वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५. पारदारिक अधिकरण १३३
चिरमदृष्टापि प्रकृतिस्थैव संसृज्यते कृतलक्षणां तां दर्शिताकारामुपक्र-
मेत् ॥ १५ ॥
आलिङ्गन को न सहकर शय्या से उठी हुई नायिका यदि बहुत दिनों बाद शान्तभाव से
मिलती है, तो उसके सङ्केत और हाव-भाव दिखाने पर पुनः अभियोग प्रारम्भ कर देना
चाहिये ॥ १५ ॥
अनभियुक्ताप्याकारयति। विविक्ते चात्मानं दर्शयति। सवेपथुगद्गदं वदति।
स्विन्नकरचरणाङ्गुलिः स्विन्नमुखी च भवति। शिरःपीडने संवाहने चोर्वोरात्मानं
नायके नियोजयति ॥ १६ ॥
अनुरागिणी—जो बिना अभियोग किये भी हाव-भाव दिखाती हो, एकान्त में अपने
गुह्याङ्गों को दिखाती हो, कम्पनयुक्त वाणी से गद्गद वचन बोलती हो, जिसके हाथ-पैर और
मुख पर पसीना आता हो, जो नायक के सिर और पैर दबाने लगती हो—उसे नायक की
अनुरागिणी समझना चाहिये ॥ १६ ॥
आतुरासंवाहिका चैकेन हस्तेन संवाहयन्ती द्वितीयेन बाहुना स्पर्शमावेदयति
श्लेषयति च। विस्मितभावा ॥ १७ ॥
कामातुर होकर वह एक हाथ से तो अपना पैर दबाती जाती है और विस्मृत सी हो कर
दूसरे हाथ से स्पर्श करने लगती है ॥ १७ ॥
निद्रान्धा वा परिस्पृश्योरुभ्यां बाहुभ्यामपि तिष्ठति। अलिकैकदेशमूर्वोरुपरि
पातयति। ऊरुमूलसंवाहने नियुक्ता न प्रतिलोमयति। तत्रैव हस्तमेकमविचलं
न्यस्यति। अङ्गसंदंशेन च पीडितं चिरादपनयति ॥ १८ ॥
अथवा नींद का बहाना करके दोनों हाथों से नायक का आलिङ्गन करके घुटनों के बल
खड़ी हो जाती है, अपने मस्तक को उसके घुटनों पर टिका देती है, नायक के पैर दबाती हुई
हाथों को उसकी जाँघों की ओर बढ़ाती है, नीचे की ओर नहीं लाती, एक हाथ को तो जाँघों के
मध्य में ही रखे रहती है और जब नायक उसके हाथ को जाँघों से बलपूर्वक दबाता है, तभी
नायक के अप्रसन्न होने के भय से कुछ देर बाद हाथ हटाती है ॥ १८ ॥
प्रतिगृह्यैवं नायकाभियोगान् पुनर्द्वितीयेऽहनि संवाहनायोपगच्छति ॥ १९ ॥
उस दिन इस प्रकार नायक के अभियोगों को ग्रहण कर अगले दिन वह पुनः नायक पैर
दबाने आ जाती है ॥ १९ ॥
नात्यर्थं संसृज्यते। न च परिहरति ॥ २० ॥
न अत्यधिक संसर्ग ही करती है और न नायक को छोड़ती ही है ॥ २० ॥
विविक्ते भावं दर्शयति निष्कारणं चागूढमन्यत्र प्रच्छन्नप्रदेशात् ॥ २१ ॥
एकान्त में, अकारण ही, हाव भाव दिखाने लगती है और जनसमुदाय के मध्य प्रच्छन्न
रूप से भाव दिखाती है ॥ २१ ॥
सन्निकृष्टपरिचारकोपभोग्या सा चेदाकारितापि तथैव स्यात् सा मर्मज्ञया दूत्या
साध्या ॥ २२ ॥