विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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किया। भस्मराशि की पीड़ा के प्रतिघात के लिए देव मनुष्य गौ
आदि की निराजना—पूजा की, उससे वृषभादि की पूजा प्रचलित
हुई।
फिर गौतम स्वामी उस द्विज को प्रतिबोध दे कर भगवान् को
वन्दना करने के लिए लौटे तो देवो के संलाप में—भगवान को
काल प्राप्त हुए सुना। उन्हे सुष्ठुतर अधृति हुई—अहो ! मुझ भक्त
पर भी स्वामी निस्नेही हो गए जो मुझे अन्त समय मे भी समीप
नही रखा , वीतरागो का कहाँ स्नेह होता है ? इस श्रुत को ज्ञात
कर प्रेमबन्धन को तोड़ कर वे तत्क्षण केवली हो गए। शक्रेन्द्र
ने कार्त्तिक शुक्ल प्रतिपदा के प्रातःकाल केवलज्ञान की महिमा
की। भगवान् गौतम स्वामी को सहस्रदल वाले कनक कमल पर
विराजमान कर पुष्प पगर करके सामने अष्ट मङ्गल आलेखित
किए और देशना सुनी। तब से आज भी प्रतिपदा का महोत्सव
जनता मे प्रवृत्त है। सूरिमन्त्र गौतम स्वामी प्रणीत है, अतः
उसके आराधक आचार्यगण गौतम केवलोत्पत्ति होने से उसी दिन
समवसरण मे अक्षन्हवण-पूजन करते हैं। श्रावक लोग भी भगवत
के अस्तगत होने पर श्रुतज्ञान ही सर्व विधि मे प्रधान ज्ञात कर
श्रुत ज्ञान की पूजा करते हैं। भगवान के ज्येष्ठ भ्राता नन्दिवर्द्धन
राजा ने भगवान को मोक्ष प्राप्त हुए सुन कर अत्यन्त शोक करते
हुए प्रतिपदा के दिन उपवास किया। कार्त्तिक शुक्ल २ के दिन
बहिन सुदर्शना ने समझा-बुझा कर अपने घर बुलाकर उन्हे भोजन
कराया, ताम्बूल वस्त्रादि दिए। तब से भाई बीज या “भैया दूज'
का पर्व रूढ-प्रचलित हुआ। इस प्रकार दीपोत्सव की स्थिति हुई।
जो दीपोत्सव मे चतुर्दशी-अमावस्या को कोडी सहित उपवास
कर अष्टप्रकारी पूजा से श्रुतज्ञान की पूजा कर पचास हजार के
परिवार युक्त गौतम स्वामी को स्वर्णकमल मे स्थापित कर प्रति-