सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 180

पावापुरी-दीपावली-वृहत्कल्प ९७
दिन पचास हजार चावल सब मिला कर बारह लाख चावल
चौबीस पाटो पर चढा कर उस पर अखण्ड दीपक जला कर गौतम
स्वामी की आराधना करते हैं वे परमपद-सुख-लक्ष्मी प्राप्त करते है।
दीवाली की अमावस्या को नन्दीश्वर तप प्रारम्भ करना चाहिए।
उसदिन नन्दीश्वर पट पूजा पूर्वक उपवास करके वार्षिक सात वर्ष
या यावत् अमावस्या को उपवास करके वीरकल्याणक अमावस्या
का उद्यापन करना चाहिए। वहाँ नन्दीश्वर द्वीप के बावन जिनालय
मे शक्रेन्द्र-न्हवणादि पूजा करके नन्दीश्वर पट के आगे दर्पण
सक्रान्त जिन-विम्बो मे न्हवणादि कर बावन प्रकार के पक्वान्न
नारंग, जवीर, कदली फलादि, नारियल, सुपारियाँ, पत्ते, इक्षुयष्टि
(गन्ने), खर्जूर, द्राक्षा, वरसोलक, उत्तृप्ति, आकय, खुरमा आदि
के थाल और दीपक आदि (चढाकर) बावन कच्ली तम्बोलादि
दान पूर्वक श्राविकाओ को देनी चाहिए। दीपोत्सव के बिना अन्य
अमावस्या को भी नन्दीश्वर तप प्रारभ किया जाता है।
पुनरपि सम्प्रति महाराजा ने आर्य सुहस्तिसूरि से पूछा—
भगवन्! इस दिवाली पर्व पर विशेष प्रकार से घरो की सजावट-
शृंगार, विशिष्ट अन्न वस्त्रादि का परिभोग, परस्पर जुहार
करना—यह जनता मे किस कारण से दिखाई पड रहा है? तव
आर्य सुहस्तिसूरि ने इस प्रकार प्रत्युत्तर दिया—
पूर्वकाल मे एक वार उज्जयिनी पुरी के उद्यान मे श्रीमुनिसुव्रत
स्वामी के शिष्य श्री सुव्रताचार्य समौसरे। उन्हे वन्दना करने के
लिए श्री धर्मराजा गया। नमुचि मंत्री भी वहाँ गया उसे आचार्य
महाराज के साथ विवाद करते हुए एक क्षुल्लक मुनि ने पराजित
कर दिया।
राजा के साथ वह घर चला गया और रात्रि में मुनि को
मारने के लिए नंगी तलवार लेकर उद्यान में गया। देवता ने उसे
७