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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 442 में से

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पृष्ठ 181

९८ विविध तीर्थ-कल्प

स्तम्भित कर दिया। प्रात काल विस्मित राजा ने क्षमा-याचना
करवा के उसे छुडा दिया। वह लज्जित हो कर हस्तिनापुर चला
गया। वहाँ पद्मोत्तर राजा राज्य करते थे, ज्वाला देवी उनकी
पटरानी थी। उनके दो पुत्र विष्णुकुमार और महापद्म थे। ज्येष्ठ
पुत्र की अनिच्छा होने से पिता ने महापद्म को युवराज पद दिया।
नमुचि उसका मन्त्री बना। मन्त्री ने युद्ध में सिहरथ राजा को
जीत लिया। महापद्म सन्तुष्ट हुए, वर देने लगे तो उसे अस्वीकृत
कर दिया। एक बार ज्वालादेवी ने अर्हन्त भगवान की रथयात्रा
करवायी। उसकी सपत्नी लक्ष्मीदेवी ने जो मिथ्यादृष्टि थी,
ब्रह्मरथ यात्रा करवायी। प्रथम रथ निकालने के विषय मे दोनो
हो राणियो के विवाद हो गया। राजा ने दोनो ही रथो को वापस
लौटा दिया। माता का अपमान देख कर महापद्म देशान्तर चला
गया। क्रमश मदनावली के साथ विवाह कर भारत के छ खण्ड
साधकर गजपुर आया। पिता ने राज्य दे दिया और पद्मोत्तर
राजा ने विष्णुकुमार के साथ सुव्रताचार्य के पास दीक्षा ले ली।
पद्मोत्तर मुक्त हो गए, विष्णुकुमार को छ हजार वर्ष तप करते
हुए अनेक लब्धियाँ उत्पन्न हुई। महापद्म चक्रवर्त्ती ने पृथ्वी को
जिन-भवनो से मण्डित कर रथयात्राएं कराके माता का मनोरथ
पूर्ण किया।
चक्री प्रदत्त वर को अस्वीकृत करने वाले नमुचि ने यज्ञ करने
के लिए राज्य मांगा। उस सत्यप्रदत्त राजा ने उसे राज्य दे दिया
और स्वय अन्त पुर मे रहने लगे। उस समय विचरण करते हुए
मुव्रताचार्य हस्तिनापुर मे वर्षावास स्थित थे। सभी पाखण्डी लोग
अभिनव राजा को देखने आये किन्तु सुव्रताचार्य नही पधारे। तब
क्रुद्ध हो नमुचि ने कहा—"मेरी भूमि पर तुम्हे सात दिन से
अधिक नही रहना चाहिये, अन्यथा मै मार दूंगा, क्योकि तुम मुझे
देखने नही आये।"