सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

५. पारदारिक अधिकरण १३१
अनुपयुक्त स्त्रियाँ—बुद्धिमान् पुरुष को चाहिये कि शङ्कित हृदय वाली, सशक्त पुरुषों
द्वारा रक्षित, पति से भयभीत एवं सास ससुर वाली स्त्री की भूल कर भी कामना न करे ॥ २८ ॥
परिचयकारणाभियोग प्रकरण नामक द्वितीय अध्याय सम्पन्न ॥
●
तृतीय अध्याय
भावपरीक्षाप्रकरण
अभियुञ्जानो योषितः प्रवृत्तिं परीक्षेत। तया भावः परीक्षितो भवति।
अभियोगाँश्च प्रतिगृह्णीयात् ॥ १ ॥
सूक्ष्म निरीक्षण आवश्यक—अभियोग करता हुआ नायक स्त्री की प्रवृत्ति की परीक्षा
करे, उसी से भाव की परीक्षा हो जाती है, और वह जो उपाय करे, उसका उत्तर दे ॥ १ ॥
मन्त्रमवृण्वानां दूत्यैनां साधयेत् ॥ २ ॥
प्रगल्भा दूती द्वारा ही साध्य—हृदय का भाव प्रकटित न करने वाली, धीर परकीया को,
रहस्य न कहने वाली, चतुर दूती से ही सिद्ध करना चाहिये ॥ २ ॥
अप्रतिगृह्णाभियोगं पुनरपि संसृज्यमानां द्विधाभूतमानसां विद्यात्। तां क्रमेण
साधयेत् ॥ ३ ॥
द्विधाग्रस्त—जो स्त्री नायक के अभियोग को अस्वीकार करके भी उससे पुनः मिलती
है, उसे दुविधा में फँसी हुई समझना चाहिये। उसे क्रमशः सिद्ध करना चाहिये ॥ ३ ॥
अप्रतिगृह्णाभियोगं सविशेषमलंकृता च पुनर्दृश्येत तथैव तमभिगच्छेच्च
विविक्ते बलाद् ग्रहणीयां विद्यात् ॥ ४ ॥
बलात् ग्राह्य—जो स्त्री नायक के अभियोगों को स्वीकार किये विना भी पहले की
अपेक्षा वस्त्राभूषणों से अधिक सज सँवरकर आये, तो नायक को उससे पहले के समान ही
मिलने का प्रयास करना चाहिये। यदि वह फिर भी हाथ न रखने दे और सज सँवर कर भी आती
रहे, तो उसे एकान्त में बलपूर्वक सम्भोग कराने वाली समझना चाहिये ॥ ४ ॥
बहूनपि विषहतेऽभियोगान्न च चिरेणापि प्रयच्छत्यात्मानं सा शुष्क-
प्रतिग्राहिणी परिचयविघटनसाध्या ॥ ५ ॥
अतिपरिचय से साध्य—जो स्त्री अनेक अभियोगों को सहन कर ले और चिरकाल तक
भी सम्भोग न होने दे, उसे नीरस अभियोग वाली जानना चाहिये। ऐसी स्त्री अतिपरिचय से ही
सिद्ध की जा सकती है ॥ ५ ॥
मनुष्यजातेश्चित्तानित्यत्वात् ॥ ६ ॥
मानव का चित्त अत्यन्त चञ्चल होता है, अतः वह परिचय टूटने पर पुनः परिचय कर
लेता है ॥ ६ ॥

१३२ वात्स्यायन-कामसूत्र
अभियुक्तापि परिहरति, न च संसृज्यते । न च प्रत्याचष्टे । तस्मिन्नात्मनि च
गौरवाभिमानात् । सातिपरिचयात् कृच्छ्रसाध्या । मर्मज्ञया दूत्या तां साधयेत् ॥ ७ ॥
मर्मज्ञ दूती से साध्य—कोई कोई स्त्री परपुरुष से कई कई बार मिलकर भी फिर मिलना
छोड़ देती है, न सम्भोग का अवसर ही देती है और न स्पष्ट ना ही करती है तथा इसी में अपना
गौरव समझती है। उसे अतिपरिचय से कठिनतापूर्वक सिद्ध किया जा सकता है या मर्मज्ञ दूती
द्वारा साधा जा सकता है ॥ ७ ॥
सा चेदभियुज्यमाना पारुष्येण प्रत्यादिशत्युपेक्ष्या ॥ ८ ॥
उपेक्षणीया—जो स्त्री नायक द्वारा अभियोग किये जाने पर निष्ठुरतापूर्वक उत्तर दे दे,
उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिये ॥ ८ ॥
परुषयित्वापि तु प्रीतियोजिनीं साधयेत् ॥ ९ ॥
विशेष बात—जो स्त्री कठोर वचन कहकर भी प्रेमसम्बन्ध बनाना चाहे, उसे अभियोगों
से सिद्ध कर लेना चाहिये ॥ ९ ॥
कारणात् संस्पर्शनं सहते नावबुध्यते नाम द्विधाभूतमानसा सातत्येन क्षान्त्या
वा साध्या ॥ १० ॥
अङ्गस्पर्श से साध्य—जो स्त्री किसी कारणवश अङ्गस्पर्श को इस प्रकार सहती हो मानो
कुछ जानती ही न हो, दुविधा में फँसी हुई ऐसी स्त्री को निरन्तर स्पर्श (आलिङ्गन आदि) से
सिद्ध किया जा सकता है ॥ १० ॥
समीपे शयानायाः सुप्तो नाम करमुपरि विन्यसेत् । सापि सुप्तेवोपेक्षते । जाग्रती
त्वपनुदेद् भूयोऽभियोगाकांक्षिणी ॥ ११ ॥
अधिक अभियोग चाहने वाली की पहचान—समीप में सोयी हुई सी नायिका के
ऊपर सोया हुआ सा नायक अपना हाथ रख दे। वह भी सोती हुई के समान उपेक्षा कर देगी,
किन्तु अधिक अभियोग की इच्छा रखने वाली नायक के हाथ को तुरन्त हटा देती है ॥ ११ ॥
एतेन पादस्योपरि पादन्यासो व्याख्यातः ॥ १२ ॥
पादन्यास—इसी कथन से पैर पर पर रखना भी कह दिया गया है ॥ १२ ॥
तस्मिन् प्रसुप्ते भूयः सुप्तसंश्लेषणमुपक्रमेत् ॥ १३ ॥
सुप्त आलिङ्गन—जब नायक निःशङ्क होकर नायिका के हाथ पर और पैर पर पैर रखने
लगे तो सोते हुए आलिङ्गन भी प्रारम्भ कर देना चाहिये ॥ १३ ॥
तदसहमानामुत्थितां द्वितीयेऽहनि प्रकृतिवर्तिनीमभियोगार्थिनीं विद्यात् । अदृ-
श्यमानां तु दूतीसाध्याम् ॥ १४ ॥
प्रगल्भा—यदि आलिङ्गन करते ही स्त्री उठ खड़ी हो और दूसरे दिन शान्त या सामान्य
ही हो, तो उसे अधिक अभियोग चाहने वाली समझे, अतएव उसकी प्राप्ति के लिये अभियोग
करे। यदि दूसरे दिन भी वह असामान्य या कुपित दिखायी दे, तो उसे दूती से सिद्ध करने का
प्रयास करे ॥ १४ ॥

५. पारदारिक अधिकरण १३३
चिरमदृष्टापि प्रकृतिस्थैव संसृज्यते कृतलक्षणां तां दर्शिताकारामुपक्र-
मेत् ॥ १५ ॥
आलिङ्गन को न सहकर शय्या से उठी हुई नायिका यदि बहुत दिनों बाद शान्तभाव से
मिलती है, तो उसके सङ्केत और हाव-भाव दिखाने पर पुनः अभियोग प्रारम्भ कर देना
चाहिये ॥ १५ ॥
अनभियुक्ताप्याकारयति। विविक्ते चात्मानं दर्शयति। सवेपथुगद्गदं वदति।
स्विन्नकरचरणाङ्गुलिः स्विन्नमुखी च भवति। शिरःपीडने संवाहने चोर्वोरात्मानं
नायके नियोजयति ॥ १६ ॥
अनुरागिणी—जो बिना अभियोग किये भी हाव-भाव दिखाती हो, एकान्त में अपने
गुह्याङ्गों को दिखाती हो, कम्पनयुक्त वाणी से गद्गद वचन बोलती हो, जिसके हाथ-पैर और
मुख पर पसीना आता हो, जो नायक के सिर और पैर दबाने लगती हो—उसे नायक की
अनुरागिणी समझना चाहिये ॥ १६ ॥
आतुरासंवाहिका चैकेन हस्तेन संवाहयन्ती द्वितीयेन बाहुना स्पर्शमावेदयति
श्लेषयति च। विस्मितभावा ॥ १७ ॥
कामातुर होकर वह एक हाथ से तो अपना पैर दबाती जाती है और विस्मृत सी हो कर
दूसरे हाथ से स्पर्श करने लगती है ॥ १७ ॥
निद्रान्धा वा परिस्पृश्योरुभ्यां बाहुभ्यामपि तिष्ठति। अलिकैकदेशमूर्वोरुपरि
पातयति। ऊरुमूलसंवाहने नियुक्ता न प्रतिलोमयति। तत्रैव हस्तमेकमविचलं
न्यस्यति। अङ्गसंदंशेन च पीडितं चिरादपनयति ॥ १८ ॥
अथवा नींद का बहाना करके दोनों हाथों से नायक का आलिङ्गन करके घुटनों के बल
खड़ी हो जाती है, अपने मस्तक को उसके घुटनों पर टिका देती है, नायक के पैर दबाती हुई
हाथों को उसकी जाँघों की ओर बढ़ाती है, नीचे की ओर नहीं लाती, एक हाथ को तो जाँघों के
मध्य में ही रखे रहती है और जब नायक उसके हाथ को जाँघों से बलपूर्वक दबाता है, तभी
नायक के अप्रसन्न होने के भय से कुछ देर बाद हाथ हटाती है ॥ १८ ॥
प्रतिगृह्यैवं नायकाभियोगान् पुनर्द्वितीयेऽहनि संवाहनायोपगच्छति ॥ १९ ॥
उस दिन इस प्रकार नायक के अभियोगों को ग्रहण कर अगले दिन वह पुनः नायक पैर
दबाने आ जाती है ॥ १९ ॥
नात्यर्थं संसृज्यते। न च परिहरति ॥ २० ॥
न अत्यधिक संसर्ग ही करती है और न नायक को छोड़ती ही है ॥ २० ॥
विविक्ते भावं दर्शयति निष्कारणं चागूढमन्यत्र प्रच्छन्नप्रदेशात् ॥ २१ ॥
एकान्त में, अकारण ही, हाव भाव दिखाने लगती है और जनसमुदाय के मध्य प्रच्छन्न
रूप से भाव दिखाती है ॥ २१ ॥
सन्निकृष्टपरिचारकोपभोग्या सा चेदाकारितापि तथैव स्यात् सा मर्मज्ञया दूत्या
साध्या ॥ २२ ॥

