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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 176

पावापुरी-दीपावली-वृहत्कल्प ९३

फिर मध्य देश मे सात कुलकर होगे । उन मे पहला विमल-
वाहन, दूसरा सुदामा, तीसरा सगत, चौथा सुपार्श्व, पाँचवाँ दत्त,
छट्ठा सुमुख, सातवाँ समुची होगा । जातिस्मरण ज्ञान के द्वारा
विमलवाहन नगरादि बसावेगा । अग्नि के उत्पन्न होने पर अन्न
पाक, शिल्प आदि कला से समस्त लोकव्यवहार प्रवर्त्तन करेगा ।
फिर नवासी पक्ष अधिक उत्सर्पिणी काल के दो आरे बीतने पर
पुण्ड्रवर्द्धन देश के गतद्वार पुर मे समुद्र नरपति की भद्रा देवी के
चतुर्दश महास्वप्न सूचित श्रेणिक राजा का जीव रत्नप्रभा के
लोलकबुद्ध पाथडे से चौरासी हजार वर्ष की आयु पूर्ण कर उद्वर्त्त
करता हुआ कुक्षी मे पुत्र रूप से उत्पन्न होगा । वर्ण, प्रमाण,
-लाछन, आयु, गर्भापहार के अतिरिक्त पाचो कल्याणक मास,
तिथि, नक्षत्रादि मेरे जैसे ही होगे । अन्तर यह है कि वे नाम से
पद्मनाभ देवसेन और विमलवाहन होगे ।
फिर दूसरे तीर्थङ्कर सुपार्श्व के जीव सुरदेव, तीसरे उदायी
के जीव सुपार्श्व, चतुर्थ पोटिल का जीव स्वयप्रभ, पाँचवे दृढायु
के जीव सर्वानुभूति, छट्ठे कार्तिक के जीव देवश्रुत, सातवे संख
के जीव उदय, आठवे आनंद के जीव पेढाल, नवे सुनन्द के जीव
पोटिल, दशवे शतक के जीव शतकीर्त्ति, ग्यारहवे देवकी के जीव
मुनि सुव्रत, वारहवे कृष्ण के जीव अमम, तेरहवें सत्यकी
के जीव निष्कष्याय, चौदहवे वलदेव के जीवनिष्पुलाक, पन्द्रहवें
सुलसा के जीव निर्मम, सोलहवे रोहिणी के जीव चित्रगुप्त
तीर्थङ्कर होगे। फिर कुछ लोग कहते हैं कल्कि का दत्त नामक
पुत्र विक्रम संवत् १५७३ मे शत्रुञ्जय उद्धार कराके जिन भवन
मण्डित वसुधा करके, तीर्थङ्कर नाम कर्म उपार्जन कर स्वर्ग
जाकर चित्रगुप्त नामक जिनेश्वर होगे, यहाँ वहुश्रुतो की
सम्मति प्रमाण है । सतरहवाँ रेवती का जीव समाधि, अठारहवाँ
शतालि के जीव सवर, उन्नीसवे द्वीपायन के जीव यशोधर, बीसवे