विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
पावापुरी-दीपावली-वृहत्कल्प ८५
होते हुए भी कोई नही पूछता था। ब्राह्मणो ने उसका फल इस
प्रकार कहा—गुणवान महात्मा और सज्जनो की पूजा नही होगी
और ऋद्धि भी नही होगी। निर्गुण स्थान, पापी और दुष्ट लोगो
को प्राय कलियुग मे पूजा सत्कार और ऋद्धि प्राप्त होगी।
आगे चल कर राजा ने एक सूक्ष्म छिद्रो वाली शिला को
केशाग्र से बधे हुए अन्तरिक्ष स्थित देखा। वहाँ भी पूछने पर श्रेष्ठ
जनेऊधारी विप्र ने कहा—महाभाग ! कलिकाल मे शिला की
भाँति विपुल पाप होगा और बालाग्र जितना धर्म होगा। पर
उतने से धर्म के माहात्म्य से ही लोग कुछ समय निस्तार करेगे,
उसके टूटने पर सब डूव जायगा।
पूर्वाचार्यो ने भी लोकविख्यात कलियुग माहात्म्य को दूषम
काल मे इस प्रकार बतलाया है—
कूवावाहा जीवण-तरुफलवह-गावि वच्छ धावणया।
लोह विवज्ज(च्च)य कलिमल-सप्प गरुडपूअपूआय ॥१॥
अर्थ—आवाहोपजीवी कूप, फलो के लिए वृक्ष-वध, बछिया
द्वारा गौ का पालन, लोह-कटाह मे कलिमल पाक, सर्पों-दुष्टो की
पूजा और गरुड-धर्मी जनो-की अपूजा होगी।
हत्थगुलि दुग घट्टण-गय-गद्दभ-सगड़-वाल सिलधरण।
एमाई आहारणा लोयमि वि काल दोसेण ॥२॥
अर्थ—दो अंगुलियाँ हाथ का घट्टन करेगी, हाथी के योग्य
शकट गर्दभ लेगे, वालो से शिलाधारण, आदि इस तरह की बाते
लोक मे कालदोष से होगी।
जयघर कलह कुलेयर मेरा अणु सुद्ध धम्म पुठवि ठिई।
वालुग वक्कारभो एमाई आइ सद्धेण ॥ ३ ॥
कलिअवयारे किय निज्जिएसु चउसुपि पडवेसु तहा।
भइ वहाइ कहाए जामि ग जोगमि कलिणाओ ॥ ४ ॥
८६ विविध तीर्थ-कल्प
तत्तो जुहिट्ठिलेण जियमि ठइयमि दाइए तमि ।
एमाई अट्ठुत्तर सएण सिट्ठा नियठिइ त्ति ॥ ५ ॥
इन गाथाओ का अर्थ
कूप से आवाह आजीविका करेगा। इसका उपनय राजा कूप-
स्थानीय है वह आवाहस्थानीय ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र सभी के
भरण-पोषण करने योग्य है पर कलियुग-दोष से उन्ही से अर्थ
ग्रहण करेगा (१)। तथा फल के लिए वृक्ष का वध और छेद होगा।
फलतुल्य पुत्र तरुतुल्य पिता का वध-हानि-उद्वेग, धनप्राप्ति
लेखनादि से उपार्जन करेगे (२)। वछिया तुल्य कन्या के विक्रय
से गोतुल्य जननी धावन तुल्य उपजीवन करेगी (३)। लोहमयी
कडाई—जो सुगन्धित तैल-घृत पाक के उचित है उसमे कलिमल
रूप पिशित आदि का पाक होगा। याने स्वजाति वर्ग को छोड-
कर अनालवद्ध पराये जनो मे अर्थदान होगा, ये भाव है (४)। सांप
जैसे धर्मवर्जित निर्दयो का दानादि सत्कार होगा, गरुड़ स्थान
पूज्य धर्माचार्यों की अपूजा होगी (५)।
दो अगुलियो से हाथ का घाटन और स्थापन होगा। हाथ के
तुल्य पिता का अंगुली द्वय तुल्य बहुत से पुत्रो द्वारा जयघर झगडा
करने-वशीभूत करने वाले घट्टण नामक लोग होगे (६)। हाथी से
वहन करने वाले शकट को गर्दभ के द्वारा ग्रहण किए देखा। उसका
फल—गजस्थानीय उच्चकुलो मे जो मर्यादा रूपी शकट वाहन
के उचित थे उनमे कलह और पुनर्विवाह होगे। इतर गर्दभ
स्थानीय नीच कुलो मे उत्तम नीति होगी (७)। बाल से बंधी हुई
शिला आकाश मे लटकती देखी, थोडा भी सूक्ष्मतर बाल स्थानीय
शास्त्रानुसार शुद्ध धर्म है। शिला तुल्य पृथ्वी उसके निवासी लोग
स्थिति निर्वाह करेगे (८)। जैसे वालुका से बनाई रस्सी नही
पकडी जा सकती उसी प्रकार वाणिज्य-कृषि, सेवा आदि आरभ
से भी विशिष्ट प्रासादानुरूप फल प्राप्त नही होगा (९)।
पावापुरी-दीपावली-वृहत्कल्प ८७
शेष दो गाथाओ का अर्थ कथानकगम्य है वह इस प्रकार है—
पाँच पाडवो ने दुर्योधन, दु शासनादि सौ भाइयो और कर्ण,
गांगेय, द्रोणाचार्य आदि संग्राम के अग्रणी लोगो को मार दिया।
बहुत काल तक राज्य का परिपालन कर कलियुग-प्रवेग के समय
महापथ मे प्रस्थान किया। किसी वन-प्रान्त मे पहुचे, वहाँ रात्रि
मे युधिष्ठिर ने भीम आदि को प्रतिप्रहर प्रहरिक—पहरेदार रूप से
नियुक्त किया। धर्मपुत्रादि के सो जाने पर पुरुप रूप करके कलि
भीम के सम्मुख उपस्थित हुआ। उसने भीम से कहा—अरे!
भाइयो, गुरुओ, पितामह आदि को मार कर अव तुम धर्मार्थ जा
रहे हो ? यह तुम्हारा कैसा धर्म है। तब भीम क्रुद्ध हो कर उसके
साथ युद्ध करने लगा जैसे जैसे भीम युद्ध करता था वैसे वैसे कलि
वढता जाता था, कलि ने भीम को जीत लिया। इसी प्रकार दूसरे
प्रहर मे अर्जुन को, तीसरे मे नकुल को और चौथे मे सहदेव को
उसने कहा। उन्होने क्रोध किया और वे भी हार गए। कुछ रात्रि
शेष रहे युधिष्ठिर उठे, कलि उनके साथ भी युद्ध करने को प्रस्तुत
हुआ। तब गान्ति से ही राजा ने कलि को जीत लिया और छोटा
सा बना कर सराव मे बैठा दिया और प्रात भीमादि को दिखला
कर कहा—यह वही है जिसने तुम्हे जीत लिया था। इत्यादि
कलिस्थिति के १०८ हृष्टान्त महाभारत मे व्यास ऋषि ने दिखाये
हैं। अस्तु,
तदनन्तर गौतम स्वामी ने जानते हुए भी पूछा—भगवान् !
