विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्ण के जीव विजय, इक्कीसवे नारद के जीव मन्त्र, वाइसवे अवड
के जीव देव, तेइसवे अमर के जीव अनन्तवीर्य, चौबीसवे ज्ञातवुद्ध
के जीव भद्रकर तीर्थङ्कर होगे।
इन्ही के अन्तराल मे पश्चानुपूर्वी के जैसे वर्त्तमान जिन की
भाँति तब भी बारह भावी चक्रवर्त्ती होगे। वे इस प्रकार—
१ दीर्घदन्त, २ गूढदन्त, ३ शुद्धदन्त, ४ श्रीचन्द, ५ श्रीभूति,
६ श्रीसोम, ७ श्रीसोम, ७ पद्म, ८ नायक, ९ महापद्म,
१० विमल, ११ अमलवाहन, १२ अरिष्ट।
नौ भावी वासुदेव इस प्रकार होगे—१ नन्दी, २ नन्दिमित्र,
३ सुन्दरबाहु, ४ महाबाहु, ५ अतिबल, ६ महाबल, ७ वल,
८ द्विपृष्ठ, ९ त्रिपृष्ठ।
नौ भावी प्रतिवासुदेव ये होगे—१ तिलक, २ लोहजघ,
३ वज्रजघ, ४ केशरी, ५ बली, ६ प्रभराज, ७ अपराजित,
८ भीम, ९ सुग्रीव।
नौ भावी वलदेव —१ जयन्तर, २ अजित, ३. धर्म, ४ सुप्रभ,
५ सुदर्शन, ६ आनंद, ७ नदन, ८ पद्म, ९ सकर्षण।
अवसर्पिणी के तीसरे आरे मे ६१ शलाका-पुरुष होगे, अंतिम
तीर्थङ्कर और चक्रवर्त्ती दोनो चौथे आरे मे होगे। तब फिर मत्तग
आदि दश कल्पवृक्ष उपजेगे। अठारह कोटा-कोटि सागरोपम का
निरन्तर युगलाधर्म होगा। उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी काल अनन्त हो
गए और उससे अनन्त गुणे भारतवर्ष मे होगे।
इस प्रकार अन्य भी भविष्य काल का स्वरूप कह कर भगवान
ने गौतम स्वामी को देवशर्म विप्र को प्रतिबोध देने के लिए
किसी गाँव मे इसलिए भेजा कि जिससे इनका प्रेमबंध नष्ट
हो जाय।
भगवान तीस वर्ष गृहस्थावास मे रहे, पक्षाधिक साढे बारह
वर्ष छद्मस्थ और तीस वर्ष तेरह पक्ष से कुछ न्यून केवलिपर्याय