विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपावापुरी-दीपावली-वृहतकल्प ९१
आचार्य महाराज ने संघ की सम्मति लेकर एक आकाश-
गामी विद्यासंपन्न मुनि को आदेश दिया कि—मेरु चूला पर रहे
हुए विष्णुकुमार मुनि को बुला लाओ। उसने विज्ञप्ति की—
भगवन् ! मेरी जाने की शक्ति है किन्तु वापस लौटने की नही।
गुरु महाराज ने कहा—“वेही तुम्हे ले आवेगे ! तब वह मुनि
मेरु चूला पर गए। महर्षि को वन्दन कर सारा स्वरूप निवेदन
किया। वे तत्क्षण उस साधु को लेकर आकाश मे उडे। गजपुर
आकर राजकुल मे पहुँचे। नमुचि को छोड़ कर सभी ने उन्हे
वन्दना की। नमुचि ने पहचान लिया और बोला—“साधुओ को
ठहरने नही दूंगा !”
विष्णुकुमार ने तीन पग प्रमाण भूमि माँगी, उसने दे दी और
बोला—तीन पग से बाहर देखूगा तो मार दूंगा । तब विष्णु ऋषि
एक लाख योजन शरीर वाले बन गए। वे किरीट-कुण्डल-गदा-
चक्र और धनुष धारी थे, उनके पाँव-प्रहार से पृथ्वी काँपने लगी।
समुद्र क्षुब्ध हो गए। फुंकार से विद्याधर भग गए। नदियाँ उत्पथ
प्रवृत्त हो गई। तारे घूमने लगे, कुलगिरि डोलने लगे। मुनि
पूर्वापर समुद्र पर दोनो पाँव रख कर तीसरा पाँव नमुचि के शिर
पर देने को खड़े थे, तब इन्द्र ने अवधिज्ञान से जान कर सुराङ्ग-
नाओ को भेजा। वे कानो के पास रही हुई मधुर स्वर से शान्ति-
गर्भित उपदेश-गीत गाने लगी। और चक्रवर्त्ती आदि भी यह
व्यतिकर ज्ञात कर उन्हे प्रसन्न करने के लिए पाँवो मे गिर पड़े।
तब महर्षि प्रकृतिस्थ हो शान्त हो गए। चक्रवर्त्ती और संघ ने
क्षमा मागी। चक्रवर्त्ती ने दयापूर्वक नमुचि को विष्णुकुमार से
छुडवाया।
उस समय वर्षाकाल के चौथे मास का पक्ष-सन्धि दिन था, उस
उत्पात के शान्त होने पर लोक अपना पुनर्जन्म मानते हुए परस्पर
‘जुहार’ करने लगे। विशिष्टतर मण्डन, भोजन-छादन-ताम्बूल-