१३४ वात्स्यायन-कामसूत्र
मर्मज्ञ दूती द्वारा साध्य—जो नायिका नायक के पास रहकर, सेवा करके भोगने योग्य
हो, वह हाव भाव दिखाने पर भी ज्यों की त्यों ही रहती है, वह उसके रहस्यों को जानने वाली
दूतों के द्वारा ही सिद्ध की जा सकती है ॥ २२ ॥
व्यावर्तमाना तु तर्कणीयेति भावपरीक्षा ॥ २३ ॥
सम्यक् परीक्षा आवश्यक—जो नायिका संकेत करती हुई भी मिलने से पीछे हट जाये,
उस पर विचार करना चाहिये कि यह आन्तरिक मन से सङ्केत कर रही है या नायक को मूर्ख
बनाने का आनन्द ले रही है। इस प्रकार भावपरीक्षा पूर्ण हुई ॥ २३ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
आदौ परिचयं कुर्यात्ततश्च परिभाषणम्।
परिभाषणसम्मिश्रं मिथश्चाकारवेदनम् ॥ २४ ॥
उपसंहार—सर्वप्रथम नायिका से परिचय करना चाहिये। तत्पश्चात् वार्तालाप करना
चाहिये और इस वार्तालाप में ही भावों का आदान प्रदान और पहचान हो जानी चाहिये ॥ २४ ॥
प्रत्युत्तरेण पश्येच्चेदाकारस्य परिग्रहम्।
ततोऽभियुञ्जीत नरः स्त्रियं विगतसाध्वसः ॥ २५ ॥
नायक के सङ्केत करने पर नायिका सङ्केत द्वारा उत्तर दे दे तो नायक को निर्भय होकर उस
स्त्री की प्राप्ति हेतु अभियोग प्रारम्भ कर देना चाहिये ॥ २५ ॥
आकारेणात्मनो भावं या नारी प्राक्प्रयोजयेत्।
क्षिप्रमेवाभियोज्या सा प्रथमे त्वेव दर्शने ॥ २६ ॥
जो नायिका सङ्केत के साथ साथ अपने मनोभावों को भी जोड़ देती है, वह तो प्रथम दर्शन
में ही मिलन के लिये तैयार हो सकती है। अतएव ऐसी नायिका को प्रथम परिचय में ही प्राप्त
किया जा सकता है ॥ २६ ॥
श्लक्ष्णमाकारिता या तु दर्शयेत् स्फुटमुत्तरम्।
सापि तत्क्षणसिद्धेति विज्ञेया रतिलालसा ॥ २७ ॥
जो नायिका गुप्त सङ्केत का स्पष्ट उत्तर देती है, रतिलालसा वाली उस नायिका को तो उसी
समय सिद्ध समझना चाहिये अर्थात् उसे उसी समय भी प्राप्त किया जा सकता है ॥ २७ ॥
धीरायामप्रगल्भायां परीक्षिण्यां च योषिति।
एष सूक्ष्मो विधिः प्रोक्तः सिद्धा एव स्फुटं स्त्रियः ॥ २८ ॥
जो नायिका स्वभाव से गम्भीर हो, अपने मनोभावों को व्यक्त न होने दे और नायक की
अत्यधिक परीक्षा करती हो—ऐसी स्त्रियों के लिये ही यह सूक्ष्म विधि कही गयी है, क्योंकि वे
स्त्रियाँ सिद्ध हैं, यह तो स्पष्ट ही है ॥ २८ ॥
भावपरीक्षाप्रकरण नामक तृतीय अध्याय सम्पन्न ॥

५. पारदारिक अधिकरण १३५
चतुर्थ अध्याय
दूतीकर्मप्रकरण
दर्शिताङ्गिताकारां तु प्रविरलदर्शनामपूर्वां च दूत्योपसर्पयेत् ॥ १ ॥
दूतियों के कार्य—जिसने सङ्केत और चेष्टाओं से अनुकूलता दिखा दी हो, किन्तु कभी
कभी ही दीखे या अपरिचित स्त्री हो, उसे दूती के माध्यम से सिद्ध करना चाहिये ॥ १ ॥
सैनां शीलतोऽनुप्रविश्याख्यानकपटैः सुभगङ्करणयोगैर्लोकवृत्तान्तैः
कविकथाभिः पारदारिककथाभिश्च तस्याश्च रूपविज्ञानदाक्षिण्यशीलानु-
प्रशंसाभिश्च तां रञ्जयेत् ॥ २ ॥
दूती के सामान्य कार्य—दूती जिस स्त्री पर डोरे डालना चाहती हो, उसके घर अपने
उत्तम शीलस्वभाव का परिचय देकर प्रवेश करे। तत्पश्चात् कपटपूर्ण आख्यानों से, सौन्दर्यवर्धक
योगों से, लोकवृत्तान्तों से, कविकल्पित कथाओं से, परकीया और उपपति-विषयक शृङ्गार
सम्बद्ध कहानियों से और उस स्त्री के सौन्दर्य, ज्ञान, शील और चातुर्य की प्रशंसा कर, उसे
अनुरागिनी बना ले ॥ २ ॥
कथमेवंविधायास्तवायमित्थम्भूतः पतिरिति चानुशयं ग्राहयेत् ॥ ३ ॥
पति से विद्वेष कराना—'तुम जैसी रूपवती, कलानिपुण एवं व्यवहारकुशल को ऐसा
ग्राम्य एवं अरसिक पति कैसे मिला ?' यह कहकर उसके हृदय में पति के प्रति घृणा और द्वेष
उत्पन्न कर दे ॥ ३ ॥
न तव सुभगे दास्यमपि कर्तुं युक्त इति ब्रूयात् ॥ ४ ॥
'हे सुन्दरि ! यह तो तुम्हारा दास होने योग्य भी नहीं है'—ऐसा कहे ॥ ४ ॥
मन्दवेगतामीर्ष्यालुतां शठतामकृतज्ञतां चासम्भोगशीलतां कदर्यतां
चपलतामन्यानि च यानि तस्मिन् गुह्यान्यस्या अभ्याशे सति सद्भावेऽतिशयेन
भाषेत ॥ ५ ॥
'तुम्हारा पति मन्दवेग है, यह तुम्हारी अनुपम रूपमाधुरी से ईर्ष्या करता है, यह तुमसे
कपटपूर्ण आचरण रखता है, यह कृतघ्न है, यह भोगविलास में रुचि नहीं रखता, अपितु उससे
उदासीन रहता है, यह कदाचारी और चंचल है'—इन दोषों के अतिरिक्त भी जो अन्य गुप्त दोष
उसमें हों, उन सबको पत्नी से कहे। यदि वह विदग्ध और सच्चरित्र हो तो उसमें और भी
अधिक दोष दिखाये ॥ ५ ॥
येन च दोषेणोद्विग्नां लक्षयेत्तेनैवानुप्रविशेत् ॥ ६ ॥
जिस दोष को सुनकर नायिका को उद्विग्न देखे, उसी दोष से उसे पति से विमुख कर
दे ॥ ६ ॥
यदासौ मृगी तदा नैव शशतादोषः ॥ ७ ॥
दोषकथन में ध्यातव्य बातें—यदि नायिका मृगी जाति की हो तो पुरुष का शश जाति
का होना दोष नहीं है ॥ ७ ॥

