वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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में निपुण हो, तो उस कला का प्रदर्शन करने के लिये रानी उसे राजभवन बुला ले। जब वह
राजभवन में प्रवेश कर जाये तो राजदासी पूर्वोक्त रीति से उसे राजा से मिलवा दे ॥ २३ ॥
उद्भूतानर्थस्य भीतस्य वा भार्यां भिक्षुकी ब्रूयात् असावन्तःपुरिका
राजनि सिद्धा गृहीतवाक्या मम वचनं शृणोति। स्वभावतश्च कृपाशीला तामनेनो-
पायेनाधिगमिष्यामि। अहमेव ते प्रवेशं कारयिष्यामि। सा च ते भर्तुर्महान्तमनर्थं
निवर्तयिष्यतीति प्रतिपन्नां द्विस्त्रिरिति प्रवेशयेत्। अन्तःपुरिका चास्या अभयं दद्यात्।
अभयश्रवणाच्च संप्रहृष्टां प्रणिहिता राजदासीति समानं पूर्वेण ॥ २४ ॥
पीड़ित एवं स्वार्थयों की पत्नियों को बुलाने की रीति—जिसका राजपरिवार से कुछ
अनर्थ होना हो या जो उससे भयभीत हो, उसकी पत्नी से भिक्षुणी जाकर कह दे—‘राजा इस
रानी का कहना मानता है और यह मेरा कहा मानती है। वह तो स्वभाव से ही कृपालु है।