विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपावापुरी-दीपावली-बृहत्कल्प ९५
में विचर कर बहत्तर वर्ष की सर्वायु पाल कर कात्तिकी अमावस्या
की रात्रि के अन्तिम प्रहार मे दूसरे चन्द्र संवत्सर, प्रीतिवर्द्धन
मास, नदिवर्द्धन पक्ष, देवानन्दा रात्रि, उपगम दिन, नागकरण,
सर्वार्थसिद्ध मुहूर्त्त, स्वाति नक्षत्र मे पर्यङ्कासन कृत स्वामी को गक्र
ने विनति की—भगवन् ! दो हजार वर्ष स्थिति वाला भस्मराशि
नामक तीसवाँ ग्रह अति नीचात्मा आपके जन्म नक्षत्र पर वर्त्तमान
मे आ रहा है, अत मुहूर्त्त भर प्रतीक्षा करे जिससे उसकी दृष्टि टल
जाय । अन्यथा आपके तीर्थ मे चिरकाल पीडा होगी । भगवान ने
कहा—हे इन्द्र ! हम पृथ्वी का छत्र ओर मेरु का दण्ड करके क्षण-
मात्र मे स्वयंभूरमण समुद्र को पार कर लोक को अलोक मे
फेंकने मे समर्थ हैं पर आयु कर्म को बढाने या घटाने मे समर्थ
नही । जो अवश्यभावी भाव है, उनका व्यतिक्रम नही, तो फिर
दो हजार वर्ष पर्यन्त अवश्यंभावी तीर्थ पीडा है । स्वामी ने पचपन
अध्ययन कल्याणफल विपाक के और पचपन पापफल विपाक
के कह कर छत्तीस अपृष्ट उत्तर कह कर प्रधान नामक अध्ययन
कहते हुए शैलेसी करण द्वारा योग निरोध करके अनन्तपचक-
युक्त अकेले सिद्धि प्राप्त हुए । अनत्तज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त
सम्यक्त्व, अनंत आनद, अनन्त वीर्य—ये अनन्तपचक हैं ।
उस समय उद्धार न किये जा सके ऐसे कुन्थुओ—सूक्ष्म जीवो
की उत्पत्ति देख कर आज से सयम दुराराध्य होगा, ज्ञात कर
बहुत से श्रमण और श्रमणियो ने अनशन कर दिया । अन्य भी
काशी कोगल देश के नौ मल्ल और नौ लिच्छवी—अठारह गण
राजाओ ने अमावस्या के पौषधोपवास पाड कर भवोद्योत के जाने
पर द्रव्योद्योत करेगे ऐसा विचार कर रत्नमय दीपको से उद्योत
किया । कालक्रम से अग्निदीपक होने लगे, इस प्रकार दीपावली
पर्व हुआ । देवो और देवियो के आने जाने से वह रात्रि उद्योतमय
कोलाहल पूर्ण हो गई । भगवान के गरीर का देवो ने सत्कार