१३६ वात्स्यायन-कामसूत्र
एतेनैव वडवाहस्तिनीविषयश्चोक्तः ॥ ८ ॥
इसी से वडवा और हस्तिनी का विषय भी कह दिया गया है ॥ ८ ॥
नायिकाया एव तु विश्वास्यतामुपलभ्य दूतीत्वेनोपसर्पयेत् प्रथमसाहसायां
सूक्ष्मभावायां चेति गोणिकापुत्रः ॥ ९ ॥
जो नायिका प्रथम बार परपुरुष से मिलने का साहस करती हो या जो अपने हृदयस्थ
भावों को प्रस्फुटित न कर रही हो, ऐसी नायिका की विश्वस्त बनकर दूती उसे दौत्यकर्म से
अपने घर बुलाये—यह आचार्य गोणिकापुत्र का मत है ॥ ९ ॥
सा नायकस्य चरितमनुलोमतां कामितानि च कथयेत् ॥ १० ॥
नायक के प्रति अनुकूलन—वह दूती नायक की वैभवपूर्ण जीवनगाथा, उसकी सरलता
और रमण के आदि, मध्य एवं अन्त के भावों का वर्णन करे ॥ १० ॥
प्रसृतसद्भावायां च युक्त्या कार्यशरीरमित्थं वदेत् ॥ ११ ॥
यदि नायिका को रमणोत्सुक देखे तो युक्तिपूर्वक उससे इस प्रकार कहे ॥ ११ ॥
'शृणु विचित्रमिदं सुभगे, त्वां किल दृष्ट्वामुत्रासावित्थं गोत्रपुत्रो
नायकश्चित्तोन्मादमनुभवति। प्रकृत्या सुकुमारः कदाचिदन्यत्रापरिक्लिष्ट-
पूर्वस्तपस्वी। ततोऽधुना शक्यमनेन मरणमप्यनुभवितुम्'—इति वर्णयेत् ॥ १२ ॥
कथनपद्धति—'हे परमसुन्दरि! मैं तुम्हें एक विचित्र बात सुनाती हूँ, तुम उसे ध्यान से
सुनो। उस प्रसिद्ध परिवार का वह युवक उस स्थान पर तुम्हें देखकर कामोन्मत्त हो गया है। वह
स्वभाव से अत्यन्त सुकुमार है। उसने अभी तक जीवन में कभी कष्ट नहीं उठाया है। वह तो
तपस्वी है। यदि उसने तुम्हें नहीं पाया तो वह तड़प तड़प कर मर जायेगा'—इस प्रकार नायिका
से कहे ॥ १२ ॥
तत्र सिद्धा द्वितीयेऽहनि वाचि वक्त्रे दृष्ट्यां च प्रसादमुपलक्ष्य पुनरपि कथां
प्रवर्त्तयेत् ॥ १३ ॥
दूसरे दिन का कार्य—इन बातों में यदि दूती को सफलता मिल जाये अर्थात् नायिका
बातें रुचिपूर्वक सुनती रहे, तो दूती उसे दूसरे दिन फिर बुलाये और यदि उसके मुख और नेत्रों
पर प्रसन्नता झलकती हो तो उससे साधारण वार्तालाप प्रारम्भ कर दे ॥ १३ ॥
शृण्वत्यां चाहल्याविमारकशाकुन्तलादीन्यन्यान्यपि लौकिकानि च कथयेत्
तद्युक्तानि ॥ १४ ॥
जब वह बातें सुनने में लीन हो जाये तो उसे अहल्या, अविमारक और शकुन्तला की
कथाएँ तथा परकीय और उपपति (परपुरुष) से सम्बन्धित अन्यान्य लौकिक कथाएँ
सुनाये ॥ १४ ॥
वृषतां चतुःषष्टिविज्ञतां सौभाग्यं च नायकस्य। श्लाघनीयतां ( या ) चास्य
प्रच्छन्नं सम्प्रयोगं भूतमभूतपूर्वं वा वर्णयेत् ॥ १५ ॥
नायक की प्रबल सम्भोगशक्ति और चौंसठ कलाओं में निपुणता तथा नायिका की

५. पारदारिक अधिकरण १३७
सौभाग्यशालिता एवं उत्तमता का वर्णन कर, उसके पूर्वकाल में हुए या अनहुए (कल्पित)
सम्भोगों का वर्णन करे ॥ १५ ॥
आकारं चास्या लक्षयेत् ॥ १६ ॥
भावभङ्गिमाओं की परीक्षा—नायक के सम्भोगों की बातें सुनाते समय उसकी
भावभङ्गिमा की परीक्षा करती रहे ॥ १६ ॥
सविहसितं दृष्ट्वा सम्भाषते ॥ १७ ॥
भावबोधक व्यापार—देखकर मुसकाती हुई बोलती है ॥ १७ ॥
आसने चोपनिमन्त्रयते ॥ १८ ॥
सम्मानपूर्वक आसन पर बैठने के लिये कहती है ॥ १८ ॥
क्वासितं क्व शयितं भुक्तं क्व चेष्टितं किं वा कृतमिति पृच्छति ॥ १९ ॥
कल कहाँ बैठीं ? कहाँ सोयीं ? कल क्या खाना खाया ? अथवा कल दिनभर क्या करती
धरती रहीं ?—इत्यादि प्रश्न पूछती है ॥ १९ ॥
विविक्ते दर्शयत्यात्मानम् ॥ २० ॥
उससे एकान्त में बातें करती है या एकान्त में मिलती है ॥ २० ॥
आख्यानकानि नियुङ्क्ते ॥ २१ ॥
नायक की बातें स्वयं आरम्भ करती है ॥ २१ ॥
चिन्तयन्ती निःश्वसिति विजृम्भते च ॥ २२ ॥
कुछ सोचती हुई दीर्घोच्छ्वास और जँभाई लेती है ॥ २२ ॥
प्रीतिदायं च ददाति ॥ २३ ॥
प्रेमपूर्वक भेंट देती है ॥ २३ ॥
इष्टेषूत्सवेषु च स्मरति ॥ २४ ॥
इष्ट कार्यों और उत्सवों में उसे स्मरण करती है अर्थात् उत्सव आदि में उसे आमन्त्रित
करती है ॥ २४ ॥
पुनर्दर्शनानुबन्धं विसृजति ॥ २५ ॥
पुनः आने की शर्त पर ही घर से जाने देती है ॥ २५ ॥
साधुवादिनी सती किमिदमशोभनमभिधत्से इति कथामनुबध्नाति ॥ २६ ॥
'आप सदाचारिणी होकर ऐसी अशोभन बातें क्यों करती हैं?'—यह वार्तालाप के
अन्तर्गत कह देती है ॥ २६ ॥
नायकस्य शाठ्यचापल्यसम्बद्धान् दोषान् ददाति ॥ २७ ॥
नायक की चपलता और धूर्तता को कहती है ॥ २७ ॥
पूर्वप्रवृत्तं च तत्सन्दर्शनं कथाभियोगं च स्वयमकथयन्ती तयोच्यमानमाकां-
क्षति ॥ २८ ॥

१३८ वात्स्यायन-कामसूत्र
नायक की पूर्वप्रवृत्ति और उसके दर्शन से सम्बन्धित कथावार्ताओं को सङ्कोचवश स्वयं
न कहकर भी दूती से सुनने की इच्छा रखती है ॥ २८ ॥
नायकमनोरथेषु च कथ्यमानेषु सपरिभवं नाम हसति। न च
निर्वदतीति ॥ २९ ॥
नायक के मनोरथ कहे जाने पर तिरस्कारपूर्वक हँस देती है, लेकिन यह भी नहीं कहती
कि उसका मनोरथ अवश्य पूर्ण होगा ॥ २९ ॥
दूत्येनां दर्शिताकारां नायकाभिज्ञानैरुपबृंहयेत् ॥ ३० ॥
अनुकूलित आकार का फल—पूर्वोक्त रीति से जिसके भावव्यञ्जक व्यापारों को देख
लिया हो, उसे दूती नायक की पुरानी बातों पर अनुरक्त करे ॥ ३० ॥
असंस्तुतां तु गुणकथनैरनुरागकथाभिश्चावर्जयेत् ॥ ३१ ॥
जिस नायिका का नायक के साथ परिचय न हो, उसे तो नायक के गुणों और उसकी
प्रेमकथाओं को सुना सुनाकर ही अनुरक्त करे ॥ ३१ ॥
नासंस्तुतादृष्टाकारयोर्दूत्यमस्तीत्यौद्दालकिः ॥ ३२ ॥
दूतीकर्म पर मतवैभिन्न्य—जो नायिका अपरिचित है और जिसके भावव्यञ्जक व्यापारों
की परीक्षा नहीं की गयी है, उसके साथ दूतीकर्म नहीं हो सकता—यह महर्षि श्वेतकेतु का मत
है ॥ ३२ ॥
असंस्तुतयोरपि संसृष्टाकारयोरस्तीति बाभ्रवीयाः ॥ ३३ ॥
अपरिचित होने पर भी यदि नायिका की अनुकूल चेष्टाएँ देख ली गयी हों, तो उसके साथ
दूतीकर्म हो सकता है—ऐसा बाभ्रव्य आचार्य के अनुयायियों (शिष्यों) का मत है ॥ ३३ ॥
संस्तुतयोरप्यसंसृष्टाकारयोरस्तीति गोणिकापुत्रः ॥ ३४ ॥
अपरिचित और बिना अनुकूल चेष्टाओं वाली नायिका के साथ भी दूतीकर्म हो सकता
है—यह इस अधिकरण के विशेषज्ञ आचार्य गोणिकापुत्र का मत है ॥ ३४ ॥
असंस्तुतयोरदृष्टाकारयोरपि दूतीप्रत्ययादिति वात्स्यायनः ॥ ३५ ॥
दूती के विश्वास पर पूर्णतः अपरिचित और विना अनुकूल चेष्टाओं वाली नायिका के साथ
भी दूतीकर्म होता है—ऐसी महर्षि वात्स्यायन की व्यवस्था है ॥ ३५ ॥
तासां मनोहराण्युपायनानि ताम्बूलमनुलेपनं स्रजमङ्गुलीयकं वासो वा तेन
प्रहितं दर्शयेत् ॥ ३६ ॥
वस्तुप्रेषण—अपरिचित होने पर भी नायक उसे मनोहर भेंट, पान, अनुलेप, माला,
अँगूठी आदि भेजे ॥ ३६ ॥
तेषु नायकस्य यथार्थं नखदशनपदानि तानि तानि च चिह्नानि स्युः ॥ ३७ ॥
उन उपहार की वस्तुओं पर नायक के नखों और दाँतों के चिह्न अङ्कित हों ॥ ३७ ॥
वाससि च कुङ्कुमाङ्कमञ्जलिं निदध्यात् ॥ ३८ ॥
नायिका को उपहार में भेजे जाने वाले वस्त्रों पर केसर के थापे लगा दे ॥ ३८ ॥