आपके निर्वाणानन्तर क्या-क्या होगा ? प्रभु ने कहा—गौतम !
मेरे निर्वाण के तीन वर्ष साढे आठ मास बीतने पर पाँचवा दु षम
आरा लगेगा। मेरे मोक्ष गमन के ६४ वर्ष हो जाने पर अन्तिम
केवली जम्बूस्वामी मुक्ति जावेगे। उन्ही के साथ मन पर्यव ज्ञान,
परमावधि ज्ञान, पुलाक लब्धि, आहारक गरीर, क्षपकश्रेणी,
उपशमश्रेणी, परिहार विशुद्ध-सूक्ष्म सपराय और यथाख्यात
चारित्र, केवलज्ञान और सिद्धि गमन ये बारह स्थान भारतवर्ष मे
विच्छेद हो जाएँगे ।
अज्ज सुहम्मप्पमुहा होंहिति जुगप्पहाण आयरिया ।
दुप्पसहो जा सूरी चउरहिआ दोण्णि अ सहस्सा ॥१॥
[ आर्य सुधर्म आदि से लेकर दु प्रसह सूरि पर्यन्त दो हजार
चार युग प्रधानाचार्य होगे ।]
एक सौ सत्तर से कुछ अधिक वर्ष बीतने पर स्थूलिभद्र के
स्वर्गस्थ होने पर अंतिम चार पूर्व, समचतुरस्र सस्थान, वज्र
ऋषभ नाराच संघयण, और महाप्राण ध्यान विच्छेद हो जाएँगे ।
पाँच सौ वर्ष बीतने पर आर्यवज्र के साथ दशवाँ पूर्व और चतुष्क
संघयण नष्ट हो जायगा ।
मेरे मोक्षगमन के पश्चात् पालक, नंद, चंद्रगुप्त आदि राजाओ
के हो जाने के पश्चात् चार सौ सत्तर वर्ष बाद विक्रमादित्य राजा
होगा । इस बीच ६० वर्ष पालक का राज्य, १५५ वर्ष नन्दो का,
१०८ वर्ष मौर्यवंशियो का, ३० वर्ष पुष्यमित्र का, ६० वर्ष
बलमित्र-भानुमित्र का, ४० वर्ष नरवाहन का, १३ वर्ष गर्दभिल्ल
का, ४ वर्ष शको का फिर विक्रमादित्य का राज्य होगा । वह
स्वर्णपुरुष सिद्ध किया हुआ और पृथ्वी को अनृण करके अपना
संवत्सर चलायगा ।
निर्वाण के चार सौ त्रेपन वर्ष वाद गुण शत कलित श्रुत
प्रयुक्त, गर्दभिल्ल के छेदक कालकाचार्य होगे ।
दूषम काल के प्रभाव से बडे नगर गाँव जैसे हो जाएँगें और
गाँव स्मशान जैसे हो जावेंगे । राजा लोग यमदण्ड जैसे, कौटुम्बिक
दासप्राय सरकारी कर्मचारी घूसखोर, भृत्य स्वामीद्रोही, सासूएँ
कालरात्रितुल्य, बहुएँ सर्पिणीतुल्य, कुलाङ्गनाएँ निर्लज्ज कटाक्षो से
देखने वाली वेश्याचरण शिक्षित होगी । पुत्र और शिष्य स्वच्छन्द-
चारी होगे। मेघ असमय वर्षी और समय पर नही वर्षने वाले
होगे। दुर्जन लोग सुखी और ऋद्धि-सम्मान के पात्र होगे। सज्जन
अल्प ऋद्धि वाले, अपमानपात्र और दुखी होगे। देश में परचक्र,
डमर, दुर्भिक्ष, आदि दुख होगे। अधिकांश पृथ्वि क्षुद्र सत्व हो
जायगी। विप्र लोग धनलोभी और अस्वाध्यायी होगे। श्रमण
लोग कषाय कलुषित मन वाले मन्दधर्मी और गुरुकुल-वासत्यागी
होगे। सम्यग्दृष्टि सत्पुरुष अल्पवल और मिथ्यादृष्टि प्रचुर
शक्तिशाली होगे। देव दर्शन नही देंगे। विद्या-मंत्र उस प्रकार के
प्रभावशाली नही रहेगे। औषधियाँ, गोरस, कर्पूर, शर्करादि द्रव्यो
के रस, वर्ण, गन्धादि की हानि होगी। मनुष्यो के वल, बुद्धि और
आयुष्य का ह्रास हो जायगा। मासकल्पादि के योग्य क्षेत्र नही
रहेगे। प्रतिमारूप श्रावक धर्म का विच्छेद हो जायगा। आचार्य
भी शिष्यो को सम्यक् श्रुत नही देगे।
भरतादि दश क्षेत्रो मे श्रमण कलहकारी, डमर कारी,
असमाधि करने वाले और अनिवृत्तिकारक होगे। मुनियो के दिन
व्यवहार, मन्त्र-तन्त्रादि मे बीतेंगे और इन्ही की साधना मे लग
जाने से उस अनर्थलुब्धो का आगमार्थ नष्ट हो जायगा। जिस
प्रकार राजा व्यापारियो से धन लेने के लिए युद्ध करेगे वैसे ही
साधु लोग भी श्रावको से उपकरण, वस्त्र, पात्र, वसति आदि के
लिए लड़ेंगे। अधिक क्या ? मुण्ड बहुत किन्तु साधु अल्प होगे।
पूर्वाचार्य परम्परागत समाचारी को छोड कर स्वमति
विकल्पित समाचारी को “यही सम्यक् ‘चारित्र है!’” ऐसा कहते
हुए तथा विविध मुग्धजनो को मोह मे डाल कर उत्सूत्रभाषी, अल्प
स्तुति और परनिन्दापरायण कितने ही साधु होगे। म्लेच्छ नृप
बलवान और हिन्दू राजा अल्प बल वाले होगे।
निर्वाण के यावत् १९१४ वर्ष बीतने पर विक्रम संवत् १४४४
मे पाटलिपुत्र नगर मे चैत्र शुक्ल ८ की अर्द्ध रात्रि-वृष्टिकरण-मकर-
९० विविध तीर्थ-कल्प
लग्न मे जिसके मतातर मे 'मगदण' नामक चाण्डाल कुल वाले
के घर जसदेवी की कुक्षि से कल्कि गजा का जन्म होगा। कोई
ऐसा भी कहते हैं
"भगवान महावीर के १९२८ वर्ष पाच मास बीतने पर चाण्डाल
कुल मे कल्कि राजा होगा।" उसके तीन नाम होगे—कइ, कल्कि
