विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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मिलेगी । इस प्रकार निष्कण्टक राज्य का उपभोग कर छयासीवे
वर्ष मे फिर सभी पाखडियो को दण्डित कर सब लोगो
को निर्धन करके साधुओ से भी भिक्षा मे षष्ठांश माँगेगा ।
न देने पर उन्हे कारागार मे डाल देगा । तब प्रतिपदाचार्य
प्रमुख सघ शासनदेवीका ध्यान कर कायोत्सर्ग मे रहेगे । उसके
बोध देने पर भी जब वह पाप निवृत्त नही होगा तब आसन काँपने
पर शक्रेन्द्र ब्राह्मण का रूप धारण कर आवेगा । जब उसका भी
वचन न मानेगा तो शक्रेन्द्र के चपेट से आहत होकर मर के नरक
जावेगा । तब उसका धर्मदत्त नामक पुत्र राज्यारूढ किया
जायगा । सघ को स्वस्थ रखने का आदेश देकर शक्र स्वस्थान
चला जायगा । दत्त राजा बहत्तर वर्षायु पर्यन्त प्रतिदिन पृथ्वी
को जिन चैत्य मण्डित करेगा और लोगो को भी सुखी करेगा ।
दत्त का-पुत्र जितशत्रु और उसका पुत्र मेघघोष होगा । कल्कि के
पश्चात् महानिशीथ सूत्र नही रहेगा । दो हजार वर्ष की स्थिति
वाले भस्मराशि ग्रह की पीडा दूर होने पर देव भी दर्शन देगे ।
विद्यामंत्र भी अल्प जाप से प्रभाव दिखाएँगे । अवधिज्ञान और
जातिस्मरण भाव भी कही प्रगट होगे । उसके पश्चात् उन्नीस
हजार वर्ष पर्यन्त जैन धर्म वर्तेगा । दूषम काल के शेष मे बारह
वर्षीय दो हाथ शरीर वाले प्रव्रजित, दशवैकालिक आगमधर,
साढे तीन श्लोक प्रमाण सूरिमंत्र जाप करने वाले और उत्कृष्ट
छठ्ठ (वेला = दो उपवास) तप करने वाले दुप्पसह नामक आचार्य
अन्तिम युग प्रधान होगे । वे आठ वर्ष सयम पालन कर बीस वर्ष
की आयु मे अष्टम तप से अनशन करके सौधर्म देवलोक मे पल्यो-
पम आयु वाले एकावतारी देव उत्पन्न होगे ।
दुप्पसह आचार्य, फल्गुश्री आर्या, नागिल श्रावक और
सत्यश्री श्रावका—ये अन्तिम सघ पूर्वाह्न मे भारतवर्ष मे अस्तगत
होगे । मध्याह्न मे विमलवाहन राजा और सुमुख मंत्रो भी