५. पारदारिक अधिकरण १३९
पत्रच्छेद्यानि नानाभिप्रायाकृतीनि दर्शयेत्। लेखपत्रगर्भाणि कर्णपत्राण्या-
पीडांश्च ॥ ३९ ॥
पत्रों पर अनेक प्रकार की अभिप्रायबोधक आकृतियाँ बनाये। कर्णपत्र और आपीड
(माला) भी इस प्रकार बनाये कि उनके अन्दर प्रेमपत्र छिपाकर रखा जा सके ॥ ३९ ॥
तेषु स्वमनोरथाख्यापनम्। प्रतिप्राभृतदाने चैनां नियोजयेत् ॥ ४० ॥
उन प्रेमपत्रों में अपने मनोरथों को बताये और प्रेमपत्रों के निरन्तर आदान-प्रदान की
योजना बनाये ॥ ४० ॥
एवं कृतपरस्परपरिग्रहयोश्च दूतीप्रत्ययः समागमः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार एक-दूसरे के हृदय में कामना उत्पन्न करके दूती के विश्वास पर समागम
होता है ॥ ४१ ॥
स तु देवताभिगमने यात्रायामुद्यानक्रीडायां जलावतरणे विवाहे यज्ञव्यसनो-
त्सवेष्वग्न्युत्पाते चौरविभ्रमे जनपदस्य चक्रारोहणे प्रेक्षाव्यापारेषु तेषु तेषु च
कार्येष्विति बाभ्रवीयाः ॥ ४२ ॥
मिलन का अवसर—वह समागम तो देवपूजा या देवयात्रा को जाते समय, वनविहार के
समय, जलविहार के समय, विवाह में सम्मिलित होते समय, आग लग जाने आदि उपद्रवों के
समय, चोरों को पकड़ने के कोलाहल में, राजा के परिवर्तन के समय, खेल-तमाशों के समय
और ऐसे ही अन्यान्य कार्यों के समय होता है—यह आचार्य बाभ्रव्य के अनुयायियों का मत
है ॥ ४२ ॥
सखीभिक्षुकीक्षपणिकातापसीभवनेषु सुखोपाय इति गोणिकापुत्रः ॥ ४३ ॥
मिलनस्थल—सखी, भिक्षुणी, संन्यासिनी और तपस्विनी—इनके घरों में नायक और
नायिका का मिलन सरलता से सम्भव है—यह आचार्य गोणिकापुत्र का मत है ॥ ४३ ॥
तस्या एव तु गेहे विदितनिष्क्रमप्रवेशे चिन्तितात्ययप्रतीकारे प्रवेशनमुपपन्नं
निष्क्रमणमविज्ञातकालं च तन्नित्यं सुखोपायं चेति वात्स्यायनः ॥ ४४ ॥
यदि प्रवेश करने और निकलने का मार्ग पता हो, तो उस नायिका के घर पर भी समागम
हो सकता है। यह नित्य और अविज्ञात होने से सुख का उपाय है—ऐसा आचार्य वात्स्यायन का
मत है ॥ ४४ ॥
निसृष्टार्था परिमितार्था पत्रहारी स्वयंढूती मूढदूती भार्यादूती मूकदूती वातदूती
चेति दूतीविशेषाः ॥ ४५ ॥
दूतीभेद—सामान्य रूप से दूतीकर्म बताकर अब दूतियों के भेद बताते हैं—निसृष्टार्था,
परिमितार्था, पत्रहारी, स्वयंढूती, मूढदूती, भार्यादूती, मूकदूती और वातदूती—ये दूतियों के
भेद हैं ॥ ४५ ॥
नायकस्य नायिकायाश्च यथामनीषितमर्थमुपलभ्य स्वबुद्ध्या कार्यसम्पादिनी
निसृष्टार्था ॥ ४६ ॥
काम० ११

४. पारदारिक, वैशिक एवं औपनिषदिक अधिकरण (दूत-कर्म, गणिका-लक्षण, रसायन व उपसंहार)

१४० वात्स्यायन-कामसूत्र
निसृष्टार्था दूती—जो दूती नायक और नायिका के अभिलषित प्रयोजन को समझकर
अपनी बुद्धि से कार्य सम्पादित करती है, वह निसृष्टार्था दूती कहलाती है ॥ ४६ ॥
सा प्रायेण संस्तुतसम्भाषणयोः ॥ ४७ ॥
इसका विषय—यह दूती प्रायः उन्हीं नायक नायिकाओं का कार्य करती है जिनमें
परस्पर परिचय और सम्भाषण हो ॥ ४७ ॥
नायिकया प्रयुक्ता असंस्तुतसम्भाषणयोरपि ॥ ४८ ॥
नायिका द्वारा भेजी गयी दूती परिचय और वार्तालाप के बिना भी कार्य सम्पादित
करती है ॥ ४८ ॥
कौतुकाच्चानुरूपौ युक्ताविमौ परस्परस्येत्यसंस्तुतयोरपि ॥ ४९ ॥
यदि यह निसृष्टार्था दूती परस्पर अनुरूप और उपयुक्त नायक नायिकाओं को मिलाना
चाहे तो उन्हें भी मिला सकती है ॥ ४९ ॥
कार्यैकदेशमभियोगैकदेशं चोपलभ्य शेषं संपादयतीति परिमितार्था ॥ ५० ॥
परिमितार्था दूती—नायक-नायिका के मिलन के एक अंश (अभियोग के एक भाग)
को जानकर, शेष का स्वयं उपाय कर ले, वह परिमितार्था दूती कहलाती है ॥ ५० ॥
सा दृष्टपरस्पराकारयोः प्रविरलदर्शनयोः ॥ ५१ ॥
इसका विषय—जहाँ नायक नायिका ने एक दूसरे की अनुकूल चेष्टाएँ देख ली हों,
लेकिन वे एक दूसरे को कम ही दिखायी देते हों, वहाँ पर परिमितार्था दूती मिलन का कार्य
करती है ॥ ५१ ॥
सन्देशमात्रं प्रापयतीति पत्रहारी ॥ ५२ ॥
पत्रहारी दूती—जो दूती नायक और नायिका का सन्देश या पत्र ले जाने का कार्य करती
है, वह पत्रहारी दूती कहलाती है ॥ ५२ ॥
सा प्रगाढसद्भावयोः संसृष्टयोश्च देशकालसम्बोधनार्थम् ॥ ५३ ॥
इसका विषय—यह दूती उन नायक-नायिकाओं के मिलन के स्थल एवं समय निश्चित
करने के लिए होती है जो परस्पर-प्रेमपाश में बँध चुके हों और कई बार मिल चुके हों ॥ ५३ ॥
दौत्येन प्रहितान्यया स्वयमेव नायकमभिगच्छेदजानती नाम तेन सहोपभोगं
स्वप्ने वा कथयेत् । गोत्रस्खलितं भार्यां चास्य निन्देत् । तद्व्यपदेशेन स्वयमीर्ष्यां
दर्शयेत् । नखदशनचिह्नितं वा किञ्चिद् दद्यात् । भवतेऽहमादौ दातुं सङ्कल्पितेति
चाभिदधीत । मम भार्यायाः का रमणीयेति विविक्ते पर्यनुयुञ्जीत सा
स्वयंदूती ॥ ५४ ॥
स्वयंदूती (प्रथम)—जब कोई नायिका किसी स्त्री को दूतकर्म के लिए भेजती है और
वह स्वयं ही नायक की कामना करने लगे, तो उसे स्वयंदूती कहते हैं। वह नायक से अपरिचित
होती हुई भी स्वप्न में उसके साथ सम्भोग की बातें कहे, अपने इस पतन और उसकी स्त्री
(नायिका) की निन्दा करे, किसी बहाने से उस नायिका से ईर्ष्या दिखाये, अथवा नखों और
!दाँतों से चिह्न बनाकर कुछ वस्तु उस नायक को दे और उससे कहे कि मेरे माता पिता ने पहले

