन्निवेश हो गया । उस अकन
किये हुए प्रदेश मे राजा ने नगर बसाया । वही पाटल वृक्ष के
नाम से पाटलीपुत्र नगर और विविध कुसुम वाहुल्य से कुसुमपुर
नाम भी रूढ हुआ । उसमे राजा ने नेमिनाथ भगवान का चैत्य
बनवाया । गजशाला, अश्वशाला, रथशाला, प्रासाद, सौध,
प्राकार, गोपुर, पण्यशाला, सत्रागार, पौषधगाला से रम्य उस
नगर मे उदयि राजा ने चिरकाल तक जैनधर्म पालन करते हुए
राज्य किया ।
हत्यारे (छद्मवेशी साधु) ने पौषध मे रहे हुए राजा उदयि
को स्वर्ग का अतिथि बना दिया, तब वहाँ नापित-गणिका का
पुत्र नन्द, भगवान महावीर के निर्वाण के साठ वर्ष बीतने पर
राजा हुआ । उसके वंग मे सात नन्द राजा हुए फिर नौवे नन्द-
राज के परमार्हत् कल्पक का वशज शकडाल मन्त्री हुआ । उसके
दो पुत्र स्थूलभद्र और श्रीयक थे एव यक्षा, यक्षदत्ता, भूता,
भूतदत्ता, एणा, रेणा, वेणा नामक सात पुत्रियाँ थी जो क्रमशः
एक से सात बार श्रुतपाठिनी स्मृति वाली हुई ।
उसी नगर मे कोशा वेश्या और उसकी बहिन उपकोशा
भी हुई ।
वही चाणक्य मन्त्री ने नन्द को मूल से उखाड कर मौर्यवंशी
चन्द्रगुप्त को स्थापित किया । उसी के वश मे विन्दुसार अशोकश्री,
कुणाल और उसका पुत्र त्रिखण्ड भरताधिप परमाहित, अनार्य
देशो मे भो श्रमण विहार प्रवर्त्तन करने वाला महाराजा संप्रति
हुआ ।
समस्त कला-कलापज्ञ मूलदेव, महा धनिक सार्थवाह अचल,
गणिकारत्न देवदत्ता भी आगे वही हुए ।