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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 183

१०० विविध तीर्थ-कल्प
दि परिभोग मे प्रवृत्त हुए तब से इस दिन प्रति वर्ष वे ही व्यव-
हार प्रवर्त्तते हैं। विष्णुकुमार तथा महापद्म चक्रवर्त्ती समय पर
केवली होकर सिद्ध हुए।
इस प्रकार दश पूर्वधर आर्य सुहस्तिसूरि के मुख से सुन कर
महाराजा सम्प्रति पर्व-दिवसो मे विशेष प्रकार से जिन-पूजारत
रहता था।
पूर्व काल मे मध्यमा पापा का नाम अपापापुरी था। शक्रेन्द्र
ने 'पावापुरी' यह नाम किया, क्योकि यहाँ महावीर स्वामी का
निर्वाण हुआ।
इसी पावापुरी मे वैशाख सुदि ११ के दिन जृम्भिक गाँव से
बारह योजन आकर पूर्वाह्न समय महासेन वन मे भगवान ने
ने पण्डितगणो से परिवृत और प्रमुदित गौतमादि गणधरो को
दीक्षा दी। उन्हे गणानुज्ञा दी। उन्होने तीन निषद्या मे उत्पाद,
विगम, ध्रौव्य लक्षण त्रिपदी स्वामी से पाकर तत्क्षण द्वादशाङ्गी
रचना की। इसी नगरी मे भगवान के कानो से सिद्धार्थ वणिक के
उपक्रम से खरक वैद्य ने काष्ठ-शलाका निकाली। उसके निकालने
पर अत्यन्त वेदनावश भगवान ने चीत्कार किया, उससे प्रत्यासन्न
पर्वत मे दरार पड गई। आज भी वहाँ बीच मे सन्धि-मार्ग
दिखायो पडता है। तथा इसी पुरी मे कार्त्तिक अमावस्या की रात्रि
मे भगवान के निर्वाण के स्थान पर मिथ्यादृष्टि लोग श्री वीर-
स्तूप स्थान पर स्थापित नागमण्डप मे आज भी चातुर्वर्णिक लोग
यात्रा महोत्सव करते हैं। उसी एक रात्रि मे देवानुभाव से कुएँ से
लाये हुए जल से पूर्ण सराव मे तेल बिना दीपक प्रज्वलित
होता है।
इन पूर्वोक्त अर्थो की भगवान ने इसी नगर मे व्याख्या की थी।
यही भगवान सिद्धि सम्प्राप्त हुए थे, इत्यादि अत्यद्भुत भूत सविधान
स्थान पावापुरी महातीर्थ है।