५. पारदारिक अधिकरण १४१
मेरा विवाह आप से ही करने का सङ्कल्प किया था। मुझमें और आप की स्त्री में, दोनों में कौन
सुन्दर है ?—जो इस प्रकार से एकान्त में जाकर सब प्रकार से अनुयोग करे, उसे स्वयंदूती कहते
हैं ॥ ५४ ॥
तस्या विविक्ते दर्शनं प्रतिग्रहश्च ॥ ५५ ॥
स्वयंदूती का मिलनस्थल—स्वयंदूती का दर्शन और सन्देशग्रहण एकान्त में ही होना
चाहिये ॥ ५५ ॥
प्रतिग्रहच्छलेनान्यामभिसन्धायस्याः संदेशश्रावणद्वारेण नायकं साधयेत् तां
चोपहन्यात्सापि स्वयंदूती ॥ ५६ ॥
स्वयंदूती ( द्वितीय )—नायक का सन्देश लाने के बहाने अभिसन्धि करके नायिका का
सन्देश सुनाने के माध्यम से नायक को स्वयं सिद्ध कर ले, नायिका को नायक से न मिलने दे,
वह भी स्वयंदूती ही है ॥ ५६ ॥
एतया नायकोऽप्यन्यदूतश्च व्याख्यातः ॥ ५७ ॥
स्वयंदूत—स्वयंदूती के माध्यम से स्वयंदूत भी कह दिया गया है अर्थात् जो पुरुष किसी
नायक का सन्देश ले जाने के बहाने नायिका के पास जाता है और उसे स्वयं ही अनुरक्त कर
लेता है, नायक से नहीं मिलने देता, वह स्वयंदूत कहलाता है ॥ ५७ ॥
नायकभार्यां मुग्धां विश्‍वास्यायन्त्रणयानुप्रविश्य नायकस्य चेष्टितानि पृच्छेत् ।
योगाञ्शिक्षयेत् । साकारं मण्डयेत् । कोपमेनां ग्राहयेत् । एवं च प्रतिपद्यस्वेति
भावयेत् । स्वयं चास्यां नखदशनपदानि विवर्तयेत् । तेन द्वारेण नायकमाकारयेत् सा
मूढदूती ॥ ५८ ॥
मूढदूती—नायक की मुग्धा भार्या को विश्‍वास दिलाकर, बिना किसी कष्ट के उसके
हृदय में छिपी हुई नायक-सम्बन्धी बातें पूछे, उसे सम्भोग की क्रियाएँ सिखाये, अभिप्रायसूचक
शृङ्गार कराये, पति से उसका द्वेष करा दे, उसके अङ्गों पर स्वयं ही नखक्षत एवं दन्तक्षय अङ्कित
कर दे—इस प्रकार कठिनतापूर्वक अपना आशय प्रकटित करे, उसे मूढदूती कहते हैं ॥ ५८ ॥
तस्यास्तयैव प्रत्युत्तराणि योजयेत् ॥ ५९ ॥
इसका प्रत्युत्तर—यदि कोई स्त्री ऐसी मूढदूती से कार्य करा रही हो, तो नायक को
बदला लेने के लिये उससे ही सम्भोग करना चाहिये ॥ ५९ ॥
स्वभार्यां वा मूढां प्रयोज्य तया सह विश्‍वासेन योजयित्वा तयैवाकारयेत् ।
आत्मनश्च वैचक्षण्यं प्रकाशयेत् । सा भार्या दूती तस्यास्तयैवाकारग्रहणम् ॥ ६० ॥
भार्यादूती—अपनी अबोध स्त्री को उस नायिका के साथ मिलाकर, उसी से अपने
मनोभावों को प्रकटित कराये और अपनी कुशलता का परिचय दे। क्योंकि यहाँ भार्या द्वारा ही
नायिका की चेष्टाओं का ग्रहण होता है, इसलिए इसे भार्यादूती कहते हैं ॥ ६० ॥
बालां वा परिचारिकामदोषज्ञामदुष्टेनोपायेन प्रहिणुयात् । तत्र स्रजि कर्णपत्रे
वा गूढलेखनिधानं नखदशनपदं वा सा मूकदूती। तस्यास्तयैव
प्रत्युत्तरप्रार्थनम् ॥ ६१ ॥

१४२ वात्स्यायन-कामसूत्र
मूकदूती— भले-बुरे का ज्ञान न रखने वाली अवयस्क परिचारिका को उस नायिका के
घर खेलने भेजे। उसके साथ नायिका का अच्छा परिचय हो जाने पर माला या कर्णपत्र में गूढ़
प्रेमपत्र रखकर नखक्षत एवं दन्तक्षत बनाये। इस प्रकार कार्य करने वाली मूकदूती होती है।
इसका प्रत्युत्तर उस नायिका से ही माँगे ॥ ६१ ॥
पूर्वप्रस्तुतार्थलिङ्गसम्बद्धमन्यजनाग्रहणीयं लौकिकार्थं द्व्यर्थं वा
वचनमुदासीना या श्रावयेत् सा वातदूती। तस्या अपि तयैव प्रत्युत्तरप्रार्थनमिति
तासां विशेषः ॥ ६२ ॥
वातदूती— नायक-नायिका के पूर्ववर्ती वृत्तान्त के बोधक, लौकिक या द्व्यर्थक वचनों
को, जिन्हें अन्य न समझ सकें, जो उदासीन होकर सुनाये और उससे उसी भाषा में उत्तर भी ले
ले, उसे वातदूती कहते हैं ॥ ३२ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
विधवेक्षणिका दासी भिक्षुकी शिल्पकारिका।
प्रविशत्याशु विश्वासं दूतीकार्यं च बिन्दति ॥ ६३ ॥
इस विषय में आनुवंश्य श्लोक उद्धृत करते हैं—
विधवा, शकुन बताने वाली, दासी, भिक्षुणी, महावर लगाने एवं बाल सँवारने वाली
नाइन—ये शीघ्र ही प्रविष्ट होकर विश्वासपात्र बन जाती हैं और फिर दूती का काम करने
लगती हैं ॥ ६३ ॥
संक्षेपेण दूतीकर्माण्यह—
विद्वेषं ग्राहयेत् पत्यौ रमणीयानि वर्णयेत्।
चित्रान् सुरतसम्भोगानन्यासामपि दर्शयेत् ॥ ६४ ॥
दूतीकर्म : सारसंक्षेप— दूतियाँ पतियों से विद्वेष करा दें, जिस नायक से उसे मिलाना
चाहें, उसके रूप आदि की प्रशंसा करें। अन्य स्त्रियों के समक्ष भी सुरत और सम्भोगों के
अश्लील चित्र दिखायें ॥ ६४ ॥
नायकस्यानुरागं च पुनश्च रतिकौशलम्।
प्रार्थनां चाधिकस्त्रीभिरवष्टम्भं च वर्णयेत् ॥ ६५ ॥
नायक के अनुराग और रतिकौशल का वर्णन करे। नायिका से भी अधिक रूपवती,
धनवती और शीलवती स्त्रियों की प्रार्थना को बताये कि ये स्त्रियाँ भी उस पर अनुरक्त हैं। साथ
ही, नायक के दृढ़ निश्चय को भी प्रकटित करे ॥ ६५ ॥
असङ्कल्पितमप्यर्थमुत्सृष्टं दोषकारणात्।
पुनरावर्तयत्येव दूती वचनकौशलात् ॥ ६६ ॥
जिसके विषय में कभी सोचा भी न गया हो, जो दोषों के कारण त्याग दिया गया हो, दूती
अपने वाक्चातुर्य से ऐसे नायकों को भी सुन्दरियों का प्रेमी बना देती है ॥ ६६ ॥
दूतीकर्म प्रकरण नामक चतुर्थ अध्याय सम्पन्न॥

