वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५. पारदारिक अधिकरण १४३
पञ्चम अध्याय
ईश्वरकामितप्रकरण
न राज्ञां महामात्राणां वा परभवनप्रदेशो विद्यते। महाजनेन हि चरितमेषां
दृश्यतेऽनुविधीयते च ॥ १ ॥
परगृह प्रवेश न करने के कारण—राजा और महामन्त्रियों का प्रायः दूसरे के घर जाना
उचित नहीं होता, क्योंकि लोक में महाजनों का जो चरित देखा जाता है, उसी का सब अनुकरण
करते हैं ॥ १ ॥
सवितारमुद्यन्तं त्रयो लोकाः पश्यन्ति अनूद्यन्ते च। गच्छन्तमपि
पश्यन्त्यनुप्रतिष्ठन्ते च ॥ २ ॥
सूर्य के दृष्टान्त से पुष्टि—सूर्य को उगते हुए देखकर तीनों लोक आलस्य छोड़कर उठ
जाते हैं और उसे अस्त होते देखकर अपनी दैनिक क्रियाओं से निवृत्त हो जाते हैं ॥ २ ॥
तस्मादशक्यत्वाद् गर्हणीयत्वाच्चेति न ते वृथा किञ्चिदाचरेयुः ॥ ३ ॥
दृष्टान्त का फलितार्थ—क्योंकि समर्थ पुरुषों को परकीयागमन, परगृह में अप्रवेश के
कारण अशक्य और लोक में आलोचना का विषय होने से निन्दनीय है, अतः उन्हें इसमें प्रवृत्त
नहीं होना चाहिये ॥ ३ ॥
अवश्यं त्वाचरितव्ये योगान् प्रयुञ्जीरन् ॥ ४ ॥
अपरिहार्यता पर उपाय—यदि किसी कारणवश या रागवश परकीयागमन अपरिहार्य हो
जाये तो निम्न उपायों का प्रयोग करना चाहिये ॥ ४ ॥
ग्रामाधिपतेरायुक्तकस्य हलोत्थवृत्तिपुत्रस्य यूनो ग्रामीणयोषितो वचनमात्र-
साध्याः। ताश्चर्षंण्य इत्याचक्षते विटाः ॥ ५ ॥
शूद्र पुरुषों (छोटे अधिकारियों) के उपाय—ग्रामीण युवतियाँ गाँव के प्रधान,
जमींदार, पटवारी आदि छोटे अधिकारियों के युवा पुत्रों के वचनमात्र से सिद्ध होती हैं। विट
लोग इन्हें 'चर्षणी' (चालू) कहते हैं ॥ ५ ॥
ताभिः सह विष्टिकर्मसु कोष्ठागारप्रवेशे द्रव्याणां निष्क्रमणप्रवेशन-
योर्भवनप्रतिसंस्कारे क्षेत्रकर्मणि कर्पासोर्णातसीसणवल्कलादाने सूत्रप्रतिग्रहे
द्रव्याणां क्रयविक्रयविनिमयेषु तेषु तेषु च कर्मसु सम्प्रयोगः ॥ ६ ॥
सम्प्रयोग के अवसर—जब ये स्त्रियाँ कूटना, पीसना, पकाना आदि कार्यों के लिये
कोष्ठागार (स्टोर) में प्रवेश करें; वस्तुओं को उठाने, रखने या घर की सफाई, पुताई आदि हेतु
घर में प्रवेश करें; कपास, ऊन, अलसी, सन और वल्कल लेने खेत में आयें, सूत लौटाने हेतु
आयें और जिस समय वस्तुओं का क्रय-विक्रय हो रहा हो, अन्य भी ऐसे ही कार्यों के समय
छोटे अधिकारी इनके साथ समागम कर सकते हैं ॥ ६ ॥
तथा व्रजयोषिद्भिः सह गवाध्यक्षस्य ॥ ७ ॥
गौशाला का अधिकारी—इसी प्रकार गौशाला का अधिकारी ग्वालिनों के साथ
समागम कर सकता है ॥ ७ ॥