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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 188

कन्नानयनीय महावीर प्रतिमा-कल्प १०५

कराके स्थापित किया। गुरु महाराज ने वासक्षेप किया, प्रमु
महापूजाओ से पूजे जाते है।
फिर सुलतान-महाराजाधिराज के आदेग से श्रीजिनदेवसूरि
को अपने स्थान पर दिल्ली-मण्डल मे स्थापित कर गुरु महाराज
क्रमश महाराष्ट्र मण्डल पधारे। राजाधिराज ने श्रावकसघ सहित
उन्हे वृषभ, ऊँट, घोडे, हथिनी, मुखासनादि सामग्री दी। मार्ग के
नगरो में प्रभावना करते हुए पद पद पर सघ के द्वारा सम्मान
पाते हुए, अपूर्व तीर्थादि की वन्दना करते हुए, क्रमश सूरिजी
देवगिरि नगर पहुँचे । सघ ने प्रवेशमहोत्सव किया, सघपूजा
हुई।
सघपति जगसीह, साहण, मल्लदेव प्रमुख सघ के साथ प्रतिष्ठान-
पुर मे जीवत स्वामी श्री मुनिसुव्रत-प्रतिमा की यात्रा की।
पीछे विजय करके दिल्ली जाने पर महाराजा से श्री जिनदेव-
सूरि मिले. बहुमान दिया और एक सराय दी जिसका नाम सुलतान
सराय स्थापित किया। वहाँ चार सौ श्रावको के कुल को निवास
करने के लिए आदेश दिया। कलिकाल चक्रवर्त्ती-सुलतान ने वहाँ
पौषधशाला व चैत्य वनवाया। उन्ही भगवान महावीर स्वामी
(प्रतिमा) को वहाँ स्थापित किया। वहाँ श्वेताम्बर भक्त, दिगम्बर
भक्त श्रावक और परतीर्थिक लोग भी त्रिकाल पूजा करते हैं।
श्री महम्मदगाह द्वारा की हुई शासनोन्नति देखकर इस पञ्चम-
काल को भी लोग चतुर्थ काल की कल्पना करते हैं। क्लेश नष्ट
करने वाले श्री वीर जिनेश्वर की उपद्रव नाराक जनमननयना-
नन्दन प्रतिमा जहाँ तक चन्द्र-सूर्य हैं, जयवन्त हो।
कन्नाणयपुर के श्री महावीरप्रतिमा का यह कल्प आचार्य
श्री जिनसिंहसूरि के शिष्य मुनीश्वर ने लिखा है।