वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५. पारदारिक अधिकरण १४१
मेरा विवाह आप से ही करने का सङ्कल्प किया था। मुझमें और आप की स्त्री में, दोनों में कौन
सुन्दर है ?—जो इस प्रकार से एकान्त में जाकर सब प्रकार से अनुयोग करे, उसे स्वयंदूती कहते
हैं ॥ ५४ ॥
तस्या विविक्ते दर्शनं प्रतिग्रहश्च ॥ ५५ ॥
स्वयंदूती का मिलनस्थल—स्वयंदूती का दर्शन और सन्देशग्रहण एकान्त में ही होना
चाहिये ॥ ५५ ॥
प्रतिग्रहच्छलेनान्यामभिसन्धायस्याः संदेशश्रावणद्वारेण नायकं साधयेत् तां
चोपहन्यात्सापि स्वयंदूती ॥ ५६ ॥
स्वयंदूती ( द्वितीय )—नायक का सन्देश लाने के बहाने अभिसन्धि करके नायिका का
सन्देश सुनाने के माध्यम से नायक को स्वयं सिद्ध कर ले, नायिका को नायक से न मिलने दे,
वह भी स्वयंदूती ही है ॥ ५६ ॥
एतया नायकोऽप्यन्यदूतश्च व्याख्यातः ॥ ५७ ॥
स्वयंदूत—स्वयंदूती के माध्यम से स्वयंदूत भी कह दिया गया है अर्थात् जो पुरुष किसी
नायक का सन्देश ले जाने के बहाने नायिका के पास जाता है और उसे स्वयं ही अनुरक्त कर
लेता है, नायक से नहीं मिलने देता, वह स्वयंदूत कहलाता है ॥ ५७ ॥
नायकभार्यां मुग्धां विश्वास्यायन्त्रणयानुप्रविश्य नायकस्य चेष्टितानि पृच्छेत् ।
योगाञ्शिक्षयेत् । साकारं मण्डयेत् । कोपमेनां ग्राहयेत् । एवं च प्रतिपद्यस्वेति
भावयेत् । स्वयं चास्यां नखदशनपदानि विवर्तयेत् । तेन द्वारेण नायकमाकारयेत् सा
मूढदूती ॥ ५८ ॥
मूढदूती—नायक की मुग्धा भार्या को विश्वास दिलाकर, बिना किसी कष्ट के उसके
हृदय में छिपी हुई नायक-सम्बन्धी बातें पूछे, उसे सम्भोग की क्रियाएँ सिखाये, अभिप्रायसूचक
शृङ्गार कराये, पति से उसका द्वेष करा दे, उसके अङ्गों पर स्वयं ही नखक्षत एवं दन्तक्षय अङ्कित
कर दे—इस प्रकार कठिनतापूर्वक अपना आशय प्रकटित करे, उसे मूढदूती कहते हैं ॥ ५८ ॥
तस्यास्तयैव प्रत्युत्तराणि योजयेत् ॥ ५९ ॥
इसका प्रत्युत्तर—यदि कोई स्त्री ऐसी मूढदूती से कार्य करा रही हो, तो नायक को
बदला लेने के लिये उससे ही सम्भोग करना चाहिये ॥ ५९ ॥
स्वभार्यां वा मूढां प्रयोज्य तया सह विश्वासेन योजयित्वा तयैवाकारयेत् ।
आत्मनश्च वैचक्षण्यं प्रकाशयेत् । सा भार्या दूती तस्यास्तयैवाकारग्रहणम् ॥ ६० ॥
भार्यादूती—अपनी अबोध स्त्री को उस नायिका के साथ मिलाकर, उसी से अपने
मनोभावों को प्रकटित कराये और अपनी कुशलता का परिचय दे। क्योंकि यहाँ भार्या द्वारा ही
नायिका की चेष्टाओं का ग्रहण होता है, इसलिए इसे भार्यादूती कहते हैं ॥ ६० ॥
बालां वा परिचारिकामदोषज्ञामदुष्टेनोपायेन प्रहिणुयात् । तत्र स्रजि कर्णपत्रे
वा गूढलेखनिधानं नखदशनपदं वा सा मूकदूती। तस्यास्तयैव
प्रत्युत्तरप्रार्थनम् ॥ ६१ ॥