५. पारदारिक अधिकरण १४३
पञ्चम अध्याय
ईश्वरकामितप्रकरण
न राज्ञां महामात्राणां वा परभवनप्रदेशो विद्यते। महाजनेन हि चरितमेषां
दृश्यतेऽनुविधीयते च ॥ १ ॥
परगृह प्रवेश न करने के कारण—राजा और महामन्त्रियों का प्रायः दूसरे के घर जाना
उचित नहीं होता, क्योंकि लोक में महाजनों का जो चरित देखा जाता है, उसी का सब अनुकरण
करते हैं ॥ १ ॥
सवितारमुद्यन्तं त्रयो लोकाः पश्यन्ति अनूद्यन्ते च। गच्छन्तमपि
पश्यन्त्यनुप्रतिष्ठन्ते च ॥ २ ॥
सूर्य के दृष्टान्त से पुष्टि—सूर्य को उगते हुए देखकर तीनों लोक आलस्य छोड़कर उठ
जाते हैं और उसे अस्त होते देखकर अपनी दैनिक क्रियाओं से निवृत्त हो जाते हैं ॥ २ ॥
तस्मादशक्यत्वाद् गर्हणीयत्वाच्चेति न ते वृथा किञ्चिदाचरेयुः ॥ ३ ॥
दृष्टान्त का फलितार्थ—क्योंकि समर्थ पुरुषों को परकीयागमन, परगृह में अप्रवेश के
कारण अशक्य और लोक में आलोचना का विषय होने से निन्दनीय है, अतः उन्हें इसमें प्रवृत्त
नहीं होना चाहिये ॥ ३ ॥
अवश्यं त्वाचरितव्ये योगान् प्रयुञ्जीरन् ॥ ४ ॥
अपरिहार्यता पर उपाय—यदि किसी कारणवश या रागवश परकीयागमन अपरिहार्य हो
जाये तो निम्न उपायों का प्रयोग करना चाहिये ॥ ४ ॥
ग्रामाधिपतेरायुक्तकस्य हलोत्थवृत्तिपुत्रस्य यूनो ग्रामीणयोषितो वचनमात्र-
साध्याः। ताश्चर्षंण्य इत्याचक्षते विटाः ॥ ५ ॥
शूद्र पुरुषों (छोटे अधिकारियों) के उपाय—ग्रामीण युवतियाँ गाँव के प्रधान,
जमींदार, पटवारी आदि छोटे अधिकारियों के युवा पुत्रों के वचनमात्र से सिद्ध होती हैं। विट
लोग इन्हें 'चर्षणी' (चालू) कहते हैं ॥ ५ ॥
ताभिः सह विष्टिकर्मसु कोष्ठागारप्रवेशे द्रव्याणां निष्क्रमणप्रवेशन-
योर्भवनप्रतिसंस्कारे क्षेत्रकर्मणि कर्पासोर्णातसीसणवल्कलादाने सूत्रप्रतिग्रहे
द्रव्याणां क्रयविक्रयविनिमयेषु तेषु तेषु च कर्मसु सम्प्रयोगः ॥ ६ ॥
सम्प्रयोग के अवसर—जब ये स्त्रियाँ कूटना, पीसना, पकाना आदि कार्यों के लिये
कोष्ठागार (स्टोर) में प्रवेश करें; वस्तुओं को उठाने, रखने या घर की सफाई, पुताई आदि हेतु
घर में प्रवेश करें; कपास, ऊन, अलसी, सन और वल्कल लेने खेत में आयें, सूत लौटाने हेतु
आयें और जिस समय वस्तुओं का क्रय-विक्रय हो रहा हो, अन्य भी ऐसे ही कार्यों के समय
छोटे अधिकारी इनके साथ समागम कर सकते हैं ॥ ६ ॥
तथा व्रजयोषिद्भिः सह गवाध्यक्षस्य ॥ ७ ॥
गौशाला का अधिकारी—इसी प्रकार गौशाला का अधिकारी ग्वालिनों के साथ
समागम कर सकता है ॥ ७ ॥

१४४ वात्स्यायन-कामसूत्र
विधवानाथाप्रव्रजिताभिः सह सूत्राध्यक्षस्य ॥ ८ ॥
सूत का प्रभारी—विधवा, अनाथ और संन्यासिनी स्त्रियों के साथ सूत्राध्यक्ष समागम
कर सकता है ॥ ८ ॥
मर्मज्ञत्वाद् रात्रावटने चाटन्तीभिर्नागरस्य ॥ ९ ॥
नगराध्यक्ष—रात को पहरा देने वाला नगराध्यक्ष (कोतवाल), रहस्य जानने के कारण,
रात को घूमने वाली स्त्रियों के साथ समागम कर सकता है ॥ ९ ॥
क्रयविक्रये पण्याध्यक्षस्य ॥ १० ॥
बाजार का अधिकारी—पण्याध्यक्ष क्रय-विक्रय करने वाली स्त्रियों के साथ समागम
कर सकता है ॥ १० ॥
अष्टमीचन्द्रकौमुदीसुवसन्तकादिषु पत्तनगरखर्वटयोषितामीश्वरभवने
सटान्तःपुरिकाभिः प्रायेण क्रीडा ॥ ११ ॥
मुख्य अधिकारियों के उपाय—बहुला अष्टमी, कौमुदी महोत्सव, सुवसन्तक आदि
बड़े उत्सवों पर राजधानी, नगर और कस्बों की स्त्रियाँ राजभवन में अन्तःपुर में रहने वाली
स्त्रियों के साथ प्रायः क्रीड़ाएँ करती हैं ॥ ११ ॥
तत्र चापानकान्ते नगरस्त्रियो यथापरिचयमन्तःपुरिकाणां पृथक्पृथग्भोगा-
वासकान् प्रविश्य कथाभिरासित्वा पूजिताः प्रपीताश्चोपप्रदोषं निष्क्रामयेयुः ॥ १२ ॥
इन क्रीड़ाओं में मदिरापान के पश्चात् नगर की स्त्रियाँ अपने अपने परिचय के अनुसार
विभिन्न आमोदभवनों (रंगमहलों) में प्रवेश करके गप्पें मारती हैं, और उन राजरानियों से
स्वागत सत्कार एवं खान पान प्राप्त करके सन्ध्या के समय महलों से निकलती हैं ॥ १२ ॥
तत्र प्रणिहिता राजदासी प्रयोज्यायाः पूर्वसंसृष्टा तां तत्र सम्भाषेत ॥ १३ ॥
राजदूती का प्रयास—उन क्रीड़ाओं में राजा द्वारा नियुक्त दासी, जो राजा की
मनोवाञ्छित स्त्री से पहले ही मिल चुकी हो, उससे वार्तालाप करे ॥ १३ ॥
रामणीयकदर्शनेन योजयेत् ॥ १४ ॥
उसे राजभवन की रमणीय वस्तुएँ दिखाने में लगा दे ॥ १४ ॥
प्रागेव स्वभवनस्थां ब्रूयात्। अमुष्यां क्रीडायां तव राजभवनस्थानानि
रामणीयकनि दर्शयिष्यामीति काले च योजयेत्। बहिःप्रवालकुट्टिमं ते
दर्शयिष्यामि ॥ १५ ॥
राजदासी को चाहिये कि उस स्त्री में उत्सुकता उत्पन्न करने के लिये राजभवन में प्रवेश
से पूर्व, उसके घर पर ही यह कह दे कि इस क्रीड़ा में मैं तुम्हें राजभवन की रमणीय वस्तुएँ
दिखाऊँगी। जब वह राजभवन में आ जाये, तब उसे दिखाना प्रारम्भ कर दे। जब वह राजभवन
देख चुके, तब कहे कि अब तुम्हें बाहर प्रवालकुट्टिम (मूँगों का फर्श) दिखाऊँगी! ॥ १५ ॥
मणिभूमिकां वृक्षवाटिकां मृद्वीकामण्डपं समुद्रगृहप्रासादान् गूढभित्ति-
सञ्चारांश्चित्रकर्माणि क्रीडामृगान् यन्त्राणि शकुनान् व्याघ्रसिंहपञ्जरादीनि च यानि
पुरस्ताद्वर्णितानि स्युः ॥ १६ ॥

५. पारदारिक अधिकरण १४५
मणिकुट्टिम फर्श, वृक्षवाटिकाएँ, अंगूर की लताओं से बना मण्डप, समुद्रगृह
(अण्डरग्राउण्ड भवन) जिसमें गुप्त मार्गों से पानी आता-जाता हो, चित्रशाला, क्रीड़ामृग,
यन्त्रचालित कौतुक जो निर्जीव होते हुए भी सजीव से लगते हों, विभिन्न प्रकार के पक्षी, पिंजड़ों
में बद्ध शेर, चीते आदि, जो भी पहले कह रखा हो, सभी दिखाये ॥ १६ ॥
एकान्ते च तद्गतमीश्वरानुरागं श्रावयेत् ॥ १७ ॥
राजा के प्रेम का प्रकटीकरण—तत्पश्चात् एकान्त में, अवसर देखकर, उसमें राजा के
अनुराग को प्रकट करना चाहिये ॥ १७ ॥
सम्प्रयोगे चातुर्यं चाभिवर्णयेत् ॥ १८ ॥
और सम्प्रयोग में राजा के कलाकौशल का भी वर्णन करे अर्थात् राजदासी उस स्त्री को
यह अवश्य बताये कि राजा चौंसठ कामकलाओं में निपुण है जिससे उसका हृदय समागम हेतु
उत्कण्ठित हो जाये ॥ १८ ॥
अमन्त्रभावं च प्रतिपन्नां योजयेत् ॥ १९ ॥
जब वह राजा के साथ समागम कर ले, तो उसे यह समझा दे कि इस बात को किसी से
न कहे ॥ १९ ॥
अप्रतिपद्यमानां स्वयमेवेश्वर आगत्योपचारैः सान्त्वितां रञ्जयित्वा सम्भूय च
सानुरागं विसृजेत् ॥ २० ॥
राजदासी की असफलता पर राजा का कर्त्तव्य—यदि वह स्त्री राजदूती की बात न
माने और समागम हेतु तैयार न हो, तो राजा स्वयं आकर उपचारों द्वारा उसे शान्त करे एवं
अनुरक्त करे। तत्पश्चात् समागम करके उसे प्रेमपूर्वक विदा कर दे ॥ २० ॥
प्रयोज्यायाश्च पत्युरनुग्रहोचितस्य दारान्नित्यमन्तःपुरमौचित्यात्प्रवेशयेत्। तत्र
प्रणिहिता राजदासीति समानं पूर्वेण ॥ २१ ॥
सद्भावप्रदर्शन—यदि उस स्त्री का पति राजकृपा के योग्य हो, तो राजदासी को चाहिये
कि उसके घर की अन्य स्त्रियों को भी यथोचित रीति से राजभवन में ले आये। यह कार्य भी
राजदासी को ही करना चाहिये ॥ २१ ॥
अन्तःपुरिका वाप्रयोज्यया सह स्वचेटिकासंप्रेषणेन प्रीतिं कुर्यात्। प्रसृतप्रीतिं
च सापदेशं दर्शने नियोजयेत्। प्रविष्टां पूजितां पीतवर्तीं प्रणिहिता राजदासीति
समानं पूर्वेण ॥ २२ ॥
रानी द्वारा सहयोग—राजा जिस स्त्री पर आसक्त हो, उसके पास अपनी चेरी भेजकर
रानी प्रेमसम्बन्ध स्थापित कर ले। जब सम्बन्ध बन जाये, तो देखने के बहाने राजभवन में
बुलाये। राजभवन में आने पर रानी उसका स्वागत-सत्कार करे और मदिरा पिलाकरं प्रमत्त कर
दे। तत्पश्चात् राजदासी पूर्वोक्त रीति से कार्य करे ॥ २२ ॥
यस्मिन् वा विज्ञाने प्रयोज्या विख्याता स्यात्तद्दर्शनार्थमन्तःपुरिका सोपचारं
तामाह्वयेत्। प्रविष्टां प्रणिहिता राजदासीति समान पूर्वेण ॥ २३ ॥
कलाकौशल के बहाने बुलाना—राजा जिस स्त्री पर आसक्त हो, यदि वह नृत्यादि

