वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 161, कुल 248 में से
संदर्भ में पढ़ें५. पारदारिक अधिकरण १३५
चतुर्थ अध्याय
दूतीकर्मप्रकरण
दर्शिताङ्गिताकारां तु प्रविरलदर्शनामपूर्वां च दूत्योपसर्पयेत् ॥ १ ॥
दूतियों के कार्य—जिसने सङ्केत और चेष्टाओं से अनुकूलता दिखा दी हो, किन्तु कभी
कभी ही दीखे या अपरिचित स्त्री हो, उसे दूती के माध्यम से सिद्ध करना चाहिये ॥ १ ॥
सैनां शीलतोऽनुप्रविश्याख्यानकपटैः सुभगङ्करणयोगैर्लोकवृत्तान्तैः
कविकथाभिः पारदारिककथाभिश्च तस्याश्च रूपविज्ञानदाक्षिण्यशीलानु-
प्रशंसाभिश्च तां रञ्जयेत् ॥ २ ॥
दूती के सामान्य कार्य—दूती जिस स्त्री पर डोरे डालना चाहती हो, उसके घर अपने
उत्तम शीलस्वभाव का परिचय देकर प्रवेश करे। तत्पश्चात् कपटपूर्ण आख्यानों से, सौन्दर्यवर्धक
योगों से, लोकवृत्तान्तों से, कविकल्पित कथाओं से, परकीया और उपपति-विषयक शृङ्गार
सम्बद्ध कहानियों से और उस स्त्री के सौन्दर्य, ज्ञान, शील और चातुर्य की प्रशंसा कर, उसे
अनुरागिनी बना ले ॥ २ ॥
कथमेवंविधायास्तवायमित्थम्भूतः पतिरिति चानुशयं ग्राहयेत् ॥ ३ ॥
पति से विद्वेष कराना—'तुम जैसी रूपवती, कलानिपुण एवं व्यवहारकुशल को ऐसा
ग्राम्य एवं अरसिक पति कैसे मिला ?' यह कहकर उसके हृदय में पति के प्रति घृणा और द्वेष
उत्पन्न कर दे ॥ ३ ॥
न तव सुभगे दास्यमपि कर्तुं युक्त इति ब्रूयात् ॥ ४ ॥
'हे सुन्दरि ! यह तो तुम्हारा दास होने योग्य भी नहीं है'—ऐसा कहे ॥ ४ ॥
मन्दवेगतामीर्ष्यालुतां शठतामकृतज्ञतां चासम्भोगशीलतां कदर्यतां
चपलतामन्यानि च यानि तस्मिन् गुह्यान्यस्या अभ्याशे सति सद्भावेऽतिशयेन
भाषेत ॥ ५ ॥
'तुम्हारा पति मन्दवेग है, यह तुम्हारी अनुपम रूपमाधुरी से ईर्ष्या करता है, यह तुमसे
कपटपूर्ण आचरण रखता है, यह कृतघ्न है, यह भोगविलास में रुचि नहीं रखता, अपितु उससे
उदासीन रहता है, यह कदाचारी और चंचल है'—इन दोषों के अतिरिक्त भी जो अन्य गुप्त दोष
उसमें हों, उन सबको पत्नी से कहे। यदि वह विदग्ध और सच्चरित्र हो तो उसमें और भी
अधिक दोष दिखाये ॥ ५ ॥
येन च दोषेणोद्विग्नां लक्षयेत्तेनैवानुप्रविशेत् ॥ ६ ॥
जिस दोष को सुनकर नायिका को उद्विग्न देखे, उसी दोष से उसे पति से विमुख कर
दे ॥ ६ ॥
यदासौ मृगी तदा नैव शशतादोषः ॥ ७ ॥
दोषकथन में ध्यातव्य बातें—यदि नायिका मृगी जाति की हो तो पुरुष का शश जाति
का होना दोष नहीं है ॥ ७ ॥