विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनरेन्द्र का सुलतान सहावुद्दीन द्वारा निधन होने पर राज्यप्रधान
परमश्रावक सेठ रामदेव ने श्रावकसंघ को लेख भेजा कि—तुर्कों
का राज्य हो गया, अत श्री महावीर स्वामी की प्रतिमा को
प्रच्छन्न रखा देना । तब श्रावको ने दाहिन कुल मडन मण्डलीक
कयवास (कैमास) नामाङ्कित “कयवास स्थल” मे विपुल वालु के
टीवो मे रख दी, जो वहाँ रही ।
विक्रम स० १३११ मे अत्यन्त दारुण दुर्भिक्ष मे निर्वाह न होने
होने से आजीविका के लिए 'जोजओ' नामक सुथार कन्नाणय से
सुभिक्ष देश के प्रति सपरिवार चला । प्रथम प्रयाण थोडा करना,
ऐसा सोचकर उसने कयंवास स्थल मे रात्रिवास किया । आधीरात
के समय देवता ने उसे स्वप्न दिया कि—तुम् जहाँ सोये हुए हो
उसके इतने हाथ नीचे भगवान महावीर की प्रतिमा है, तुम देशा-
तर मत जाओ, तुम्हारा यही निर्वाह हो जायगा । उसने सभ्रम
पूर्वक जग कर अपने पुत्रादि से उस स्थान को खुदवाया और
महावीर स्वामी की प्रतिमा देखी तो प्रसन्नतापूर्वक नगर मे जाकर
श्रावकसघ को निवेदन किया । श्रावको ने महोत्सवपूर्वक पर-
मात्मा महावीर को चैत्यगृह मे प्रवेश कराके स्थापित किया ।
त्रिकाल पूजा होने लगी । अनेक वार तुर्कों के उपद्रव से मुक्त
रहे । उस सुधार के लिए श्रावको ने वृत्ति-निर्वाह कर दिया ।
प्रतिमा का परिकर खोजने पर भी प्राप्त नही हुआ, वह कही स्थल-
धोरो के बीच रहा हुआ है । उस पर प्रशस्ति-सवत्सरादि भी लिखे
हुए होने की संभावना है ।
एक दिन न्हवण कराने के पश्चात् भगवान के शरीर पर
पसीना छूटते देखा । बार-बार पोछने पर भी जव न रुका तो
विदग्ध श्रावको ने जाना कि—यहाँ कोई अवश्य उपद्रव होगा ।
दूसरे दिन प्रभात मे जट्ठुभ राजपूतो की धाड आई, सारा नगर
विध्वस्त हुआ । इस प्रकार प्रकट-प्रभावी स्वामी यावत् सवत्