वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३२ वात्स्यायन-कामसूत्र
अभियुक्तापि परिहरति, न च संसृज्यते । न च प्रत्याचष्टे । तस्मिन्नात्मनि च
गौरवाभिमानात् । सातिपरिचयात् कृच्छ्रसाध्या । मर्मज्ञया दूत्या तां साधयेत् ॥ ७ ॥
मर्मज्ञ दूती से साध्य—कोई कोई स्त्री परपुरुष से कई कई बार मिलकर भी फिर मिलना
छोड़ देती है, न सम्भोग का अवसर ही देती है और न स्पष्ट ना ही करती है तथा इसी में अपना
गौरव समझती है। उसे अतिपरिचय से कठिनतापूर्वक सिद्ध किया जा सकता है या मर्मज्ञ दूती
द्वारा साधा जा सकता है ॥ ७ ॥
सा चेदभियुज्यमाना पारुष्येण प्रत्यादिशत्युपेक्ष्या ॥ ८ ॥
उपेक्षणीया—जो स्त्री नायक द्वारा अभियोग किये जाने पर निष्ठुरतापूर्वक उत्तर दे दे,
उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिये ॥ ८ ॥
परुषयित्वापि तु प्रीतियोजिनीं साधयेत् ॥ ९ ॥
विशेष बात—जो स्त्री कठोर वचन कहकर भी प्रेमसम्बन्ध बनाना चाहे, उसे अभियोगों
से सिद्ध कर लेना चाहिये ॥ ९ ॥
कारणात् संस्पर्शनं सहते नावबुध्यते नाम द्विधाभूतमानसा सातत्येन क्षान्त्या
वा साध्या ॥ १० ॥
अङ्गस्पर्श से साध्य—जो स्त्री किसी कारणवश अङ्गस्पर्श को इस प्रकार सहती हो मानो
कुछ जानती ही न हो, दुविधा में फँसी हुई ऐसी स्त्री को निरन्तर स्पर्श (आलिङ्गन आदि) से
सिद्ध किया जा सकता है ॥ १० ॥
समीपे शयानायाः सुप्तो नाम करमुपरि विन्यसेत् । सापि सुप्तेवोपेक्षते । जाग्रती
त्वपनुदेद् भूयोऽभियोगाकांक्षिणी ॥ ११ ॥
अधिक अभियोग चाहने वाली की पहचान—समीप में सोयी हुई सी नायिका के
ऊपर सोया हुआ सा नायक अपना हाथ रख दे। वह भी सोती हुई के समान उपेक्षा कर देगी,
किन्तु अधिक अभियोग की इच्छा रखने वाली नायक के हाथ को तुरन्त हटा देती है ॥ ११ ॥
एतेन पादस्योपरि पादन्यासो व्याख्यातः ॥ १२ ॥
पादन्यास—इसी कथन से पैर पर पर रखना भी कह दिया गया है ॥ १२ ॥
तस्मिन् प्रसुप्ते भूयः सुप्तसंश्लेषणमुपक्रमेत् ॥ १३ ॥
सुप्त आलिङ्गन—जब नायक निःशङ्क होकर नायिका के हाथ पर और पैर पर पैर रखने
लगे तो सोते हुए आलिङ्गन भी प्रारम्भ कर देना चाहिये ॥ १३ ॥
तदसहमानामुत्थितां द्वितीयेऽहनि प्रकृतिवर्तिनीमभियोगार्थिनीं विद्यात् । अदृ-
श्यमानां तु दूतीसाध्याम् ॥ १४ ॥
प्रगल्भा—यदि आलिङ्गन करते ही स्त्री उठ खड़ी हो और दूसरे दिन शान्त या सामान्य
ही हो, तो उसे अधिक अभियोग चाहने वाली समझे, अतएव उसकी प्राप्ति के लिये अभियोग
करे। यदि दूसरे दिन भी वह असामान्य या कुपित दिखायी दे, तो उसे दूती से सिद्ध करने का
प्रयास करे ॥ १४ ॥