और चतुर्मुख। उसके जन्म-समय मे मथुरा मे राम और मधुसूदन
का भवन कही भी गुप्त रहा हुआ गिरेगा। दुर्भिक्ष, डमर, रोगो
से जन पीडित होगे। अठारहवे वर्ष मे कार्त्तिक शुक्ल पक्ष मे
कल्कि का राज्याभिषेक होगा। लोगो के मुख से ज्ञात कर वह
नन्द राजा के पाँच स्वर्ण स्तूप ग्रहण करेगा। चमडे के सिक्के
चलावेगा। दुष्टो का पालन और श्रेष्ठ पुरुषो का निग्रह करेगा।
पृथ्वी को साधन कर छत्तीसवे वर्ष मे त्रिखण्ड भरत का अधिपति
होगा। खोद खोद कर सभी निधानो को ग्रहण करेगा।
उसके भण्डार मे ९९ कोटा कोटि सुवर्ण, चौदह हजार हाथी,
सत्यासी लाख घोडे, पाँच करोड़ हिन्दु तुर्क और काफिरो की
पदाति होगी। उसका एकछत्र राज्य होगा। द्रव्य के लिए राज-
मार्ग पर खनन करते हुए पाषाणमय लवणदेवी नामक गाय प्रकट
होकर गौचरी-चर्या मे गए साधुओ को सीगो से मारेगी। उनके
प्रतिपदाचार्य को कहने पर वे आदेग देगे कि इस नगर की पृथ्वी
पर जल का उपसर्ग होगा। तब कुछ साधु अन्यत्र विहार कर
जावेगे। कितने ही वसति प्रतिबन्ध से तद्ग्रहणार्थ वही ठहरेंगे।
सत्तरह दिन की वृष्टि से सर्वार्थ निधान प्रगट होगे। गंगा मे सारा
नगर डूब जायगा। राजा और सघ उत्तर दिशा मे रहे हुए विस्तृत
स्थल पर चढकर वचेगे। राजा वहाँ पर नया नगर बसावेगा।
सभी धर्म वाले उससे दण्ड पावेंगे। साधुओ के पास भिक्षा मे से
षष्ठाश माँगने पर कायोत्सर्ग से आहूत गासनदेवी निवारण करेगी।
पचासवे वर्ष मे सुभिक्ष होगा। एक द्रम्म मुद्रा मे धान्य की द्रोणी
पावापुरी-दीपावली-बृहत्कल्प ९१
मिलेगी । इस प्रकार निष्कण्टक राज्य का उपभोग कर छयासीवे
वर्ष मे फिर सभी पाखडियो को दण्डित कर सब लोगो
को निर्धन करके साधुओ से भी भिक्षा मे षष्ठांश माँगेगा ।
न देने पर उन्हे कारागार मे डाल देगा । तब प्रतिपदाचार्य
प्रमुख सघ शासनदेवीका ध्यान कर कायोत्सर्ग मे रहेगे । उसके
बोध देने पर भी जब वह पाप निवृत्त नही होगा तब आसन काँपने
पर शक्रेन्द्र ब्राह्मण का रूप धारण कर आवेगा । जब उसका भी
वचन न मानेगा तो शक्रेन्द्र के चपेट से आहत होकर मर के नरक
जावेगा । तब उसका धर्मदत्त नामक पुत्र राज्यारूढ किया
जायगा । सघ को स्वस्थ रखने का आदेश देकर शक्र स्वस्थान
चला जायगा । दत्त राजा बहत्तर वर्षायु पर्यन्त प्रतिदिन पृथ्वी
को जिन चैत्य मण्डित करेगा और लोगो को भी सुखी करेगा ।
दत्त का-पुत्र जितशत्रु और उसका पुत्र मेघघोष होगा । कल्कि के
पश्चात् महानिशीथ सूत्र नही रहेगा । दो हजार वर्ष की स्थिति
वाले भस्मराशि ग्रह की पीडा दूर होने पर देव भी दर्शन देगे ।
विद्यामंत्र भी अल्प जाप से प्रभाव दिखाएँगे । अवधिज्ञान और
जातिस्मरण भाव भी कही प्रगट होगे । उसके पश्चात् उन्नीस
हजार वर्ष पर्यन्त जैन धर्म वर्तेगा । दूषम काल के शेष मे बारह
वर्षीय दो हाथ शरीर वाले प्रव्रजित, दशवैकालिक आगमधर,
साढे तीन श्लोक प्रमाण सूरिमंत्र जाप करने वाले और उत्कृष्ट
छठ्ठ (वेला = दो उपवास) तप करने वाले दुप्पसह नामक आचार्य
अन्तिम युग प्रधान होगे । वे आठ वर्ष सयम पालन कर बीस वर्ष
की आयु मे अष्टम तप से अनशन करके सौधर्म देवलोक मे पल्यो-
पम आयु वाले एकावतारी देव उत्पन्न होगे ।
दुप्पसह आचार्य, फल्गुश्री आर्या, नागिल श्रावक और
सत्यश्री श्रावका—ये अन्तिम सघ पूर्वाह्न मे भारतवर्ष मे अस्तगत
होगे । मध्याह्न मे विमलवाहन राजा और सुमुख मंत्रो भी
(शेष होगे) अपराह्न मे अग्नि नष्ट होगी, इस प्रकार धर्म-राजनीति
पाक आदिका विच्छेद होगा । इस प्रकार पाँचवाँ दूपम आरा
सम्पूर्ण होगा ।
तत्पश्चात् छठे दु षम दु पम आरे के प्रवर्त्तन होने से प्रलय
वायु चलेगी, विषाक्त जलधर वर्षेंगे । सूर्य बारह गुणा तपेगा,
चन्द्रमा अत्यन्त शीत छोडेगा । गंगा-सिन्धु के दोनो किनारो मे
वैताढ्य मूल में बहत्तर बिलो मे छ खण्ड भरतवासी मनुष्य और
तिर्यंच निवास करेगे । वैताढ्य के इधर के पूर्व पश्चिम गंगा तटो
पर नौ नौ बिल इसी प्रकार वैताढ्य पर भी होगे इस प्रकार
छत्तीस हुए । इसी प्रकार सिन्धु तट पर भी छत्तीस होने से कुल
मिलाकर बहत्तर बिल होगे । रथमार्ग जितने चौडे गंगा-सिन्धु के
प्रवाह-जल में उत्पन्न मच्छादि को वे बिलवासी रात मे निकालेगे ।
