वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५. पारदारिक अधिकरण १३९
पत्रच्छेद्यानि नानाभिप्रायाकृतीनि दर्शयेत्। लेखपत्रगर्भाणि कर्णपत्राण्या-
पीडांश्च ॥ ३९ ॥
पत्रों पर अनेक प्रकार की अभिप्रायबोधक आकृतियाँ बनाये। कर्णपत्र और आपीड
(माला) भी इस प्रकार बनाये कि उनके अन्दर प्रेमपत्र छिपाकर रखा जा सके ॥ ३९ ॥
तेषु स्वमनोरथाख्यापनम्। प्रतिप्राभृतदाने चैनां नियोजयेत् ॥ ४० ॥
उन प्रेमपत्रों में अपने मनोरथों को बताये और प्रेमपत्रों के निरन्तर आदान-प्रदान की
योजना बनाये ॥ ४० ॥
एवं कृतपरस्परपरिग्रहयोश्च दूतीप्रत्ययः समागमः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार एक-दूसरे के हृदय में कामना उत्पन्न करके दूती के विश्वास पर समागम
होता है ॥ ४१ ॥
स तु देवताभिगमने यात्रायामुद्यानक्रीडायां जलावतरणे विवाहे यज्ञव्यसनो-
त्सवेष्वग्न्युत्पाते चौरविभ्रमे जनपदस्य चक्रारोहणे प्रेक्षाव्यापारेषु तेषु तेषु च
कार्येष्विति बाभ्रवीयाः ॥ ४२ ॥
मिलन का अवसर—वह समागम तो देवपूजा या देवयात्रा को जाते समय, वनविहार के
समय, जलविहार के समय, विवाह में सम्मिलित होते समय, आग लग जाने आदि उपद्रवों के
समय, चोरों को पकड़ने के कोलाहल में, राजा के परिवर्तन के समय, खेल-तमाशों के समय
और ऐसे ही अन्यान्य कार्यों के समय होता है—यह आचार्य बाभ्रव्य के अनुयायियों का मत
है ॥ ४२ ॥
सखीभिक्षुकीक्षपणिकातापसीभवनेषु सुखोपाय इति गोणिकापुत्रः ॥ ४३ ॥
मिलनस्थल—सखी, भिक्षुणी, संन्यासिनी और तपस्विनी—इनके घरों में नायक और
नायिका का मिलन सरलता से सम्भव है—यह आचार्य गोणिकापुत्र का मत है ॥ ४३ ॥
तस्या एव तु गेहे विदितनिष्क्रमप्रवेशे चिन्तितात्ययप्रतीकारे प्रवेशनमुपपन्नं
निष्क्रमणमविज्ञातकालं च तन्नित्यं सुखोपायं चेति वात्स्यायनः ॥ ४४ ॥
यदि प्रवेश करने और निकलने का मार्ग पता हो, तो उस नायिका के घर पर भी समागम
हो सकता है। यह नित्य और अविज्ञात होने से सुख का उपाय है—ऐसा आचार्य वात्स्यायन का
मत है ॥ ४४ ॥
निसृष्टार्था परिमितार्था पत्रहारी स्वयंढूती मूढदूती भार्यादूती मूकदूती वातदूती
चेति दूतीविशेषाः ॥ ४५ ॥
दूतीभेद—सामान्य रूप से दूतीकर्म बताकर अब दूतियों के भेद बताते हैं—निसृष्टार्था,
परिमितार्था, पत्रहारी, स्वयंढूती, मूढदूती, भार्यादूती, मूकदूती और वातदूती—ये दूतियों के
भेद हैं ॥ ४५ ॥
नायकस्य नायिकायाश्च यथामनीषितमर्थमुपलभ्य स्वबुद्ध्या कार्यसम्पादिनी
निसृष्टार्था ॥ ४६ ॥
काम० ११