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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 248 में से

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पृष्ठ 163

५. पारदारिक अधिकरण १३७
सौभाग्यशालिता एवं उत्तमता का वर्णन कर, उसके पूर्वकाल में हुए या अनहुए (कल्पित)
सम्भोगों का वर्णन करे ॥ १५ ॥
आकारं चास्या लक्षयेत् ॥ १६ ॥
भावभङ्गिमाओं की परीक्षा—नायक के सम्भोगों की बातें सुनाते समय उसकी
भावभङ्गिमा की परीक्षा करती रहे ॥ १६ ॥
सविहसितं दृष्ट्वा सम्भाषते ॥ १७ ॥
भावबोधक व्यापार—देखकर मुसकाती हुई बोलती है ॥ १७ ॥
आसने चोपनिमन्त्रयते ॥ १८ ॥
सम्मानपूर्वक आसन पर बैठने के लिये कहती है ॥ १८ ॥
क्वासितं क्व शयितं भुक्तं क्व चेष्टितं किं वा कृतमिति पृच्छति ॥ १९ ॥
कल कहाँ बैठीं ? कहाँ सोयीं ? कल क्या खाना खाया ? अथवा कल दिनभर क्या करती
धरती रहीं ?—इत्यादि प्रश्न पूछती है ॥ १९ ॥
विविक्ते दर्शयत्यात्मानम् ॥ २० ॥
उससे एकान्त में बातें करती है या एकान्त में मिलती है ॥ २० ॥
आख्यानकानि नियुङ्क्ते ॥ २१ ॥
नायक की बातें स्वयं आरम्भ करती है ॥ २१ ॥
चिन्तयन्ती निःश्वसिति विजृम्भते च ॥ २२ ॥
कुछ सोचती हुई दीर्घोच्छ्वास और जँभाई लेती है ॥ २२ ॥
प्रीतिदायं च ददाति ॥ २३ ॥
प्रेमपूर्वक भेंट देती है ॥ २३ ॥
इष्टेषूत्सवेषु च स्मरति ॥ २४ ॥
इष्ट कार्यों और उत्सवों में उसे स्मरण करती है अर्थात् उत्सव आदि में उसे आमन्त्रित
करती है ॥ २४ ॥
पुनर्दर्शनानुबन्धं विसृजति ॥ २५ ॥
पुनः आने की शर्त पर ही घर से जाने देती है ॥ २५ ॥
साधुवादिनी सती किमिदमशोभनमभिधत्से इति कथामनुबध्नाति ॥ २६ ॥
'आप सदाचारिणी होकर ऐसी अशोभन बातें क्यों करती हैं?'—यह वार्तालाप के
अन्तर्गत कह देती है ॥ २६ ॥
नायकस्य शाठ्यचापल्यसम्बद्धान् दोषान् ददाति ॥ २७ ॥
नायक की चपलता और धूर्तता को कहती है ॥ २७ ॥
पूर्वप्रवृत्तं च तत्सन्दर्शनं कथाभियोगं च स्वयमकथयन्ती तयोच्यमानमाकां-
क्षति ॥ २८ ॥