दिन मे वे ताप के भय से निकालने में असमर्थ होगे । सूर्य-किरणो
से पकने पर वे उन्हे रात्रि में खावेंगे । औषधि, वृक्ष, ग्राम, नगर,
जलाशय, पर्वतादि वैताढ्य ऋषभकूट को छोडकर कही भी निवेश
स्थान नही देखेंगे । सोलह वर्ष की स्त्री और बीस वर्ष के पुरुष
पौत्र-अपौत्र देखेगे । एक हाथ प्रमाण काली कुरूप देह, उग्र-कषाय,
नग्न प्राय नरकगामी बिलवासी इक्कीस, हजार वर्ष पर्यन्त
होगे । इस प्रकार छठ्ठे आरे-अवसर्पिणी के शेष होने पर उत्सर्पिणी
का पहला आरा भी ऐसा ही होगा । उसके शेष होने पर दूसरे
आरे के प्रारम्भ मे सात-सात दिन पाँच प्रकार के मेघ क्रमशः
भारतवर्ष मे वर्षेंगे । जैसे कि पहला पुष्करावर्त ताप दूर करेगा,
दूसरा क्षीरोद धान्योत्पत्ति करेगा, तीसरा घृतोदक स्निग्धकारी
होगा, चौथा अमृतोदक औषधि उत्पन्न करेगा, पाँचवां रसोदक
भूमि को सरस करेगा । वे बिलवासी प्रतिसमय शरीर आयु बढाते
हुए पृथिवी का सुख देखकर बिलो से बाहर निकलेगे, धान्य और
फल का भोजन करते हुए मासाहार छोड़ देंगे ।
पावापुरी-दीपावली-वृहत्कल्प ९३
फिर मध्य देश मे सात कुलकर होगे । उन मे पहला विमल-
वाहन, दूसरा सुदामा, तीसरा सगत, चौथा सुपार्श्व, पाँचवाँ दत्त,
छट्ठा सुमुख, सातवाँ समुची होगा । जातिस्मरण ज्ञान के द्वारा
विमलवाहन नगरादि बसावेगा । अग्नि के उत्पन्न होने पर अन्न
पाक, शिल्प आदि कला से समस्त लोकव्यवहार प्रवर्त्तन करेगा ।
फिर नवासी पक्ष अधिक उत्सर्पिणी काल के दो आरे बीतने पर
पुण्ड्रवर्द्धन देश के गतद्वार पुर मे समुद्र नरपति की भद्रा देवी के
चतुर्दश महास्वप्न सूचित श्रेणिक राजा का जीव रत्नप्रभा के
लोलकबुद्ध पाथडे से चौरासी हजार वर्ष की आयु पूर्ण कर उद्वर्त्त
करता हुआ कुक्षी मे पुत्र रूप से उत्पन्न होगा । वर्ण, प्रमाण,
-लाछन, आयु, गर्भापहार के अतिरिक्त पाचो कल्याणक मास,
तिथि, नक्षत्रादि मेरे जैसे ही होगे । अन्तर यह है कि वे नाम से
पद्मनाभ देवसेन और विमलवाहन होगे ।
फिर दूसरे तीर्थङ्कर सुपार्श्व के जीव सुरदेव, तीसरे उदायी
के जीव सुपार्श्व, चतुर्थ पोटिल का जीव स्वयप्रभ, पाँचवे दृढायु
के जीव सर्वानुभूति, छट्ठे कार्तिक के जीव देवश्रुत, सातवे संख
के जीव उदय, आठवे आनंद के जीव पेढाल, नवे सुनन्द के जीव
पोटिल, दशवे शतक के जीव शतकीर्त्ति, ग्यारहवे देवकी के जीव
मुनि सुव्रत, वारहवे कृष्ण के जीव अमम, तेरहवें सत्यकी
के जीव निष्कष्याय, चौदहवे वलदेव के जीवनिष्पुलाक, पन्द्रहवें
सुलसा के जीव निर्मम, सोलहवे रोहिणी के जीव चित्रगुप्त
तीर्थङ्कर होगे। फिर कुछ लोग कहते हैं कल्कि का दत्त नामक
पुत्र विक्रम संवत् १५७३ मे शत्रुञ्जय उद्धार कराके जिन भवन
मण्डित वसुधा करके, तीर्थङ्कर नाम कर्म उपार्जन कर स्वर्ग
जाकर चित्रगुप्त नामक जिनेश्वर होगे, यहाँ वहुश्रुतो की
सम्मति प्रमाण है । सतरहवाँ रेवती का जीव समाधि, अठारहवाँ
शतालि के जीव सवर, उन्नीसवे द्वीपायन के जीव यशोधर, बीसवे
कर्ण के जीव विजय, इक्कीसवे नारद के जीव मन्त्र, वाइसवे अवड
के जीव देव, तेइसवे अमर के जीव अनन्तवीर्य, चौबीसवे ज्ञातवुद्ध
के जीव भद्रकर तीर्थङ्कर होगे।
इन्ही के अन्तराल मे पश्चानुपूर्वी के जैसे वर्त्तमान जिन की
भाँति तब भी बारह भावी चक्रवर्त्ती होगे। वे इस प्रकार—
१ दीर्घदन्त, २ गूढदन्त, ३ शुद्धदन्त, ४ श्रीचन्द, ५ श्रीभूति,
६ श्रीसोम, ७ श्रीसोम, ७ पद्म, ८ नायक, ९ महापद्म,
१० विमल, ११ अमलवाहन, १२ अरिष्ट।
नौ भावी वासुदेव इस प्रकार होगे—१ नन्दी, २ नन्दिमित्र,
३ सुन्दरबाहु, ४ महाबाहु, ५ अतिबल, ६ महाबल, ७ वल,
८ द्विपृष्ठ, ९ त्रिपृष्ठ।
नौ भावी प्रतिवासुदेव ये होगे—१ तिलक, २ लोहजघ,
३ वज्रजघ, ४ केशरी, ५ बली, ६ प्रभराज, ७ अपराजित,
८ भीम, ९ सुग्रीव।
नौ भावी वलदेव —१ जयन्तर, २ अजित, ३. धर्म, ४ सुप्रभ,
५ सुदर्शन, ६ आनंद, ७ नदन, ८ पद्म, ९ सकर्षण।
अवसर्पिणी के तीसरे आरे मे ६१ शलाका-पुरुष होगे, अंतिम
तीर्थङ्कर और चक्रवर्त्ती दोनो चौथे आरे मे होगे। तब फिर मत्तग
आदि दश कल्पवृक्ष उपजेगे। अठारह कोटा-कोटि सागरोपम का
निरन्तर युगलाधर्म होगा। उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी काल अनन्त हो
