विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकन्यानयनीय महावीर प्रतिमा-कल्प १०३
१३८५ पर्यन्त वहाँ पूजे गए। उस वर्ष (स० १३८५ मे) अल्लविय
वंशोत्पन्न आसी नगर (हासी) के सिकन्दर ने घोर परिणाम पूर्वक
श्रावक और साधुओ को बदी बनाकर विडंवित किया। भगवान
पार्श्वनाथ की पाषाण-प्रतिमा का भग हुआ। भगवान महावीर
स्वामी की प्रतिमा को वह अखण्ड रूप से गाड़ी पर चढ़ा
कर दिल्ली लाया और तुगलकाबाद स्थित सुलतान के भण्डार मे
यह सोच कर रखा कि सुलतान के आने पर जैसी आज्ञा देगे, वैसा
किया जायगा। कालक्रम से जब सुलतान मुहम्मद देवगिरिनगर
(दौलताबाद) से दिल्ली-योगिनीपुर आया तब पन्द्रह मास पर्यन्त
भगवान तुर्को के यहाँ बदी रहे।
अन्यदा बाह्य जनपद विहार मे विचरते हुए खरतर गच्छा-
लङ्कार श्रीजिनसिंहसूरिजी के पट्ट प्रतिष्ठित श्री जिनप्रभसूरिजी
दिल्ली के शाखानगर मे पधारे। क्रमशः शाही राजसभा मे पडित-
गोष्ठी प्रस्तुत होने पर राजाधिराज के द्वारा—कौन विशिष्ट पण्डित
है ? ऐसा पूछने पर ज्योतिषी धाराधर ने उन (श्रीजिनप्रभसूरि)
की गुण-स्तुति आरम्भ की। महाराजा (सुलतान) ने उसे ही भेज
कर बहुमानपूर्वक मिति पोष शुक्ल २ के सन्ध्या समय सूरि-
महाराज को बुलाया। महाराजाधिराज से भेट हुई। अत्यन्त
निकट बैठाकर कुशल वार्त्तादि पृच्छा की और अभिनव काव्य
द्वारा सुलतान ने सूरिजी से आशीर्वाद प्राप्त किया। आधी रात
पर्यन्त एकान्त गोष्ठी कर रात्रि मे वही पर सुलाये। प्रात काल
फिर सूरि महाराज को बुलाया। महानरेन्द्र सुलतान ने सन्तुष्ट
होकर एक हजार गायो का मूल्य, प्रधान उद्यान, सौ वस्त्र, सौ
कम्बल और अगुरु चन्दन, कर्पूरादिगन्ध द्रव्य देने लगा। गुरु महा-
राज ने—साधुओ को ये नही कल्पता—ऐसा समझाकर महाराजा
को सर्व वस्तु का प्रतिषेध किया। फिर महाराजाधिराज के अप्र-