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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 242

श्रावस्तीनगरी-कल्प १५९
सम्भवनाथ प्रतिमा विभूषित गगनचुम्बी शिखर और पार्श्व स्थित
जिनबिम्बमण्डित देवकुलिका से अलंकृत, प्राकारपरिवृत जिनालय
विद्यमान है। उस चैत्य के द्वार के अनतिदूर वल्लि उल्लसित
अतुल्य पल्लवो की स्निग्ध छाया वाले बडी-बडी शाखाओ से
अभिराम रक्त अशोक के वृक्ष दिखाई देते हैं। उस जिनालय की
प्रतोली के कपाट संपुट मणिभद्र यक्ष के प्रभाव से सूर्यास्त होते
ही स्वयमेव बन्द हो जाते थे और सूर्योदय होते ही अपने आप
खुल जाते थे।
एक बार दुर्ललित काल के प्रभाव से अलाउद्दीन सुलतान के
हव्वस नामक मल्लिक ने वहराइच नगर से आ कर प्राकार-
दीवालें, कपाट और कतिपय प्रतिमाओ को भी भग्न कर डाला।
दूषम काल मे अधिष्ठायक देव भी मन्द प्रभाव वाले हो जाते हैं।
तथा यात्री-संघ के आने पर न्हवण-महोत्सव के समय उसी चैत्य
के शिखर पर एक चित्रक—चीता आ कर बैठ जाता है जो किसी
को भी भय नही करता। मंगल प्रदीप होने पर स्वस्थान चला
जाता है।
इस नगरी मे बौद्धायतन है जहाँ समुद्रवंशीय करावल्ल
नरेन्द्र के कुलोत्पन्न राजा लोग बौद्ध भक्त हैं। वे आज भी अपने
देव के समक्ष अलंकृत और विभूषित पलाण किया हुआ महातुरग
चढाते हैं। स्वसम्पदा से भगवान बुद्ध ने यही महाप्रभावी जागुली
विद्या प्रकाशित की थी।
यहाँ नाना प्रकार के चावल उत्पन्न होते है। उन सब चावलों
की जाति के एक-एक कण यदि एक बडे कटोरे मे डाले जाँय तो
वह शिखा पर्यन्त भर जाता है।
यहाँ भगवान सम्भवनाथ स्वामी के च्यवन-जन्म-दीक्षा और
केवलज्ञान कल्याणक हुए, जिन्हे सुरासुर नर भुवन मन रंजन
करने वाले मनाये गये।