गए और उससे अनन्त गुणे भारतवर्ष मे होगे।
इस प्रकार अन्य भी भविष्य काल का स्वरूप कह कर भगवान
ने गौतम स्वामी को देवशर्म विप्र को प्रतिबोध देने के लिए
किसी गाँव मे इसलिए भेजा कि जिससे इनका प्रेमबंध नष्ट
हो जाय।
भगवान तीस वर्ष गृहस्थावास मे रहे, पक्षाधिक साढे बारह
वर्ष छद्मस्थ और तीस वर्ष तेरह पक्ष से कुछ न्यून केवलिपर्याय
पावापुरी-दीपावली-बृहत्कल्प ९५
में विचर कर बहत्तर वर्ष की सर्वायु पाल कर कात्तिकी अमावस्या
की रात्रि के अन्तिम प्रहार मे दूसरे चन्द्र संवत्सर, प्रीतिवर्द्धन
मास, नदिवर्द्धन पक्ष, देवानन्दा रात्रि, उपगम दिन, नागकरण,
सर्वार्थसिद्ध मुहूर्त्त, स्वाति नक्षत्र मे पर्यङ्कासन कृत स्वामी को गक्र
ने विनति की—भगवन् ! दो हजार वर्ष स्थिति वाला भस्मराशि
नामक तीसवाँ ग्रह अति नीचात्मा आपके जन्म नक्षत्र पर वर्त्तमान
मे आ रहा है, अत मुहूर्त्त भर प्रतीक्षा करे जिससे उसकी दृष्टि टल
जाय । अन्यथा आपके तीर्थ मे चिरकाल पीडा होगी । भगवान ने
कहा—हे इन्द्र ! हम पृथ्वी का छत्र ओर मेरु का दण्ड करके क्षण-
मात्र मे स्वयंभूरमण समुद्र को पार कर लोक को अलोक मे
फेंकने मे समर्थ हैं पर आयु कर्म को बढाने या घटाने मे समर्थ
नही । जो अवश्यभावी भाव है, उनका व्यतिक्रम नही, तो फिर
दो हजार वर्ष पर्यन्त अवश्यंभावी तीर्थ पीडा है । स्वामी ने पचपन
अध्ययन कल्याणफल विपाक के और पचपन पापफल विपाक
के कह कर छत्तीस अपृष्ट उत्तर कह कर प्रधान नामक अध्ययन
कहते हुए शैलेसी करण द्वारा योग निरोध करके अनन्तपचक-
युक्त अकेले सिद्धि प्राप्त हुए । अनत्तज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त
सम्यक्त्व, अनंत आनद, अनन्त वीर्य—ये अनन्तपचक हैं ।
उस समय उद्धार न किये जा सके ऐसे कुन्थुओ—सूक्ष्म जीवो
की उत्पत्ति देख कर आज से सयम दुराराध्य होगा, ज्ञात कर
बहुत से श्रमण और श्रमणियो ने अनशन कर दिया । अन्य भी
काशी कोगल देश के नौ मल्ल और नौ लिच्छवी—अठारह गण
राजाओ ने अमावस्या के पौषधोपवास पाड कर भवोद्योत के जाने
पर द्रव्योद्योत करेगे ऐसा विचार कर रत्नमय दीपको से उद्योत
किया । कालक्रम से अग्निदीपक होने लगे, इस प्रकार दीपावली
पर्व हुआ । देवो और देवियो के आने जाने से वह रात्रि उद्योतमय
कोलाहल पूर्ण हो गई । भगवान के गरीर का देवो ने सत्कार
९६ विविध तीर्थ-कल्प
किया। भस्मराशि की पीड़ा के प्रतिघात के लिए देव मनुष्य गौ
आदि की निराजना—पूजा की, उससे वृषभादि की पूजा प्रचलित
हुई।
फिर गौतम स्वामी उस द्विज को प्रतिबोध दे कर भगवान् को
वन्दना करने के लिए लौटे तो देवो के संलाप में—भगवान को
काल प्राप्त हुए सुना। उन्हे सुष्ठुतर अधृति हुई—अहो ! मुझ भक्त
पर भी स्वामी निस्नेही हो गए जो मुझे अन्त समय मे भी समीप
नही रखा , वीतरागो का कहाँ स्नेह होता है ? इस श्रुत को ज्ञात
कर प्रेमबन्धन को तोड़ कर वे तत्क्षण केवली हो गए। शक्रेन्द्र
ने कार्त्तिक शुक्ल प्रतिपदा के प्रातःकाल केवलज्ञान की महिमा
की। भगवान् गौतम स्वामी को सहस्रदल वाले कनक कमल पर
विराजमान कर पुष्प पगर करके सामने अष्ट मङ्गल आलेखित
किए और देशना सुनी। तब से आज भी प्रतिपदा का महोत्सव
जनता मे प्रवृत्त है। सूरिमन्त्र गौतम स्वामी प्रणीत है, अतः
उसके आराधक आचार्यगण गौतम केवलोत्पत्ति होने से उसी दिन
समवसरण मे अक्षन्हवण-पूजन करते हैं। श्रावक लोग भी भगवत
के अस्तगत होने पर श्रुतज्ञान ही सर्व विधि मे प्रधान ज्ञात कर
श्रुत ज्ञान की पूजा करते हैं। भगवान के ज्येष्ठ भ्राता नन्दिवर्द्धन
राजा ने भगवान को मोक्ष प्राप्त हुए सुन कर अत्यन्त शोक करते
हुए प्रतिपदा के दिन उपवास किया। कार्त्तिक शुक्ल २ के दिन
बहिन सुदर्शना ने समझा-बुझा कर अपने घर बुलाकर उन्हे भोजन
कराया, ताम्बूल वस्त्रादि दिए। तब से भाई बीज या “भैया दूज'
का पर्व रूढ-प्रचलित हुआ। इस प्रकार दीपोत्सव की स्थिति हुई।
जो दीपोत्सव मे चतुर्दशी-अमावस्या को कोडी सहित उपवास
कर अष्टप्रकारी पूजा से श्रुतज्ञान की पूजा कर पचास हजार के
परिवार युक्त गौतम स्वामी को स्वर्णकमल मे स्थापित कर प्रति-
पावापुरी-दीपावली-वृहत्कल्प ९७
दिन पचास हजार चावल सब मिला कर बारह लाख चावल
