वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ वात्स्यायन-कामसूत्र
एतेनैव वडवाहस्तिनीविषयश्चोक्तः ॥ ८ ॥
इसी से वडवा और हस्तिनी का विषय भी कह दिया गया है ॥ ८ ॥
नायिकाया एव तु विश्वास्यतामुपलभ्य दूतीत्वेनोपसर्पयेत् प्रथमसाहसायां
सूक्ष्मभावायां चेति गोणिकापुत्रः ॥ ९ ॥
जो नायिका प्रथम बार परपुरुष से मिलने का साहस करती हो या जो अपने हृदयस्थ
भावों को प्रस्फुटित न कर रही हो, ऐसी नायिका की विश्वस्त बनकर दूती उसे दौत्यकर्म से
अपने घर बुलाये—यह आचार्य गोणिकापुत्र का मत है ॥ ९ ॥
सा नायकस्य चरितमनुलोमतां कामितानि च कथयेत् ॥ १० ॥
नायक के प्रति अनुकूलन—वह दूती नायक की वैभवपूर्ण जीवनगाथा, उसकी सरलता
और रमण के आदि, मध्य एवं अन्त के भावों का वर्णन करे ॥ १० ॥
प्रसृतसद्भावायां च युक्त्या कार्यशरीरमित्थं वदेत् ॥ ११ ॥
यदि नायिका को रमणोत्सुक देखे तो युक्तिपूर्वक उससे इस प्रकार कहे ॥ ११ ॥
'शृणु विचित्रमिदं सुभगे, त्वां किल दृष्ट्वामुत्रासावित्थं गोत्रपुत्रो
नायकश्चित्तोन्मादमनुभवति। प्रकृत्या सुकुमारः कदाचिदन्यत्रापरिक्लिष्ट-
पूर्वस्तपस्वी। ततोऽधुना शक्यमनेन मरणमप्यनुभवितुम्'—इति वर्णयेत् ॥ १२ ॥
कथनपद्धति—'हे परमसुन्दरि! मैं तुम्हें एक विचित्र बात सुनाती हूँ, तुम उसे ध्यान से
सुनो। उस प्रसिद्ध परिवार का वह युवक उस स्थान पर तुम्हें देखकर कामोन्मत्त हो गया है। वह
स्वभाव से अत्यन्त सुकुमार है। उसने अभी तक जीवन में कभी कष्ट नहीं उठाया है। वह तो
तपस्वी है। यदि उसने तुम्हें नहीं पाया तो वह तड़प तड़प कर मर जायेगा'—इस प्रकार नायिका
से कहे ॥ १२ ॥
तत्र सिद्धा द्वितीयेऽहनि वाचि वक्त्रे दृष्ट्यां च प्रसादमुपलक्ष्य पुनरपि कथां
प्रवर्त्तयेत् ॥ १३ ॥
दूसरे दिन का कार्य—इन बातों में यदि दूती को सफलता मिल जाये अर्थात् नायिका
बातें रुचिपूर्वक सुनती रहे, तो दूती उसे दूसरे दिन फिर बुलाये और यदि उसके मुख और नेत्रों
पर प्रसन्नता झलकती हो तो उससे साधारण वार्तालाप प्रारम्भ कर दे ॥ १३ ॥
शृण्वत्यां चाहल्याविमारकशाकुन्तलादीन्यन्यान्यपि लौकिकानि च कथयेत्
तद्युक्तानि ॥ १४ ॥
जब वह बातें सुनने में लीन हो जाये तो उसे अहल्या, अविमारक और शकुन्तला की
कथाएँ तथा परकीय और उपपति (परपुरुष) से सम्बन्धित अन्यान्य लौकिक कथाएँ
सुनाये ॥ १४ ॥
वृषतां चतुःषष्टिविज्ञतां सौभाग्यं च नायकस्य। श्लाघनीयतां ( या ) चास्य
प्रच्छन्नं सम्प्रयोगं भूतमभूतपूर्वं वा वर्णयेत् ॥ १५ ॥
नायक की प्रबल सम्भोगशक्ति और चौंसठ कलाओं में निपुणता तथा नायिका की