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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 442 में से

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पृष्ठ 175

(शेष होगे) अपराह्न मे अग्नि नष्ट होगी, इस प्रकार धर्म-राजनीति
पाक आदिका विच्छेद होगा । इस प्रकार पाँचवाँ दूपम आरा
सम्पूर्ण होगा ।
तत्पश्चात् छठे दु षम दु पम आरे के प्रवर्त्तन होने से प्रलय
वायु चलेगी, विषाक्त जलधर वर्षेंगे । सूर्य बारह गुणा तपेगा,
चन्द्रमा अत्यन्त शीत छोडेगा । गंगा-सिन्धु के दोनो किनारो मे
वैताढ्य मूल में बहत्तर बिलो मे छ खण्ड भरतवासी मनुष्य और
तिर्यंच निवास करेगे । वैताढ्य के इधर के पूर्व पश्चिम गंगा तटो
पर नौ नौ बिल इसी प्रकार वैताढ्य पर भी होगे इस प्रकार
छत्तीस हुए । इसी प्रकार सिन्धु तट पर भी छत्तीस होने से कुल
मिलाकर बहत्तर बिल होगे । रथमार्ग जितने चौडे गंगा-सिन्धु के
प्रवाह-जल में उत्पन्न मच्छादि को वे बिलवासी रात मे निकालेगे ।
दिन मे वे ताप के भय से निकालने में असमर्थ होगे । सूर्य-किरणो
से पकने पर वे उन्हे रात्रि में खावेंगे । औषधि, वृक्ष, ग्राम, नगर,
जलाशय, पर्वतादि वैताढ्य ऋषभकूट को छोडकर कही भी निवेश
स्थान नही देखेंगे । सोलह वर्ष की स्त्री और बीस वर्ष के पुरुष
पौत्र-अपौत्र देखेगे । एक हाथ प्रमाण काली कुरूप देह, उग्र-कषाय,
नग्न प्राय नरकगामी बिलवासी इक्कीस, हजार वर्ष पर्यन्त
होगे । इस प्रकार छठ्ठे आरे-अवसर्पिणी के शेष होने पर उत्सर्पिणी
का पहला आरा भी ऐसा ही होगा । उसके शेष होने पर दूसरे
आरे के प्रारम्भ मे सात-सात दिन पाँच प्रकार के मेघ क्रमशः
भारतवर्ष मे वर्षेंगे । जैसे कि पहला पुष्करावर्त ताप दूर करेगा,
दूसरा क्षीरोद धान्योत्पत्ति करेगा, तीसरा घृतोदक स्निग्धकारी
होगा, चौथा अमृतोदक औषधि उत्पन्न करेगा, पाँचवां रसोदक
भूमि को सरस करेगा । वे बिलवासी प्रतिसमय शरीर आयु बढाते
हुए पृथिवी का सुख देखकर बिलो से बाहर निकलेगे, धान्य और
फल का भोजन करते हुए मासाहार छोड़ देंगे ।