चौबीस पाटो पर चढा कर उस पर अखण्ड दीपक जला कर गौतम
स्वामी की आराधना करते हैं वे परमपद-सुख-लक्ष्मी प्राप्त करते है।
दीवाली की अमावस्या को नन्दीश्वर तप प्रारम्भ करना चाहिए।
उसदिन नन्दीश्वर पट पूजा पूर्वक उपवास करके वार्षिक सात वर्ष
या यावत् अमावस्या को उपवास करके वीरकल्याणक अमावस्या
का उद्यापन करना चाहिए। वहाँ नन्दीश्वर द्वीप के बावन जिनालय
मे शक्रेन्द्र-न्हवणादि पूजा करके नन्दीश्वर पट के आगे दर्पण
सक्रान्त जिन-विम्बो मे न्हवणादि कर बावन प्रकार के पक्वान्न
नारंग, जवीर, कदली फलादि, नारियल, सुपारियाँ, पत्ते, इक्षुयष्टि
(गन्ने), खर्जूर, द्राक्षा, वरसोलक, उत्तृप्ति, आकय, खुरमा आदि
के थाल और दीपक आदि (चढाकर) बावन कच्ली तम्बोलादि
दान पूर्वक श्राविकाओ को देनी चाहिए। दीपोत्सव के बिना अन्य
अमावस्या को भी नन्दीश्वर तप प्रारभ किया जाता है।
पुनरपि सम्प्रति महाराजा ने आर्य सुहस्तिसूरि से पूछा—
भगवन्! इस दिवाली पर्व पर विशेष प्रकार से घरो की सजावट-
शृंगार, विशिष्ट अन्न वस्त्रादि का परिभोग, परस्पर जुहार
करना—यह जनता मे किस कारण से दिखाई पड रहा है? तव
आर्य सुहस्तिसूरि ने इस प्रकार प्रत्युत्तर दिया—
पूर्वकाल मे एक वार उज्जयिनी पुरी के उद्यान मे श्रीमुनिसुव्रत
स्वामी के शिष्य श्री सुव्रताचार्य समौसरे। उन्हे वन्दना करने के
लिए श्री धर्मराजा गया। नमुचि मंत्री भी वहाँ गया उसे आचार्य
महाराज के साथ विवाद करते हुए एक क्षुल्लक मुनि ने पराजित
कर दिया।
राजा के साथ वह घर चला गया और रात्रि में मुनि को
मारने के लिए नंगी तलवार लेकर उद्यान में गया। देवता ने उसे
७
वाराणसी, अयोध्या, मथुरा, हस्तिनापुर एवं दिल्ली कल्प
९८ विविध तीर्थ-कल्प
स्तम्भित कर दिया। प्रात काल विस्मित राजा ने क्षमा-याचना
करवा के उसे छुडा दिया। वह लज्जित हो कर हस्तिनापुर चला
गया। वहाँ पद्मोत्तर राजा राज्य करते थे, ज्वाला देवी उनकी
पटरानी थी। उनके दो पुत्र विष्णुकुमार और महापद्म थे। ज्येष्ठ
पुत्र की अनिच्छा होने से पिता ने महापद्म को युवराज पद दिया।
नमुचि उसका मन्त्री बना। मन्त्री ने युद्ध में सिहरथ राजा को
जीत लिया। महापद्म सन्तुष्ट हुए, वर देने लगे तो उसे अस्वीकृत
कर दिया। एक बार ज्वालादेवी ने अर्हन्त भगवान की रथयात्रा
करवायी। उसकी सपत्नी लक्ष्मीदेवी ने जो मिथ्यादृष्टि थी,
ब्रह्मरथ यात्रा करवायी। प्रथम रथ निकालने के विषय मे दोनो
हो राणियो के विवाद हो गया। राजा ने दोनो ही रथो को वापस
लौटा दिया। माता का अपमान देख कर महापद्म देशान्तर चला
गया। क्रमश मदनावली के साथ विवाह कर भारत के छ खण्ड
साधकर गजपुर आया। पिता ने राज्य दे दिया और पद्मोत्तर
राजा ने विष्णुकुमार के साथ सुव्रताचार्य के पास दीक्षा ले ली।
पद्मोत्तर मुक्त हो गए, विष्णुकुमार को छ हजार वर्ष तप करते
हुए अनेक लब्धियाँ उत्पन्न हुई। महापद्म चक्रवर्त्ती ने पृथ्वी को
जिन-भवनो से मण्डित कर रथयात्राएं कराके माता का मनोरथ
पूर्ण किया।
चक्री प्रदत्त वर को अस्वीकृत करने वाले नमुचि ने यज्ञ करने
के लिए राज्य मांगा। उस सत्यप्रदत्त राजा ने उसे राज्य दे दिया
और स्वय अन्त पुर मे रहने लगे। उस समय विचरण करते हुए
मुव्रताचार्य हस्तिनापुर मे वर्षावास स्थित थे। सभी पाखण्डी लोग
अभिनव राजा को देखने आये किन्तु सुव्रताचार्य नही पधारे। तब
क्रुद्ध हो नमुचि ने कहा—"मेरी भूमि पर तुम्हे सात दिन से
अधिक नही रहना चाहिये, अन्यथा मै मार दूंगा, क्योकि तुम मुझे
देखने नही आये।"
पावापुरी-दीपावली-वृहतकल्प ९१
आचार्य महाराज ने संघ की सम्मति लेकर एक आकाश-
गामी विद्यासंपन्न मुनि को आदेश दिया कि—मेरु चूला पर रहे
हुए विष्णुकुमार मुनि को बुला लाओ। उसने विज्ञप्ति की—
भगवन् ! मेरी जाने की शक्ति है किन्तु वापस लौटने की नही।
गुरु महाराज ने कहा—“वेही तुम्हे ले आवेगे ! तब वह मुनि
मेरु चूला पर गए। महर्षि को वन्दन कर सारा स्वरूप निवेदन
किया। वे तत्क्षण उस साधु को लेकर आकाश मे उडे। गजपुर
आकर राजकुल मे पहुँचे। नमुचि को छोड़ कर सभी ने उन्हे
वन्दना की। नमुचि ने पहचान लिया और बोला—“साधुओ को
ठहरने नही दूंगा !”