१४६ वात्स्यायन-कामसूत्र
में निपुण हो, तो उस कला का प्रदर्शन करने के लिये रानी उसे राजभवन बुला ले। जब वह
राजभवन में प्रवेश कर जाये तो राजदासी पूर्वोक्त रीति से उसे राजा से मिलवा दे ॥ २३ ॥
उद्भूतानर्थस्य भीतस्य वा भार्यां भिक्षुकी ब्रूयात् असावन्तःपुरिका
राजनि सिद्धा गृहीतवाक्या मम वचनं शृणोति। स्वभावतश्च कृपाशीला तामनेनो-
पायेनाधिगमिष्यामि। अहमेव ते प्रवेशं कारयिष्यामि। सा च ते भर्तुर्महान्तमनर्थं
निवर्तयिष्यतीति प्रतिपन्नां द्विस्त्रिरिति प्रवेशयेत्। अन्तःपुरिका चास्या अभयं दद्यात्।
अभयश्रवणाच्च संप्रहृष्टां प्रणिहिता राजदासीति समानं पूर्वेण ॥ २४ ॥
पीड़ित एवं स्वार्थयों की पत्नियों को बुलाने की रीति—जिसका राजपरिवार से कुछ
अनर्थ होना हो या जो उससे भयभीत हो, उसकी पत्नी से भिक्षुणी जाकर कह दे—‘राजा इस
रानी का कहना मानता है और यह मेरा कहा मानती है। वह तो स्वभाव से ही कृपालु है।

५. पारदारिक अधिकरण १४७
परगृहप्रवेश में दोष—समर्थ लोगों को इस प्रकार कदापि दूसरे के घर में प्रवेश नहीं
करना चाहिये। राजा छिपकर भी कभी किसी के घर में न जाये ॥ २८ ॥
आभीरं हि कोट्टराजं परभवनगतं भ्रातृप्रयुक्तो रजको जघान। काशिराजं
जयसेनमश्वाध्यक्ष इति ॥ २९ ॥
कोट्टराज और जयसेन के उदाहरण—परगृह में प्रविष्ट कोट्टराज आभीर को भाई
द्वारा भेजे गये धोबी ने मार डाला था। इसी प्रकार काशिराज जयसेन को अश्वाध्यक्ष ने मार
डाला था ॥ २९ ॥
प्रकाशकामितानि तु देशप्रवृत्तियोगात् ॥ ३० ॥
सार्वजनिक प्रयोग—राजाओं को तो प्रायः सार्वजनिक प्रयोग ही देखने चाहिये। अब
उन्हें कहते हैं—सार्वजनिक भोग तो देशाचार के अनुरूप ही होता है ॥ ३० ॥
प्रत्ता जनपदकन्या दशमेऽहनि किञ्चिद्दौपायनिकमुपगृह्य प्रविशन्त्यन्तः-
पुरमुपभुक्ता एव विसृज्यन्त इत्यान्ध्राणाम् ॥ ३१ ॥
आन्ध्र की प्रथा— आन्ध्र देश की प्रथा है कि नवविवाहित कन्या को दसवें दिन कुछ
उपहार देकर राजभवन में भेज दिया जाता है और उपभोग करके ही छोड़ते हैं ॥ ३१ ॥
महामात्रेश्वराणामन्तःपुराणि निशि सेवार्थ राजानमुपगच्छन्ति वात्सगुल-
मकानाम् ॥ ३२ ॥
वत्सगुल्म की प्रथा—दक्षिण के वत्सगुल्म देश में, राज्य के महामन्त्री, सेनापति
आदि की स्त्रियाँ रात को सेवा के लिये राजा के पास जाती हैं ॥ ३२ ॥
रूपवतीर्जनपदयोषितः प्रीत्यपदेशेन मासं मासार्धं वातिवासयन्त्यन्तःपुरिका
वैदर्भाणाम् ॥ ३३ ॥
विदर्भ की प्रथा—विदर्भ देश की यह प्रथा है कि वहाँ राजरानियाँ प्रजावर्ग की सुन्दर
स्त्रियों को प्रेम के बहाने महीना महीना, पन्द्रह-पन्द्रह दिन अपने पास रख लेती हैं ॥ ३३ ॥
दर्शनीयाः स्वभार्याः प्रीतिदायमेव महामात्रराजभ्यो ददत्यपरान्तका-
नाम् ॥ ३४ ॥
अपरान्त की प्रथा—अपरान्त देश की यह प्रथा है कि वे अपनी सुन्दर पत्नी को
महामन्त्री और राजा को उपहार रूप में दे देते हैं ॥ ३४ ॥
राजक्रीडार्थं नगरस्त्रियो जनपदस्त्रियश्च सङ्घश एकशश्च राजकुलं प्रविशन्ति
सौराष्ट्रकाणामिति ॥ ३५ ॥
सौराष्ट्र की प्रथा— सौराष्ट्र देश की यह प्रथा है कि राजधानी और बाहर की स्त्रियाँ
समूह के रूप में और एक एक करके राजक्रीड़ा के लिये राजभवन जाती हैं ॥ ३५ ॥
श्लोकावत्र भवतः—
एते चान्ये च बहवः प्रयोगाः पारदारिकाः ।
देशे देशे प्रवर्त्तन्ते राजभिः संप्रवर्तिताः ॥ ३६ ॥

१४८ वात्स्यायन-कामसूत्र
अन्य योग—इस विषय में दो आनुवंश्य श्लोक उद्धृत करते हैं—
राजाओं द्वारा प्रवर्तित परकीयागमन के ये तथा अन्य भी बहुत से प्रयोग विभिन्न
देशों में प्रचलित हैं ॥ ३६ ॥
न त्वेवैतान् प्रयुञ्जीत राजा लोकहिते रतः।
निगृहीतारीषड्वर्गस्तथा विजयते महीम् ॥ ३७ ॥
राजा के लिये प्रशस्त मार्ग—लोककल्याण में लगे राजाओं को इन योगों का प्रयोग
नहीं करना चाहिये। जो राजा काम, क्रोध, लोभ, मान, मद और हर्ष—इन छह शत्रुओं को जीत
लेता है, वही विजयी होकर राज्य करता है ॥ ३७ ॥
'ईश्वराकामित' प्रकरण नामक पञ्चम अध्याय सम्पन्न ॥
षष्ठ अध्याय
अन्तःपुरिकावृत्तप्रकरण
नान्तःपुराणां रक्षणयोगात् पुरुषसंदर्शनं विद्यते पत्युश्चैकत्वादनेकसाधारण-
त्वाच्चातृप्तिः। तस्मात्तानि प्रयोगत एव परस्परं रञ्जयेयुः ॥ १ ॥
अन्तःपुर की लीलाएँ— राजभवन में कड़ी सुरक्षा के कारण पुरुष का दर्शन ही सम्भव
नहीं हो पाता। पति (राजा) तो एक होता है और रानियाँ अनेक, अतएव उनकी सम्भोगेच्छा तृप्त
नहीं हो पाती। इसी कारण वे आपस में ही तृप्त होने का प्रयास करती हैं ॥ १ ॥
धात्रेयिकां सखीं दासीं वा पुरुषवदलंकृत्याकृतिसंयुक्तैः कन्दमूलफलाव-
यवैरपद्रव्यैरात्माभिप्रायं निवर्तयेयुः ॥ २ ॥
प्रयोग-विधि—धाय की पुत्री, सखी या दासी को पुरुषों के समान वस्त्रालङ्कार धारण
करा कर समान आकृति वाले कन्द, मूल और फलों के अवयव वाले कृत्रिम शिश्न बनाकर
कृत्रिम सम्भोग से तृप्ति प्राप्त करें ॥ २ ॥
पुरुषप्रतिमा अव्यक्तलिङ्गाश्चाधिशयीरन् ॥ ३ ॥
जिनके दाढ़ी-मूँछें न हो, ऐसे पुरुषों के साथ शयन करें ॥ ३ ॥
राजानश्च कृपाशीला विनापि भावयोगादायोजितापद्रव्या यावदर्थमेकया
रात्र्या बह्वीभिरपि गच्छन्ति । यस्यां तु प्रीतिर्वासक ऋर्तुर्वा तत्राभिप्रायतः प्रवर्तन्त इति
प्राच्योपचाराः ॥ ४ ॥
प्राच्यों के उपचार—कृपालु राजा बिना भावयोग के कृत्रिम शिश्न लगाकर एक ही रात्रि
में अनेक रानियों के साथ तृप्तिपर्यन्त सम्भोग करते हैं; किन्तु जिस पर प्रेम हो, जिसका वासक
(दिन) हो या ऋतुकाल हो, वहाँ प्रेमपूर्वक सम्भोग करते हैं—यह प्राच्यों का उपचार (परम्परा)
है ॥ ४ ॥

