वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 157, कुल 248 में से
संदर्भ में पढ़ें५. पारदारिक अधिकरण १३१
अनुपयुक्त स्त्रियाँ—बुद्धिमान् पुरुष को चाहिये कि शङ्कित हृदय वाली, सशक्त पुरुषों
द्वारा रक्षित, पति से भयभीत एवं सास ससुर वाली स्त्री की भूल कर भी कामना न करे ॥ २८ ॥
परिचयकारणाभियोग प्रकरण नामक द्वितीय अध्याय सम्पन्न ॥
●
तृतीय अध्याय
भावपरीक्षाप्रकरण
अभियुञ्जानो योषितः प्रवृत्तिं परीक्षेत। तया भावः परीक्षितो भवति।
अभियोगाँश्च प्रतिगृह्णीयात् ॥ १ ॥
सूक्ष्म निरीक्षण आवश्यक—अभियोग करता हुआ नायक स्त्री की प्रवृत्ति की परीक्षा
करे, उसी से भाव की परीक्षा हो जाती है, और वह जो उपाय करे, उसका उत्तर दे ॥ १ ॥
मन्त्रमवृण्वानां दूत्यैनां साधयेत् ॥ २ ॥
प्रगल्भा दूती द्वारा ही साध्य—हृदय का भाव प्रकटित न करने वाली, धीर परकीया को,
रहस्य न कहने वाली, चतुर दूती से ही सिद्ध करना चाहिये ॥ २ ॥
अप्रतिगृह्णाभियोगं पुनरपि संसृज्यमानां द्विधाभूतमानसां विद्यात्। तां क्रमेण
साधयेत् ॥ ३ ॥
द्विधाग्रस्त—जो स्त्री नायक के अभियोग को अस्वीकार करके भी उससे पुनः मिलती
है, उसे दुविधा में फँसी हुई समझना चाहिये। उसे क्रमशः सिद्ध करना चाहिये ॥ ३ ॥
अप्रतिगृह्णाभियोगं सविशेषमलंकृता च पुनर्दृश्येत तथैव तमभिगच्छेच्च
विविक्ते बलाद् ग्रहणीयां विद्यात् ॥ ४ ॥
बलात् ग्राह्य—जो स्त्री नायक के अभियोगों को स्वीकार किये विना भी पहले की
अपेक्षा वस्त्राभूषणों से अधिक सज सँवरकर आये, तो नायक को उससे पहले के समान ही
मिलने का प्रयास करना चाहिये। यदि वह फिर भी हाथ न रखने दे और सज सँवर कर भी आती
रहे, तो उसे एकान्त में बलपूर्वक सम्भोग कराने वाली समझना चाहिये ॥ ४ ॥
बहूनपि विषहतेऽभियोगान्न च चिरेणापि प्रयच्छत्यात्मानं सा शुष्क-
प्रतिग्राहिणी परिचयविघटनसाध्या ॥ ५ ॥
अतिपरिचय से साध्य—जो स्त्री अनेक अभियोगों को सहन कर ले और चिरकाल तक
भी सम्भोग न होने दे, उसे नीरस अभियोग वाली जानना चाहिये। ऐसी स्त्री अतिपरिचय से ही
सिद्ध की जा सकती है ॥ ५ ॥
मनुष्यजातेश्चित्तानित्यत्वात् ॥ ६ ॥
मानव का चित्त अत्यन्त चञ्चल होता है, अतः वह परिचय टूटने पर पुनः परिचय कर
लेता है ॥ ६ ॥