विष्णुकुमार ने तीन पग प्रमाण भूमि माँगी, उसने दे दी और
बोला—तीन पग से बाहर देखूगा तो मार दूंगा । तब विष्णु ऋषि
एक लाख योजन शरीर वाले बन गए। वे किरीट-कुण्डल-गदा-
चक्र और धनुष धारी थे, उनके पाँव-प्रहार से पृथ्वी काँपने लगी।
समुद्र क्षुब्ध हो गए। फुंकार से विद्याधर भग गए। नदियाँ उत्पथ
प्रवृत्त हो गई। तारे घूमने लगे, कुलगिरि डोलने लगे। मुनि
पूर्वापर समुद्र पर दोनो पाँव रख कर तीसरा पाँव नमुचि के शिर
पर देने को खड़े थे, तब इन्द्र ने अवधिज्ञान से जान कर सुराङ्ग-
नाओ को भेजा। वे कानो के पास रही हुई मधुर स्वर से शान्ति-
गर्भित उपदेश-गीत गाने लगी। और चक्रवर्त्ती आदि भी यह
व्यतिकर ज्ञात कर उन्हे प्रसन्न करने के लिए पाँवो मे गिर पड़े।
तब महर्षि प्रकृतिस्थ हो शान्त हो गए। चक्रवर्त्ती और संघ ने
क्षमा मागी। चक्रवर्त्ती ने दयापूर्वक नमुचि को विष्णुकुमार से
छुडवाया।
उस समय वर्षाकाल के चौथे मास का पक्ष-सन्धि दिन था, उस
उत्पात के शान्त होने पर लोक अपना पुनर्जन्म मानते हुए परस्पर
‘जुहार’ करने लगे। विशिष्टतर मण्डन, भोजन-छादन-ताम्बूल-
१०० विविध तीर्थ-कल्प
दि परिभोग मे प्रवृत्त हुए तब से इस दिन प्रति वर्ष वे ही व्यव-
हार प्रवर्त्तते हैं। विष्णुकुमार तथा महापद्म चक्रवर्त्ती समय पर
केवली होकर सिद्ध हुए।
इस प्रकार दश पूर्वधर आर्य सुहस्तिसूरि के मुख से सुन कर
महाराजा सम्प्रति पर्व-दिवसो मे विशेष प्रकार से जिन-पूजारत
रहता था।
पूर्व काल मे मध्यमा पापा का नाम अपापापुरी था। शक्रेन्द्र
ने 'पावापुरी' यह नाम किया, क्योकि यहाँ महावीर स्वामी का
निर्वाण हुआ।
इसी पावापुरी मे वैशाख सुदि ११ के दिन जृम्भिक गाँव से
बारह योजन आकर पूर्वाह्न समय महासेन वन मे भगवान ने
ने पण्डितगणो से परिवृत और प्रमुदित गौतमादि गणधरो को
दीक्षा दी। उन्हे गणानुज्ञा दी। उन्होने तीन निषद्या मे उत्पाद,
विगम, ध्रौव्य लक्षण त्रिपदी स्वामी से पाकर तत्क्षण द्वादशाङ्गी
रचना की। इसी नगरी मे भगवान के कानो से सिद्धार्थ वणिक के
उपक्रम से खरक वैद्य ने काष्ठ-शलाका निकाली। उसके निकालने
पर अत्यन्त वेदनावश भगवान ने चीत्कार किया, उससे प्रत्यासन्न
पर्वत मे दरार पड गई। आज भी वहाँ बीच मे सन्धि-मार्ग
दिखायो पडता है। तथा इसी पुरी मे कार्त्तिक अमावस्या की रात्रि
मे भगवान के निर्वाण के स्थान पर मिथ्यादृष्टि लोग श्री वीर-
स्तूप स्थान पर स्थापित नागमण्डप मे आज भी चातुर्वर्णिक लोग
यात्रा महोत्सव करते हैं। उसी एक रात्रि मे देवानुभाव से कुएँ से
लाये हुए जल से पूर्ण सराव मे तेल बिना दीपक प्रज्वलित
होता है।
इन पूर्वोक्त अर्थो की भगवान ने इसी नगर मे व्याख्या की थी।
यही भगवान सिद्धि सम्प्राप्त हुए थे, इत्यादि अत्यद्भुत भूत सविधान
स्थान पावापुरी महातीर्थ है।
कन्नानयनीय महावीर प्रतिमा-कल्प १०१
दीपोत्सव की उत्पत्ति कथन से रमणीय यह पावापुरीकल्प श्री
देवगिरि नगर मे स्थित श्रीजिनप्रभसूरि ने बनाया । विक्रम संवत्
१३८७ के भाद्रपद कृष्ण पुष्यार्क युक्त द्वादशी को यह स्वस्तिकार
कल्याणकारी कल्प समर्थित हुआ ।
यह अपापा या दीपोत्सव कल्प समाप्त हुआ ।
इसकी ग्रंथ-श्लोकसंख्या ४१६ और अक्षर ७ ऊपर है।
२२. कन्नानयनीय महावीर प्रतिमा-कल्प
मेरु पर्वत के सदृश धीर, अमित गुण समूह वाले श्री महावीर
जिनेश्वर को नमस्कार करके कण्णानय नगर स्थित उनकी प्रतिमा
का कल्प कुछ कहूँगा ।
चोल देशावतंस कन्नाणय नगर मे विक्रमपुर वास्तव्य, प्रभु
श्री जिनपति सूरिजी के चाचा साहु मानदेव द्वारा कारापित और
स० १२३३ आषाढ शुक्ल १० गुरुवार के दिन हमारे पूर्वाचार्य
श्री जिनपति सूरिजी द्वारा प्रतिष्ठित, मम्माण शैल समुद्गत,
ज्योतिर्मय, सुघटित, तेईस पर्वाङ्गुल प्रमाण श्री महावीर-प्रतिमा
थी जो नख सूक्ति लगने पर भी घण्ट की भाँति टकार-शब्द करती
थी । वह स्वप्नादेश से अनकवाला नामक पृथ्वी धातु विशेष
सस्पर्श सन्निहित प्रातिहार्ययुक्त श्रावकसंघ से चिर पूजित थी ।
यावत् विक्रमादित्य स० १२४८ मे चौहान-कुलप्रदीप श्री पृथ्वीराज
नरेन्द्र का सुलतान सहावुद्दीन द्वारा निधन होने पर राज्यप्रधान
परमश्रावक सेठ रामदेव ने श्रावकसंघ को लेख भेजा कि—तुर्कों
का राज्य हो गया, अत श्री महावीर स्वामी की प्रतिमा को
प्रच्छन्न रखा देना । तब श्रावको ने दाहिन कुल मडन मण्डलीक
कयवास (कैमास) नामाङ्कित “कयवास स्थल” मे विपुल वालु के
टीवो मे रख दी, जो वहाँ रही ।
विक्रम स० १३११ मे अत्यन्त दारुण दुर्भिक्ष मे निर्वाह न होने
होने से आजीविका के लिए 'जोजओ' नामक सुथार कन्नाणय से
सुभिक्ष देश के प्रति सपरिवार चला । प्रथम प्रयाण थोडा करना,
ऐसा सोचकर उसने कयंवास स्थल मे रात्रिवास किया । आधीरात