५. पारदारिक अधिकरण १४९
स्त्रीयोगेनेव पुरुषाणामप्यलब्धवृत्तीनां वियोनिषु विजातिषु स्त्रीप्रतिमासु
केवलोपमर्दनाच्चाभिप्रायनिवृत्तिर्व्याख्याता ॥ ५॥
पुरुष भी स्त्री न मिलने पर अपने भाव की निवृत्ति योनिरहित क्रियाओं में, भेड़ बकरी
आदि विजातियों में, स्त्रियों की प्रतिमाओं में और केवल उपमर्दन से करें ॥ ५ ॥
योषावेषांश्च नागरकान् प्रायेणान्तःपुरिकाः परिचारिकाभिः सह प्रवेश-
यन्ति ॥ ६॥
नागरकों का प्रवेश—अन्तःपुर में रहने वाली रानियाँ दासियाँ के साथ प्रायः नागरकों
को स्त्रीवेश में प्रवेश करा लेती हैं ॥ ६ ॥
तेषामुपावर्तने धात्रेयिकाश्चाभ्यन्तरसंसृष्टा आयतिं दर्शयन्त्यः प्रयतेरन् ॥ ७ ॥
उन नागरकों को तैयार करने के लिये रानियों की अन्तरंग धाय की पुत्रियों को चाहिये कि
वे नागरकों को अन्तःपुर-प्रवेश के लाभों को समझायें ॥ ७ ॥
सुखप्रवेशितामपसारभूमिं विशालतां वेश्मनः प्रमादं रक्षिणामनित्यतां
परिजनस्य वर्णयेयुः ॥ ८॥
वे नागरकों को तैयार करते समय अन्तःपुर में सरल प्रवेश और निकलने के सुगम मार्ग,
अन्तःपुर की विशालता, सुरक्षाकर्मियों के प्रमाद तथा राजा एवं राजकुमारों के सदैव न रहने को
बतायें ॥ ८ ॥
न चासद्भूतेनार्थेन प्रवेशयितुं जनमावर्तयेयुर्दोषात् ॥ ९ ॥
प्रबन्ध के अभाव में प्रवेश न करे—यदि आने-जाने का सुगम और निरापद मार्ग न हो
तो अन्तःपुर में किसी को प्रवेश नहीं कराना चाहिये, क्योंकि इससे हानि की आशंका है ॥ ९ ॥
नागरकस्तु सुप्रापमप्यन्तःपुरमपायभूयिष्ठत्वान्न प्रविशेदिति वात्स्या-
यनः ॥ १० ॥
अन्तःपुर में प्रवेश के विषय में महर्षि वात्स्यायन कहते हैं—अन्तःपुर में प्रवेश का मार्ग
कितना भी सुगम क्यों न हो, किन्तु नागरक को उसमें कदापि प्रवेश नहीं करना चाहिये; क्योंकि
इसमें महान् हानि की सम्भावना है ॥ १० ॥
सापसारं तु प्रमदवनावगाढं विभक्तदीर्घकक्ष्यमल्पप्रमत्तरक्षकं प्रोषितराजकं
कारणानि समीक्ष्य बहुश आहूयमानोऽर्थबुद्ध्या कक्ष्याप्रवेशं च दृष्ट्वा ताभिरेव
विहितोपायः प्रविशेत् ॥ ११ ॥
विशेष बातें—नागरक अन्तःपुर में प्रवेश करने का विचार तभी बनाये जब निकलने का
मार्ग हो, अन्तःपुर से लगा हुआ सघन प्रमदवन हो, रानियों के अलग अलग और बड़े-बड़े कक्ष
हों, सुरक्षाकर्मी कम और असावधान हों, राजा बाहर गये हुए हों, सम्भोग हेतु रानी कई बार
बुला चुकी हो, अर्थ की प्राप्ति सुनिश्चित हो और बताने वाली से सारे उपाय जान लिये हों ॥ ११ ॥
शक्तिविषये च प्रतिदिनं निष्क्रामेत् ॥ १२ ॥
यदि अन्तःपुर में आवागमन की सुगम सुविधा हो तो वहाँ से प्रतिदिन ही निकल आना
चाहिये अर्थात् वहाँ ठहरना नहीं चाहिये ॥ १२ ॥

१५० वात्स्यायन-कामसूत्र
बहिश्च रक्षिभिरन्यदेव कारणमपदिश्य संसृज्येत ॥ १३ ॥
स्वेच्छा से प्रवेश की विधि—किसी काम के बहाने बाहर के सुरक्षाकर्मियों से मेलजोल
कर ले ॥ १३ ॥
अन्तश्चारिण्यां च परिचारिकायां विदितार्थायां सक्तमात्मानं रूपयेत्। तद-
लाभाच्च शोकमन्तःप्रवेशिनीभिश्च दूतीकल्पं सकलमाचरेत् ॥ १४ ॥
परिचारिका से कृत्रिम प्रेम—अन्तःपुर में आने जाने वाली किसी परिचारिका को
नागरक जब यह जान ले कि यह मुझ पर आसक्त है तो बाह्य रूप से उसे अपनी अत्यधिक
आसक्ति दिखाये। यदि वह किसी दिन न दिखे तो अपनी अत्यधिक व्याकुलता प्रकट करे।
उससे (पूर्वोक्त) दूतीकल्प में बताये गये सारे काम ले ॥ १४ ॥
राजप्रणिधींश्च बुध्येत ॥ १५ ॥
गुप्तचरों से सावधान—राजा के गुप्तचरों को अवश्य पहचान ले ॥ १५ ॥
दूत्यास्त्वसञ्चारे यत्र गृहीताकारायाः प्रयोज्याया दर्शनयोगस्तत्राव-
स्थानम् ॥ १६ ॥
गतिविधियाँ—यदि दूती न आ सके और अनुकूल चेष्टाएँ कर दी गयी हों तो ऐसे स्थान
पर खड़ा हो जाये, जहाँ से नायिका का दर्शन दूर से हो सके ॥ १६ ॥
तस्मिन्रपि तु रक्षिषु परिचारिकाव्यपदेशः ॥ १७ ॥
खड़े होकर भी परिचित सुरक्षाकर्मियों को उसी परिचारिका के दर्शन का बहाना करना
चाहिये ॥ १७ ॥
चक्षुरनुबध्नन्त्यामिङ्गिताकारनिवेदनम् ॥ १८ ॥
यदि नायिका बार बार उस पर दृष्टि डाले तो नायक को भी संकेत और चेष्टाएँ दिखानी
चाहिये ॥ १८ ॥
यत्र सम्पातोऽस्यास्तत्र चित्रकर्मणस्तद्युक्तस्य द्व्यर्थानां गीतवस्तुकानां
क्रीडनकानां कृतचिह्नानामापीनकस्याङ्गुलीयकस्य च निधानम् ॥ १९ ॥
चित्र का प्रयोग—जहाँ नायिका की दृष्टि जाती हो, वहाँ दीवार पर या चित्रफलक पर
उसके साथ प्रेमपूर्वक अपना चित्र बनावे, श्लिष्ट भाषा में प्रेमव्यञ्जक शब्द या छन्द लिखे,
नखक्षतों एवं दन्तक्षतों से चिह्नित गेंद, गुड़िया आदि रख दे और अपने नाम वाली अँगूठी रख
दे ॥ १९ ॥
प्रत्युत्तरं तया दत्तं प्रपश्येत्। ततः प्रवेशने यतेत ॥ २० ॥
उसके द्वारा दिये गये उत्तर को देखे और तत्पश्चात् ही प्रवेश करे ॥ २० ॥
यत्र चास्या नियतं गमनमिति विद्यात्तत्र प्रच्छन्नस्य प्रागेवावस्थानम् ॥ २१ ॥
जिस स्थान पर नायिका का निश्चित गमन होता हो, वहाँ पहले ही छिपकर बैठ
जाये ॥ २१ ॥
आस्तरणप्रावरणवेष्टितस्य वा प्रवेशनिर्हारौ ॥ २३ ॥
अथवा उसे ओढ़ने बिछाने के कपड़ों में लपेटकर लाया और भेजा जा सकता है ॥ २३ ॥