वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३४ वात्स्यायन-कामसूत्र
मर्मज्ञ दूती द्वारा साध्य—जो नायिका नायक के पास रहकर, सेवा करके भोगने योग्य
हो, वह हाव भाव दिखाने पर भी ज्यों की त्यों ही रहती है, वह उसके रहस्यों को जानने वाली
दूतों के द्वारा ही सिद्ध की जा सकती है ॥ २२ ॥
व्यावर्तमाना तु तर्कणीयेति भावपरीक्षा ॥ २३ ॥
सम्यक् परीक्षा आवश्यक—जो नायिका संकेत करती हुई भी मिलने से पीछे हट जाये,
उस पर विचार करना चाहिये कि यह आन्तरिक मन से सङ्केत कर रही है या नायक को मूर्ख
बनाने का आनन्द ले रही है। इस प्रकार भावपरीक्षा पूर्ण हुई ॥ २३ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
आदौ परिचयं कुर्यात्ततश्च परिभाषणम्।
परिभाषणसम्मिश्रं मिथश्चाकारवेदनम् ॥ २४ ॥
उपसंहार—सर्वप्रथम नायिका से परिचय करना चाहिये। तत्पश्चात् वार्तालाप करना
चाहिये और इस वार्तालाप में ही भावों का आदान प्रदान और पहचान हो जानी चाहिये ॥ २४ ॥
प्रत्युत्तरेण पश्येच्चेदाकारस्य परिग्रहम्।
ततोऽभियुञ्जीत नरः स्त्रियं विगतसाध्वसः ॥ २५ ॥
नायक के सङ्केत करने पर नायिका सङ्केत द्वारा उत्तर दे दे तो नायक को निर्भय होकर उस
स्त्री की प्राप्ति हेतु अभियोग प्रारम्भ कर देना चाहिये ॥ २५ ॥
आकारेणात्मनो भावं या नारी प्राक्प्रयोजयेत्।
क्षिप्रमेवाभियोज्या सा प्रथमे त्वेव दर्शने ॥ २६ ॥
जो नायिका सङ्केत के साथ साथ अपने मनोभावों को भी जोड़ देती है, वह तो प्रथम दर्शन
में ही मिलन के लिये तैयार हो सकती है। अतएव ऐसी नायिका को प्रथम परिचय में ही प्राप्त
किया जा सकता है ॥ २६ ॥
श्लक्ष्णमाकारिता या तु दर्शयेत् स्फुटमुत्तरम्।
सापि तत्क्षणसिद्धेति विज्ञेया रतिलालसा ॥ २७ ॥
जो नायिका गुप्त सङ्केत का स्पष्ट उत्तर देती है, रतिलालसा वाली उस नायिका को तो उसी
समय सिद्ध समझना चाहिये अर्थात् उसे उसी समय भी प्राप्त किया जा सकता है ॥ २७ ॥
धीरायामप्रगल्भायां परीक्षिण्यां च योषिति।
एष सूक्ष्मो विधिः प्रोक्तः सिद्धा एव स्फुटं स्त्रियः ॥ २८ ॥
जो नायिका स्वभाव से गम्भीर हो, अपने मनोभावों को व्यक्त न होने दे और नायक की
अत्यधिक परीक्षा करती हो—ऐसी स्त्रियों के लिये ही यह सूक्ष्म विधि कही गयी है, क्योंकि वे
स्त्रियाँ सिद्ध हैं, यह तो स्पष्ट ही है ॥ २८ ॥
भावपरीक्षाप्रकरण नामक तृतीय अध्याय सम्पन्न ॥