के समय देवता ने उसे स्वप्न दिया कि—तुम् जहाँ सोये हुए हो
उसके इतने हाथ नीचे भगवान महावीर की प्रतिमा है, तुम देशा-
तर मत जाओ, तुम्हारा यही निर्वाह हो जायगा । उसने सभ्रम
पूर्वक जग कर अपने पुत्रादि से उस स्थान को खुदवाया और
महावीर स्वामी की प्रतिमा देखी तो प्रसन्नतापूर्वक नगर मे जाकर
श्रावकसघ को निवेदन किया । श्रावको ने महोत्सवपूर्वक पर-
मात्मा महावीर को चैत्यगृह मे प्रवेश कराके स्थापित किया ।
त्रिकाल पूजा होने लगी । अनेक वार तुर्कों के उपद्रव से मुक्त
रहे । उस सुधार के लिए श्रावको ने वृत्ति-निर्वाह कर दिया ।
प्रतिमा का परिकर खोजने पर भी प्राप्त नही हुआ, वह कही स्थल-
धोरो के बीच रहा हुआ है । उस पर प्रशस्ति-सवत्सरादि भी लिखे
हुए होने की संभावना है ।
एक दिन न्हवण कराने के पश्चात् भगवान के शरीर पर
पसीना छूटते देखा । बार-बार पोछने पर भी जव न रुका तो
विदग्ध श्रावको ने जाना कि—यहाँ कोई अवश्य उपद्रव होगा ।
दूसरे दिन प्रभात मे जट्ठुभ राजपूतो की धाड आई, सारा नगर
विध्वस्त हुआ । इस प्रकार प्रकट-प्रभावी स्वामी यावत् सवत्
कन्यानयनीय महावीर प्रतिमा-कल्प १०३
१३८५ पर्यन्त वहाँ पूजे गए। उस वर्ष (स० १३८५ मे) अल्लविय
वंशोत्पन्न आसी नगर (हासी) के सिकन्दर ने घोर परिणाम पूर्वक
श्रावक और साधुओ को बदी बनाकर विडंवित किया। भगवान
पार्श्वनाथ की पाषाण-प्रतिमा का भग हुआ। भगवान महावीर
स्वामी की प्रतिमा को वह अखण्ड रूप से गाड़ी पर चढ़ा
कर दिल्ली लाया और तुगलकाबाद स्थित सुलतान के भण्डार मे
यह सोच कर रखा कि सुलतान के आने पर जैसी आज्ञा देगे, वैसा
किया जायगा। कालक्रम से जब सुलतान मुहम्मद देवगिरिनगर
(दौलताबाद) से दिल्ली-योगिनीपुर आया तब पन्द्रह मास पर्यन्त
भगवान तुर्को के यहाँ बदी रहे।
अन्यदा बाह्य जनपद विहार मे विचरते हुए खरतर गच्छा-
लङ्कार श्रीजिनसिंहसूरिजी के पट्ट प्रतिष्ठित श्री जिनप्रभसूरिजी
दिल्ली के शाखानगर मे पधारे। क्रमशः शाही राजसभा मे पडित-
गोष्ठी प्रस्तुत होने पर राजाधिराज के द्वारा—कौन विशिष्ट पण्डित
है ? ऐसा पूछने पर ज्योतिषी धाराधर ने उन (श्रीजिनप्रभसूरि)
की गुण-स्तुति आरम्भ की। महाराजा (सुलतान) ने उसे ही भेज
कर बहुमानपूर्वक मिति पोष शुक्ल २ के सन्ध्या समय सूरि-
महाराज को बुलाया। महाराजाधिराज से भेट हुई। अत्यन्त
निकट बैठाकर कुशल वार्त्तादि पृच्छा की और अभिनव काव्य
द्वारा सुलतान ने सूरिजी से आशीर्वाद प्राप्त किया। आधी रात
पर्यन्त एकान्त गोष्ठी कर रात्रि मे वही पर सुलाये। प्रात काल
फिर सूरि महाराज को बुलाया। महानरेन्द्र सुलतान ने सन्तुष्ट
होकर एक हजार गायो का मूल्य, प्रधान उद्यान, सौ वस्त्र, सौ
कम्बल और अगुरु चन्दन, कर्पूरादिगन्ध द्रव्य देने लगा। गुरु महा-
राज ने—साधुओ को ये नही कल्पता—ऐसा समझाकर महाराजा
को सर्व वस्तु का प्रतिषेध किया। फिर महाराजाधिराज के अप्र-
१०४ विविध तीर्थ-कल्प
त्तीति न हो, इसलिए कुछ कम्बल-वस्त्र-अगुरु आदि राजाभियोग
से स्वीकार किये। वहाँ नाना देगो से आये हुए पण्डितो के साथ
वाद-गोष्ठी करा के दो हाथी मँगवाये। एक पर गुरु महाराज को
और दूसरे पर श्रीजिनदेवसूरि को वंठाकर आठ गाही मदनभेरी
बजाते, गखध्वनि, मद्दल, कमाल, ढोल आदि वादित्र-गब्दो के
साथ भट्टविरुदावली पढते हुए, चारो वर्ण एव चतुर्विध सघ सहित
सूरि-महाराज को पौषधगाला भेजा। श्रावको ने प्रवेगमहोत्सव
किया, महादान दिया।
वादगाह ने समस्त श्वेताम्बर सघ को उपद्रव से रक्षण करने
की क्षमता वाला फरमान पत्र समर्पित किया और गुरु महाराज
के प्रतिच्छद मे उसे चारो दिशाओ मे प्रेषित किया। गासनोन्नति
हुई। अन्यदा सूरिमहाराज ने श्री शत्रुञ्जय-गिरनार-फलवर्द्धि आदि
तीर्थो की रक्षा के हेतु फरमाना मागा। बादगाह ने तत्काल सार्व-
भौम फरमान दिया और उन्हे सर्व तीर्थो मे भेजा गया। राजा-
धिराज ने प्रसन्नतापूर्वक गुरु महाराज के वचनो से अनेक वन्दियो
को मुक्त किया। फिर सोमवार के दिन वर्पान्त के समय जाकर
सुलतान से भेंट की। कीचड से भरे हुए गुरु-महाराज के पाँवो को
महाराजाधिराज ने मल्लिक काफूर के पास उत्तम वस्त्र खण्ड से
पोंछाये। गुरु महाराज के आगीर्वाद देने और वर्णन काव्य की
व्याख्या करने पर महानरेन्द्र सुलतान के चित्त में अत्यन्त चमत्कार
उत्पन्न हुआ। अवसर ज्ञात कर समस्त स्वरूप कथन पूर्वक भग-
वान महावीर स्वामी की प्रतिमा माँगी। एक छत्र पृथिवीपति ने
मुकमार गोष्ठी करके वह प्रतिमा उन्हे प्रदान की। तुगलकाबाद
शाही कोप गे मंगाकर असुअग मल्लिको के कन्धे दिलाकर सकल
सभा के समक्ष अपने सामने मँगाकर दर्गन करके गुरु महाराज को
समर्पित की। फिर महोत्सव-प्रभावना पूर्वक सुखासन मे विराज-
मान कर समस्त सघ ने मलिक ताजदीन सराय के चैत्य मे प्रवेग