वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५. पारदारिक अधिकरण १४५
मणिकुट्टिम फर्श, वृक्षवाटिकाएँ, अंगूर की लताओं से बना मण्डप, समुद्रगृह
(अण्डरग्राउण्ड भवन) जिसमें गुप्त मार्गों से पानी आता-जाता हो, चित्रशाला, क्रीड़ामृग,
यन्त्रचालित कौतुक जो निर्जीव होते हुए भी सजीव से लगते हों, विभिन्न प्रकार के पक्षी, पिंजड़ों
में बद्ध शेर, चीते आदि, जो भी पहले कह रखा हो, सभी दिखाये ॥ १६ ॥
एकान्ते च तद्गतमीश्वरानुरागं श्रावयेत् ॥ १७ ॥
राजा के प्रेम का प्रकटीकरण—तत्पश्चात् एकान्त में, अवसर देखकर, उसमें राजा के
अनुराग को प्रकट करना चाहिये ॥ १७ ॥
सम्प्रयोगे चातुर्यं चाभिवर्णयेत् ॥ १८ ॥
और सम्प्रयोग में राजा के कलाकौशल का भी वर्णन करे अर्थात् राजदासी उस स्त्री को
यह अवश्य बताये कि राजा चौंसठ कामकलाओं में निपुण है जिससे उसका हृदय समागम हेतु
उत्कण्ठित हो जाये ॥ १८ ॥
अमन्त्रभावं च प्रतिपन्नां योजयेत् ॥ १९ ॥
जब वह राजा के साथ समागम कर ले, तो उसे यह समझा दे कि इस बात को किसी से
न कहे ॥ १९ ॥
अप्रतिपद्यमानां स्वयमेवेश्वर आगत्योपचारैः सान्त्वितां रञ्जयित्वा सम्भूय च
सानुरागं विसृजेत् ॥ २० ॥
राजदासी की असफलता पर राजा का कर्त्तव्य—यदि वह स्त्री राजदूती की बात न
माने और समागम हेतु तैयार न हो, तो राजा स्वयं आकर उपचारों द्वारा उसे शान्त करे एवं
अनुरक्त करे। तत्पश्चात् समागम करके उसे प्रेमपूर्वक विदा कर दे ॥ २० ॥
प्रयोज्यायाश्च पत्युरनुग्रहोचितस्य दारान्नित्यमन्तःपुरमौचित्यात्प्रवेशयेत्। तत्र
प्रणिहिता राजदासीति समानं पूर्वेण ॥ २१ ॥
सद्भावप्रदर्शन—यदि उस स्त्री का पति राजकृपा के योग्य हो, तो राजदासी को चाहिये
कि उसके घर की अन्य स्त्रियों को भी यथोचित रीति से राजभवन में ले आये। यह कार्य भी
राजदासी को ही करना चाहिये ॥ २१ ॥
अन्तःपुरिका वाप्रयोज्यया सह स्वचेटिकासंप्रेषणेन प्रीतिं कुर्यात्। प्रसृतप्रीतिं
च सापदेशं दर्शने नियोजयेत्। प्रविष्टां पूजितां पीतवर्तीं प्रणिहिता राजदासीति
समानं पूर्वेण ॥ २२ ॥
रानी द्वारा सहयोग—राजा जिस स्त्री पर आसक्त हो, उसके पास अपनी चेरी भेजकर
रानी प्रेमसम्बन्ध स्थापित कर ले। जब सम्बन्ध बन जाये, तो देखने के बहाने राजभवन में
बुलाये। राजभवन में आने पर रानी उसका स्वागत-सत्कार करे और मदिरा पिलाकरं प्रमत्त कर
दे। तत्पश्चात् राजदासी पूर्वोक्त रीति से कार्य करे ॥ २२ ॥
यस्मिन् वा विज्ञाने प्रयोज्या विख्याता स्यात्तद्दर्शनार्थमन्तःपुरिका सोपचारं
तामाह्वयेत्। प्रविष्टां प्रणिहिता राजदासीति समान पूर्वेण ॥ २३ ॥
कलाकौशल के बहाने बुलाना—राजा जिस स्त्री पर आसक्त हो, यदि वह नृत्यादि