वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८ वात्स्यायन-कामसूत्र
अन्य योग—इस विषय में दो आनुवंश्य श्लोक उद्धृत करते हैं—
राजाओं द्वारा प्रवर्तित परकीयागमन के ये तथा अन्य भी बहुत से प्रयोग विभिन्न
देशों में प्रचलित हैं ॥ ३६ ॥
न त्वेवैतान् प्रयुञ्जीत राजा लोकहिते रतः।
निगृहीतारीषड्वर्गस्तथा विजयते महीम् ॥ ३७ ॥
राजा के लिये प्रशस्त मार्ग—लोककल्याण में लगे राजाओं को इन योगों का प्रयोग
नहीं करना चाहिये। जो राजा काम, क्रोध, लोभ, मान, मद और हर्ष—इन छह शत्रुओं को जीत
लेता है, वही विजयी होकर राज्य करता है ॥ ३७ ॥
'ईश्वराकामित' प्रकरण नामक पञ्चम अध्याय सम्पन्न ॥
षष्ठ अध्याय
अन्तःपुरिकावृत्तप्रकरण
नान्तःपुराणां रक्षणयोगात् पुरुषसंदर्शनं विद्यते पत्युश्चैकत्वादनेकसाधारण-
त्वाच्चातृप्तिः। तस्मात्तानि प्रयोगत एव परस्परं रञ्जयेयुः ॥ १ ॥
अन्तःपुर की लीलाएँ— राजभवन में कड़ी सुरक्षा के कारण पुरुष का दर्शन ही सम्भव
नहीं हो पाता। पति (राजा) तो एक होता है और रानियाँ अनेक, अतएव उनकी सम्भोगेच्छा तृप्त
नहीं हो पाती। इसी कारण वे आपस में ही तृप्त होने का प्रयास करती हैं ॥ १ ॥
धात्रेयिकां सखीं दासीं वा पुरुषवदलंकृत्याकृतिसंयुक्तैः कन्दमूलफलाव-
यवैरपद्रव्यैरात्माभिप्रायं निवर्तयेयुः ॥ २ ॥
प्रयोग-विधि—धाय की पुत्री, सखी या दासी को पुरुषों के समान वस्त्रालङ्कार धारण
करा कर समान आकृति वाले कन्द, मूल और फलों के अवयव वाले कृत्रिम शिश्न बनाकर
कृत्रिम सम्भोग से तृप्ति प्राप्त करें ॥ २ ॥
पुरुषप्रतिमा अव्यक्तलिङ्गाश्चाधिशयीरन् ॥ ३ ॥
जिनके दाढ़ी-मूँछें न हो, ऐसे पुरुषों के साथ शयन करें ॥ ३ ॥
राजानश्च कृपाशीला विनापि भावयोगादायोजितापद्रव्या यावदर्थमेकया
रात्र्या बह्वीभिरपि गच्छन्ति । यस्यां तु प्रीतिर्वासक ऋर्तुर्वा तत्राभिप्रायतः प्रवर्तन्त इति
प्राच्योपचाराः ॥ ४ ॥
प्राच्यों के उपचार—कृपालु राजा बिना भावयोग के कृत्रिम शिश्न लगाकर एक ही रात्रि
में अनेक रानियों के साथ तृप्तिपर्यन्त सम्भोग करते हैं; किन्तु जिस पर प्रेम हो, जिसका वासक
(दिन) हो या ऋतुकाल हो, वहाँ प्रेमपूर्वक सम्भोग करते हैं—यह प्राच्यों का उपचार (परम्परा)
है ॥ ४ ॥