वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० वात्स्यायन-कामसूत्र
बहिश्च रक्षिभिरन्यदेव कारणमपदिश्य संसृज्येत ॥ १३ ॥
स्वेच्छा से प्रवेश की विधि—किसी काम के बहाने बाहर के सुरक्षाकर्मियों से मेलजोल
कर ले ॥ १३ ॥
अन्तश्चारिण्यां च परिचारिकायां विदितार्थायां सक्तमात्मानं रूपयेत्। तद-
लाभाच्च शोकमन्तःप्रवेशिनीभिश्च दूतीकल्पं सकलमाचरेत् ॥ १४ ॥
परिचारिका से कृत्रिम प्रेम—अन्तःपुर में आने जाने वाली किसी परिचारिका को
नागरक जब यह जान ले कि यह मुझ पर आसक्त है तो बाह्य रूप से उसे अपनी अत्यधिक
आसक्ति दिखाये। यदि वह किसी दिन न दिखे तो अपनी अत्यधिक व्याकुलता प्रकट करे।
उससे (पूर्वोक्त) दूतीकल्प में बताये गये सारे काम ले ॥ १४ ॥
राजप्रणिधींश्च बुध्येत ॥ १५ ॥
गुप्तचरों से सावधान—राजा के गुप्तचरों को अवश्य पहचान ले ॥ १५ ॥
दूत्यास्त्वसञ्चारे यत्र गृहीताकारायाः प्रयोज्याया दर्शनयोगस्तत्राव-
स्थानम् ॥ १६ ॥
गतिविधियाँ—यदि दूती न आ सके और अनुकूल चेष्टाएँ कर दी गयी हों तो ऐसे स्थान
पर खड़ा हो जाये, जहाँ से नायिका का दर्शन दूर से हो सके ॥ १६ ॥
तस्मिन्रपि तु रक्षिषु परिचारिकाव्यपदेशः ॥ १७ ॥
खड़े होकर भी परिचित सुरक्षाकर्मियों को उसी परिचारिका के दर्शन का बहाना करना
चाहिये ॥ १७ ॥
चक्षुरनुबध्नन्त्यामिङ्गिताकारनिवेदनम् ॥ १८ ॥
यदि नायिका बार बार उस पर दृष्टि डाले तो नायक को भी संकेत और चेष्टाएँ दिखानी
चाहिये ॥ १८ ॥
यत्र सम्पातोऽस्यास्तत्र चित्रकर्मणस्तद्युक्तस्य द्व्यर्थानां गीतवस्तुकानां
क्रीडनकानां कृतचिह्नानामापीनकस्याङ्गुलीयकस्य च निधानम् ॥ १९ ॥
चित्र का प्रयोग—जहाँ नायिका की दृष्टि जाती हो, वहाँ दीवार पर या चित्रफलक पर
उसके साथ प्रेमपूर्वक अपना चित्र बनावे, श्लिष्ट भाषा में प्रेमव्यञ्जक शब्द या छन्द लिखे,
नखक्षतों एवं दन्तक्षतों से चिह्नित गेंद, गुड़िया आदि रख दे और अपने नाम वाली अँगूठी रख
दे ॥ १९ ॥
प्रत्युत्तरं तया दत्तं प्रपश्येत्। ततः प्रवेशने यतेत ॥ २० ॥
उसके द्वारा दिये गये उत्तर को देखे और तत्पश्चात् ही प्रवेश करे ॥ २० ॥
यत्र चास्या नियतं गमनमिति विद्यात्तत्र प्रच्छन्नस्य प्रागेवावस्थानम् ॥ २१ ॥
जिस स्थान पर नायिका का निश्चित गमन होता हो, वहाँ पहले ही छिपकर बैठ
जाये ॥ २१ ॥
आस्तरणप्रावरणवेष्टितस्य वा प्रवेशनिर्हारौ ॥ २३ ॥
अथवा उसे ओढ़ने बिछाने के कपड़ों में लपेटकर लाया और भेजा जा सकता है ॥ २३ ॥