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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 184

कन्नानयनीय महावीर प्रतिमा-कल्प १०१
दीपोत्सव की उत्पत्ति कथन से रमणीय यह पावापुरीकल्प श्री
देवगिरि नगर मे स्थित श्रीजिनप्रभसूरि ने बनाया । विक्रम संवत्
१३८७ के भाद्रपद कृष्ण पुष्यार्क युक्त द्वादशी को यह स्वस्तिकार
कल्याणकारी कल्प समर्थित हुआ ।
यह अपापा या दीपोत्सव कल्प समाप्त हुआ ।
इसकी ग्रंथ-श्लोकसंख्या ४१६ और अक्षर ७ ऊपर है।
२२. कन्नानयनीय महावीर प्रतिमा-कल्प
मेरु पर्वत के सदृश धीर, अमित गुण समूह वाले श्री महावीर
जिनेश्वर को नमस्कार करके कण्णानय नगर स्थित उनकी प्रतिमा
का कल्प कुछ कहूँगा ।
चोल देशावतंस कन्नाणय नगर मे विक्रमपुर वास्तव्य, प्रभु
श्री जिनपति सूरिजी के चाचा साहु मानदेव द्वारा कारापित और
स० १२३३ आषाढ शुक्ल १० गुरुवार के दिन हमारे पूर्वाचार्य
श्री जिनपति सूरिजी द्वारा प्रतिष्ठित, मम्माण शैल समुद्गत,
ज्योतिर्मय, सुघटित, तेईस पर्वाङ्गुल प्रमाण श्री महावीर-प्रतिमा
थी जो नख सूक्ति लगने पर भी घण्ट की भाँति टकार-शब्द करती
थी । वह स्वप्नादेश से अनकवाला नामक पृथ्वी धातु विशेष
सस्पर्श सन्निहित प्रातिहार्ययुक्त श्रावकसंघ से चिर पूजित थी ।
यावत् विक्रमादित्य स० १२४८ मे चौहान-कुलप्रदीप श्री पृथ्वीराज